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क्या सार्वजनिक अधिकारी के लिए बोलने की आजादी में अधिक प्रतिबंध हैं? सुप्रीम कोर्ट करेगा विचार

LiveLaw News Network
24 Oct 2019 6:53 AM GMT
क्या सार्वजनिक अधिकारी के लिए बोलने की आजादी में अधिक प्रतिबंध हैं? सुप्रीम कोर्ट करेगा विचार
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जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस इंदिरा बनर्जी, जस्टिस विनीत सरन, जस्टिस एम आर शाह और जस्टिस एस रवीन्द्र भट की सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने बुधवार को कौशल किशोर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य का मामला उठाया।

यह मामला बुलंदशहर बलात्कार की घटना से उपजा है जिसमें राज्य के एक तत्कालीन मंत्री आज़म खान ने इस घटना को "राजनीतिक साजिश और कुछ नहीं" के रूप में खारिज कर दिया था।

संविधान में निहित एक सार्वजनिक आधिकारी बनाम मौलिक अधिकारों की स्थिति के बारे में अमिक्स क्यूरी नियुक्त वरिष्ठ वकील फली एस नरीमन और हरीश साल्वे द्वारा सवाल तैयार किए गए थे और इन्हें 05.10.2017 को एक आदेश के तहत संविधान पीठ के पास भेजा गया था। कानून के चार सवालों को भारत के अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने उठाया :

1. क्या अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत बोलने की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के अधिकार पर अनुच्छेद 19 (2) के तहत कोई प्रतिबंध लगाया जा सकता है, पहले से ही लगे प्रतिबंध को छोड़कर? यदि हां, तो किस हद तक?

2. क्या अनुच्छेद 19 (1) (ए) पर अधिक प्रतिबंध लगाया जा सकता है, अगर यह उच्च पद धारण करने वाले व्यक्तियों से संबंधित है तो ?

3. क्या अनुच्छेद 21 को व्यक्तियों और निजी निगमों के खिलाफ लागू किया जा सकता है जो अनुच्छेद 12 के अनुसार 'राज्य' की परिभाषा के तहत शामिल नहीं हैं?

4. क्या राज्य वैधानिक प्रावधानों के तहत व्यक्तियों के खिलाफ कार्यवाही कर सकता है?

अटॉर्नी जनरल ने अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत बोलने की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के अधिकार की प्रतिबंधात्मक प्रकृति का हवाला देकर अपनी दलीलों की शुरुआत की। उन्होंने कहा कि ये अधिकार प्रकृति में पूर्ण नहीं हैं और अनुच्छेद 19 (2) में उल्लिखित शर्तों द्वारा प्रतिबंधित हैं। हालांकि सवाल यह उठता है कि क्या इन प्रतिबंधों का विस्तार इसके मूल में अन्य मौलिक अधिकारों को शामिल करने के लिए किया जा सकता है ? उदाहरण के लिए, इस मामले में, क्या अनुच्छेद 21 अनुच्छेद 19 (1) (क) पर प्रतिबंध के रूप में काम कर सकता है?

जस्टिस मिश्रा ने टोकते हुए कहा कि अनुच्छेद 19 को अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या अनुच्छेद 21 में दिए गए किसी भी अधिकार के प्रवर्तन के लिए अलग कानून की जरूरत है।

इस प्रश्न पर अटॉर्नी जनरल ने कहा कि अनुच्छेद 21 किसी कानून के बिना नहीं लागू हो सकता। अनुच्छेद 21 के तहत निजता के अधिकार और अनुच्छेद 19 (1) (क) के तहत स्वतंत्र भाषण के बीच के परस्पर संबंधों पर चर्चा की गई और कहा गया कि दोनों के बीच संतुलन बनाने की जरूरत है।

इसके अतिरिक्त मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के पहलू के संबंध में "सामूहिक जिम्मेदारी" के प्रश्न पर भी बहस हुई। जैसा कि एक मंत्री राज्य की एक इकाई है, क्या उत्तरार्द्ध को पूर्व की कार्रवाइयों के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए था, जो प्रश्न पहली पीठ ने भी उठाया था।

जस्टिस मिश्रा के साथ जस्टिस भट्ट ने हैबियस कॉरपस रिट का उदाहरण दिया जो व्यक्तियों के खिलाफ भी जारी किया जा सकता है और यह जरूरी नहीं कि ये राज्य तक ही सीमित है। हालांकि अटॉर्नी जनरल द्वारा कहा गया कि मौलिक अधिकारों को केवल राज्य के खिलाफ लागू किया जा सकता है और ये केवल उचित प्रतिबंधों के पालन में बनाए गए कानून के अधीन हैं।

इस मामले में गुरुवार को वरिष्ठ वकील फली एस नरीमन और हरीश साल्वे की उपस्थिति में सुनवाई होने की संभावना है।

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