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सीआरपीसी की धारा 394 : जेल एवं आर्थिक जुर्माने की एक साथ सजा के खिलाफ दायर अपील अभियुक्त की मौत के बाद समाप्त नहीं हो जाती : सुप्रीम कोर्ट

LiveLaw News Network
22 Jan 2020 6:53 AM GMT
सीआरपीसी की धारा 394 : जेल एवं आर्थिक जुर्माने की एक साथ सजा के खिलाफ दायर अपील अभियुक्त की मौत के बाद समाप्त नहीं हो जाती : सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जेल और आर्थिक जुर्माने की मिश्रित सजा के खिलाफ अपील लंबित होने के दौरान यदि अभियुक्त-अपीलकर्ता की मौत हो जाती है तो अपील समाप्त नहीं हो जाती।

इस मामले में आरोपी को अबकारी अधिनियम की धारा 55(ए)(जी) के तहत दोषी ठहराया गया था और उसे दो साल जेल की सजा सुनायी गयी थी तथा एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया था।

अपील लंबित होने के दौरान हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता की मौत के तथ्य पर गौर किया, हालांकि इसने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 394 के सिद्धांत का हवाला देते हुए अपील की स्वीकार्यता के निर्धारण का फैसला लिया था।

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड में लाये गये साक्ष्यों पर विचार करते हुए अपीलकर्ता की दोषसिद्धि बरकरार रखी थी। हाईकोर्ट ने कहा कि चूंकि अपील लंबित होने के दौरान ही अपीलकर्ता की मौत हो गयी, इसलिए जेल की सजा अव्यावहारिक हो गयी है, लेकिन जहां तक जुर्माना की बात है तो निचली अदालत के फैसले को गलत ठहराने का उसे कोई कारण नजर नहीं आता। इसके साथ ही अपील खारिज कर दी गयी।

अभियुक्त के कानूनी वारिस ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अपील में यह दलील दी गयी थी कि यदि जेल और आर्थिक जुर्माने की सजा एक साथ थी तो अभियुक्त की मौत के बाद दोनों को समाप्त किया जाना चाहिए था।

न्यायमूर्ति अशोक भूषण एवं न्यायमूर्ति एम आर शाह की पीठ ने 1898 की संहिता की धारा 431 के परिप्रेक्ष्य में सुप्रीम कोर्ट के ही पूर्व के फैसले का हवाला देते हुए कहा :

उपरोक्त फैसले में स्पष्ट किया गया है कि भले ही धारा 431 के तहत जेल की सजा के साथ आर्थिक जुर्माना लगाया गया हो, लेकिन यह अपील निरस्त नहीं होगी।

धारा 431 में वर्णित 'जुर्माने की सजा से संबंधित अपील के अलावा' जैसी अभिव्यक्ति का इस्तेमाल सीआरपीसी की धारा 394 में भी किया गया है। इस प्रकार, जेल की सजा के साथ-साथ आर्थिक जुर्माना वाले मौजूदा मामले में दायर अपील को जुर्माना के खिलाफ अपील के तौर पर देखा जाना चाहिए था और हाईकोर्ट ने अपील की स्वीकार्यता के निर्धारण में कोई गलती नहीं की है।

पीठ ने, हालांकि अपील को यह कहते हुए आंशिक रूप से मंजूर कर लिया कि हाईकोर्ट को आरोपी के कानूनी वारिस को जुर्माने के खिलाफ अपनी बात कहने का एक मौका अवश्य देना चाहिए था। यह जुर्माना आरोपी के कानूनी वारिसों की सम्पत्तियों से वसूला जा सकता था।

मुकदमे का ब्योरा :-

केस का नाम : रमेशन (मृत) कानूनी प्रतिनिधि गिरिजा के माध्यम से/ बनाम केरल सरकार

केस नं. – क्रिमिनल अपील सं. 77/2020

कोरम : न्यायमूर्ति अशोक भूषण एवं न्यायमूर्ति एम आर शाह


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