सुप्रीम कोर्ट ने आयुष स्नातक कोर्स में नीट को लागू करने को सही ठहराया

LiveLaw News Network

21 Feb 2020 11:21 AM GMT

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    सुप्रीम कोर्ट ने आयुष के अंडर ग्रेजुएट कोर्स जैसे बीएएमएस, बीयूएमएस, बीएसएमएस और बीएचएमएस में प्रवेश के लिए अखिल भारतीय राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET)को सही ठहराया है।

    न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने कहा है कि आयुष पाठ्यक्रमों के लिए भी न्यूनतम स्तर को नीचा नहीं किया जा सकता।

    भारतीय चिकित्सा केंद्रीय परिषद (भारतीय चिकित्सा शिक्षा में न्यूनतम मानदंड) विनियमन, 1986 को 2018 में संशोधित किया गया। विनियमन 2(d), 2018 यह कहता है कि सभी चिकित्सा संस्थानों में स्नातक कोर्स में प्रवेश के लिए हर अकादमिक वर्ष में समान प्रवेश परीक्षा जैसे राष्ट्रीय पात्रता प्रवेश परीक्षा (नीट) होगी और नीट परीक्षा का आयोजन केंद्र सरकार द्वारा अधिकृत एजेंसी आयोजित करेगी। अदालत हाईकोर्ट के एक फ़ैसले के ख़िलाफ़ दायर याचिका पर विचार कर रही थी जिसने 2018 की अधिसूचना को दी गई चुनौती को ख़ारिज कर दिया था।

    सुप्रीम कोर्ट में दलील पेश की गई कि 2018 का विनियमन इंडियन मेडिसिन सेंट्रल की दृष्टि से ग़ैरक़ानूनी है। यह कहा गया कि अधिनियम की धारा 36 के तहत केंद्रीय परिषद के विनियम बनानेवाले प्राधिकरण के अधिकार क्षेत्र में यह नहीं आता कि वह इसमें अखिल भारतीय स्तर पर नीट जैसी किसी परीक्षा का इसके लिए प्रावधान करे।

    इसका उत्तर देते हुए पीठ ने कहा,

    "छात्रों और संस्थानों की ओर से जो दलील दी गई है कि अखिल भारतीय स्तर पर परीक्षा लागू करने का प्रावधान अधिनियम की धारा 36 (i),(j) और (k) के तहत नहीं आता उससे हम सहमत हैं। हालाँकि, धारा 36(p) ऐसे किसी भी बात का ज़िक्र करता है जिसके लिए विनियमन प्रावधान बनाता है। हमारी राय में, धारा 22 जो कि भारतीय चिकित्सा शिक्षा में न्यूनतम मानदंड की बात करता है, उसमें एक अखिल भरतीय प्रवेश परीक्षा की बात भी आती है।"

    पीठ ने वेटरिनेरी काउन्सिल ऑफ़ इंडिया बनाम इंडियन काउन्सिल ऑफ़ एग्रीकल्चर रिसर्च मामले में आए फ़ैसले का हवाला भी दिया जिसमें कहा गया कि भारतीय पशु चिकित्सा परिषद को पशु चिकित्सा शिक्षा के बारे में मानदंड तय करने वाले विनियमन तैयार करने का अधिकार है और इस विनियमन में प्रवेश देने और पशु चिकित्सा की योग्यता से जुड़े मुद्दे का विनियमन भी शामिल है।

    अदालत ने इस बात पर भी सहमति जताई कि अंडर ग्रैजूएट कोर्सों में अकादमिक वर्ष 2019-20 में प्रवेश के लिए न्यूनतम पर्सेंटायल के निर्धारण को भी जायज़ ठहराया और कहा कि यहाँ तक कि आयुष कोर्सों के लिए भी न्यूनतम मानदंड को नीचे नहीं किया जा सकता है।

    "हम इस बात से सहमत हैं। जो डॉक्टर आयुर्वेदिक, यूनानी और होम्योपैथी की योग्यता रखते हैं वे भी रोगियों का इलाज करते हैं न्यूनतम स्तर की शिक्षा के बिना इन पेशेवर कॉलेजों से अधकचरे ज्ञान वाले डॉक्टर निकलेंगे। आयुष के अंडर ग्रैजूएट कोर्सों में प्रवेश के लिए योग्य उम्मीदवारों की अनुपलब्धता की वजह से इस कोर्स में प्रवेश कि लिए केंद्रीय परिषद ने जो स्तर तय किया है उसको कम नहीं किया जा सकता।"

    आदेश की प्रति डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें




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