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जिन स्कूलों को सरकारी मान्यता की जरूरत वो किसी एक धर्म की ‌श‌िक्षा प्रदान नहीं कर सकते हैं: केरल हाईकोर्ट

Avanish Pathak
25 Jan 2020 1:30 AM GMT
जिन स्कूलों को सरकारी मान्यता की जरूरत वो किसी एक धर्म की ‌श‌िक्षा प्रदान नहीं कर सकते हैं: केरल हाईकोर्ट
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केरल हाईकोर्ट ने कहा है कि जिन स्कूलों के लिए आरटीई एक्‍ट के तहत मान्यता प्राप्त करना जरूरी है, वे धार्मिक निर्देश या अन्य धर्मों पर तरजीह देते हुए किसी विशेष धर्म की शिक्षा प्रदान नहीं कर सकते।

जस्टिस मुहम्मद मुश्ताक शुक्रवार को एक प्रश्न की पड़ताल कर रहे थे कि "क्या निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूल, जिन्हें मान्यता की आवश्यकता होती है, उन्हें प्राथमिक शिक्षा के साथ किसी विशेष धर्म को, अन्य धर्मों पर तरजीह देते हुए, बढ़ावा देने का अधिकार है?"

कोर्ट में हिदाया एजुकेशनल एंड चैरिटेबल ट्रस्ट, मनकौद द्वारा संचालित एक गैर-सहायता प्राप्त न‌िजी स्कूल ने याचिका दायर की थी, जो प्राथमिक शिक्षा प्रदान करती है।

याचिका में राज्‍य सरकार द्वारा स्कूल को बंद कराए जाने की कार्रवाई को चुनौती दी गई थी। राज्य सरकार का आरोप था कि स्कूल में एक विशेष धर्म के धार्मिक निर्देश दिए जाते हैं और एक विशेष धर्म के स्टूडेंट्स को ही स्वीकार किया जाता है, जिससे समाज के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को खतरा पैदा हो गया है।

स्कूल पर आरोप था कि उसे सरकारी मान्यता या सीबीएसई की संबद्धता के बिना चलाया जा रहा है और उसमें 200 से अधिक छात्रों को भर्ती किया गया है। खुफिया रिपोर्ट पर कार्रवाई करते हुए राज्य सरकार ने स्कूल को बंद करने का आदेश दिया।

राज्य सरकार का कहना था कि स्कूल में केवल एक विशेष समुदाय के बच्‍चों को ही प्रवेश दिया जा रहा है। राज्य सरकार के निर्देशों पर कार्रवाई करते हुए शिक्षा उप निदेशक, त्रिवेंद्रम ने उक्त आदेश जारी किया था।

अदालत मामले में टिप्पणी की-

"संविधान के अनुच्छेद 28 (1) के तहत, सरकारी सहायता प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक निर्देश प्रदान करने पर पूर्ण प्रतिबंध है। हालांकि, हमारा संविधान मान्यता प्राप्त या सरकारी आर्थिक सहायता प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों को अभिभावकों की सहमति से धार्मिक निर्देश देने की इजाजत देता है। (अनुच्छेद 28 (3))"

धार्मिक‌ निर्देश और धार्मिक शिक्षा के बीच अंतर को रेखांकित करते हुए कोर्ट ने कहा कि संविधान में शैक्षणिक संस्‍थानों में धार्मिक श‌िक्षा प्रदान करने पर कोई प्रतिबंध नहीं है, हालांकि शै‌क्षण‌िक संस्‍थानों में किसी विशेष धर्म के निर्देश देने पर प्रतिबंध है। यह टिप्‍पणी अरुणा रॉय व अन्य बनाम भारत संघ व अन्य के मामले के आधार पर किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में धार्मिक अन्यन्यता पर आधारित धार्मिक शिक्षा के खिलाफ आगाह किया था।

