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सीआरपीसी की धारा 362 आदेश को रोकने की हाईकोर्ट की निहित शक्ति पर रोक नहीं लगाती: सुप्रीम कोर्ट

LiveLaw News Network
15 Dec 2019 2:09 PM GMT
सीआरपीसी की धारा 362 आदेश को रोकने की हाईकोर्ट की निहित शक्ति पर रोक नहीं लगाती: सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हाईकोर्ट के पास दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत एक आदेश को वापस लेने की अंतर्निहित शक्ति है और सीआरपीसी की धारा 362 के प्रावधान ऐसी शक्तियों के प्रयोग से रोक नहीं सकते।

इस मामले में हाईकोर्ट ने कहा था कि भारतीय दंड संहिता की धारा 498 ए के तहत दोषी ठहराए जाने से किसी व्यक्ति के करियर पर असर नहीं पड़ेगा। नियोक्ता ने आदेश वापस लेने के लिए आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत एक आवेदन दायर किया था, जिसमें दलील दी गई थी कि नियोक्ता को कर्मचारी के किसी भी कदाचार, जिसके कारण कोर्ट ने उसे दोषी ठहराया हो, को ध्यान में रखने का अधिकार है, नियोक्ता की पीठ के पीछे आनुशंगिक कार्यवाही में नहीं ले जाया जा सकता है। इस आवेदन को हाईकोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि सीआरपीसी की धारा 362 के प्रावधानों के मद्देनजर समीक्षा बरकरार नहीं रखी जा सकती है।

पीठ ने संहिता की धारा 362 में उल्लिखित निषेध के आधार पर विवाद की सुनवाई की, कि हाईकोर्ट के पास उसके द्वारा दायर संशोधन में पूर्व में दिए गए निर्णय को बदलने या उसकी समीक्षा करने की कोई शक्ति नहीं थी, सिवाय एक लिपिकीय गणीतीय सुधार या अंकगणितीय त्रुटि के। उन्होंने पंजाब राज्य बनाम दविंदर पाल सिंह भुल्लर के फैसले पर भरोसा किया। पीठ ने कहा कि यह तर्क भ्रामक है और वैसे ही जैसी एक चोर दूसरे चोर को चोर कहे। कोर्ट ने कहा:

"यद्यप‌ि कोर्ट ने दविंदर पाल सिंह (सुप्रा) में बताया है कि संहिता की धारा 362 में श‌ामिल अपवाद केवल उन प्रावधानों पर लागू होगा, जहां कोर्ट को संहिता द्वारा या किसी अन्य कानून द्वारा स्पष्ट रूप से अधिकृत किया गया है, हालांकि कोर्ट की अंतर्निहित शक्ति के लिए नहीं, ये कोर्ट फिर भी मानती है कि सीआरपीसी की धारा 482 के तहत कोर्ट का अध‌िकार बचा है, जहां आपराधिक कोर्ट ने एक आदेश पारित किया है और जिसे न्याय के लक्ष्य को सुरक्षित रखने के लिए रद्द किया जाना आवश्यक है, या जहां कार्यवाही न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग करने जैसी है। "

हाईकोर्ट के आदेश को दरकिनार करते हुए बेंच ने कहा कि सजा से उत्पन्न संशोधन से नियोक्ता के अधिकार को सुरक्षित नहीं किया जा सकता है, जिसके कारण आचरण के आधार पर कार्रवाई की जा सकती है, जिसके कारण सेवा नियमों के मानदंड पर, कर्मचारी को दोषी ठहराया जाता है।

पिछले महीने, मध्य प्रदेश राज्य बनाम मान सिंह के मामले में सुप्रीम कोट की दो जजों की पीठ ने फैसला दिया था कि फैसले को वापस लेने से निर्णय को वापस लेना, निर्णय में फेरबदल या समीक्षा के बराबर है, जो सीआरपीसी की धारा 362 के तहत स्वीकार्य नहीं है और उच्च न्यायालय ने अपनी निहित शक्तियों द्वारा उसे मान्यता नहीं दे सकता।

हाई कोर्ट की संशोधन की शक्तियों को यह घोषित करने के लिए प्रयोग नहीं किया जा सकता है कि दोषी होने के कोई सिविल नतीजे नहीं होंगे.

इसलिए, सुप्रीम कोर्ट के (न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम कृष्ण कुमार पांडे) के समक्ष दायर अपील में एक मुद्दा था कि क्या सीआरपीसी की धारा 39PC के तहत संशोधन में, दोषसिद्धि के कारण, हाईकोर्ट, सजा की पुष्टि करते समय, नियोक्ता के अधिकार को, कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए जाने के आधार पर, किसी कर्मचारी पर अनुशासनात्मक नियंत्रण के अधिकार को छीन सकता है। उच्च न्यायालय के दृष्टिकोण को खारिज करते हुए जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस वी रामसुब्रमण्यम की पीठ ने कहा:

"धारा 397 और 401 द्वारा प्रदान की गई शक्ति वास्तव में निचली अदालतों के अधीक्षण/पर्यवेक्षण की शक्तियां हैं। इस शक्ति को अभियुक्त पर के नियोक्ता के अधीक्षण की शक्ति में परिवर्तित नहीं किया जा सकता है। धारा 397 से 401 के प्रावधानों में से कोई भी हाईकोर्ट को यह घोषित करने की शक्ति प्रदान नहीं करता कि दोष सिद्ध का कोई सिविल परिणाम नहीं होगा। इसलिए, हाई कोर्ट ने अपने आदेश तारीख 23.11.2012 में जो किया, कि सजा प्रतिवादी के कैरियर को प्रतिकूल रूप से प्रभावित नहीं करेगी, पूरी तरह से इसके संशोधल क्षेत्राधिकार के दायरे से बाहर थी और इसे कायम नहीं रखा जा सकता था। '

पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें / आदेश डाउनलोड करें


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