कोर्ट ने कहा-

"धर्मनिरपेक्षता उस पहिये का हिस्सा है, जिसे भारत में राजनीतिक लोकतंत्र को संचालित करना है। यह उन स्तंभों में से एक है, जिस पर संविधान के तहत भारत की इमारत का निर्माण किया गया था। धर्मनिरपेक्षिता एक मूल्य रूप में कई कई अन्य मूल्यों के साथ परस्पर जुड़ी हुई है, जिनसे उदार लोकतंत्र में संविधान की नैतिकता का निर्माण होता है।",

"राज्य या सार्वजनिक अधिकारियों या निजी निकायों द्वारा, सार्वजनिक कार्यों के निर्वहन में, दूसरे धर्मों पर एक धर्म की विशिष्टता या वरीयता, हमारे संविधान के मौलिक मूल्यों में से एक धर्मनिरपेक्षता की जड़ों पर हमला करता है। यह तटस्थता की उपेक्षा करता है, भेदभाव को बढ़ावा देता है और समान उपचार से इनकार करता है।

निजी स्कूलों, जिन्हें सरकारी मान्यता की आवश्यकता होती है, उन्हें दूसरे धर्मों पर एक धर्म को बढ़ावा नहीं देना चाहिए। निजी शैक्षणिक संस्थानों द्वारा किसी विशेष धर्म का विशेष प्रचार संविधान के धर्मनिरपेक्ष चरित्र का विरोध करता है, और संवैधानिक मूल्य और नैतिकता से इनकार करता है।

एक व्यक्ति या एक समूह या एक संप्रदाय को अपने धर्म को व्यक्त करने और उसे बढ़ावा देने और उसका अभ्यास करने की स्वतंत्रता है। हालांकि यह स्वंतत्रता स्वतंत्रता एक निजी संस्था को उपलब्ध नहीं है।

भारत जैसे बहुलतावादी समाज में, जो धर्मनिरपेक्षता को शिक्षा सहित धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों को संचालित करने में मूल मानदंड के रूप में स्वीकार करता है, उसे धार्मिक बहुलतावाद पर आधारित धार्मिक शिक्षा या निर्देश प्रदान करने में कोई कठिनाई नहीं हो सकती है। निषिद्ध केवल अनन्यता है।"

अदालत ने कहा कि धार्मिक शिक्षा/निर्देश मूल्य आधारित शिक्षा को ढालने में सक्षम है। हालांकि इन्‍हें बहुसांस्कृतिक पद्धति के माध्यम से तय किया जाएगा, ताकि माता-पिता को अपने बच्चों के लिए उपयुक्त पद्घति चुनने की अनुमति हो।

अदालत ने कहा कि धर्मनिरपेक्ष शिक्षा प्रदान करने वाले कोई भी प्राथमिक विद्यालय एक धर्म को दूरसे धर्मों पर बढ़ावा नहीं दे सकता।

अदालत ने यह भी कहा कि जिस निजी स्कूल को सरकारी मान्यता की आवश्यकता होती है वह सरकार मान्यता प्राप्त करने के बाद धार्मिक बहुलवाद पर आधारित धार्मिक या अध्ययन शिक्षा प्रदान करने का हकदार है।

कोर्ट ने रिट याचिका का निपटारा करते हुए कहा,

"... न्यायालय का विचार है कि याचिकाकर्ता को धार्मिक निर्देशों को लागू करने से रोकने या सरकार की अनुमति के बिना शिक्षा प्रदान करने का अवसर दिया जाना चाहिए। इस तथ्य की रोशनी में कि यह मुद्दा बहुत महत्वपूर्ण है, महासचिव, शिक्षा विभाग को निर्देश दिया जाता है कि वह राज्य के सभी मान्यता प्राप्त निजी विद्यालयों को एक सामान्य सरकारी आदेश जारी करें ताकि सरकार की अनुमति के बिना धार्मिक शिक्षा या धार्मिक अध्ययन को लागू न किया जा सके।"

यदि सरकार पाती है कि निर्देंशों के बावजूद, स्कूलआदेश का उल्लंघन करते हैं, तो सरकार ऐसे स्कूलों को बंद करने और मान्यता खत्म करने की कार्रवाई शुरू कर सकती है।

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