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सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय और राज्य बाल संरक्षण संरक्षण आयोग के जांच करने के अधिकारों के विवाद का निपटारा किया

LiveLaw News Network
13 Jan 2020 2:38 PM GMT
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय और राज्य बाल संरक्षण संरक्षण आयोग के जांच करने के अधिकारों के विवाद का निपटारा किया
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सुप्रीम कोर्ट ने बाल अधिकारों के मुद्दों की जांच करने की शक्तियों के संबंध में राष्ट्रीय और राज्य बाल संरक्षण संरक्षण आयोग के बीच 'विवादों' का निपटारा कर दिया है।

सोमवार को फैसला सुनाते हुए न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस की पीठ ने कहा,

" किसी भी आयोग के क्षेत्राधिकार का कोई बाहरी मामला नहीं है। बाल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 13 (2) द्वारा रखी गई एकमात्र बाधा यह है कि यदि राज्य आयोग ने पहले ही जांच शुरू कर दी है तो राष्ट्रीय आयोग को स्वाभाविक रूप से इस मामले में जांच करने से बचना चाहिए। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि राष्ट्रीय आयोग अन्य बड़े सवालों में नहीं जा सकता जिसके कारण बाल अधिकारों के उल्लंघन की विशिष्ट घटनाएं हो सकती हैं, जिन पर जांच करने की आवश्यकता है।"

पीठ द्वारा आगे कहा गया,

" यहां तक ​​कि एक राज्य आयोग के पास उन मामलों की जांच करने की शक्ति है, जो इसके दायरे में आते हैं और भले ही अवैधता ऐसी हो कि इसमें अंतर - राज्य या अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव हो उदाहरण के लिए किसी बच्चे को अवैध रूप से विदेश में गोद लेने के लिए भेजा जा रहा है। अगर इस तरह के मामले में राज्य आयोग राष्ट्रीय आयोग या किसी अन्य राज्य आयोग से सहायता मांगता है, जहां बच्चे की अवैध रूप से तस्करी की गई है तो राष्ट्रीय आयोग या अन्य राज्य आयोग को इस मामले में छानबीन करने में आयोग का सहयोग करना चाहिए।"

दरअसल पीठ ने NCPCR की कलकत्ता हाईकोर्ट के 29 अगस्त, 2017 के आदेश के खिलाफ याचिका पर सुनवाई की थी जिसमें उसे बाल तस्करी के एक मामले में हस्तक्षेप करने से रोक दिया था। NCPCR के अनुसार, जलपाईगुड़ी के एक अनाथालय के संबंध में समाचार आने पर कि वहां बच्चों को अवैध रूप से बेचा जा रहा है, आयोग ने पश्चिम बंगाल के तत्कालीन अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (एडीजीपी), सीआईडी राजेश कुमार को तथ्यों का पता लगाने के लिए लिखा था। अधिकारी ने NCPCR पर रोक लगाने के लिए कलकत्ता HC का दरवाजा खटखटाया क्योंकि राज्य आयोग द्वारा पहले से ही केस की निगरानी की जा रही थी। शीर्ष बाल अधिकार संरक्षण संस्था ने HC द्वारा 29 अगस्त, 2017 के आदेश को रद्द करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। इससे पहले जनवरी 2018 में शीर्ष अदालत ने अन्य सभी राज्यों में इस मुद्दे का विस्तार करते हुए HC के आदेश पर रोक लगा दी थी।

राष्ट्रीय आयोग द्वारा दायर अपील को निपटाने के अपने फैसले में पीठ ने राष्ट्रीय आयोग को जवाब देने के लिए ADGP द्वारा मना करने के मुद्दे पर कहा :

पुलिस अधिकारियों को यह महसूस करना चाहिए कि जब सीपीसीआर अधिनियम के तहत गठित आयोग कुछ प्रासंगिक जानकारी मांगते हैं तो उन्हें सम्मानपूर्वक उसका जवाब देना चाहिए और तथाकथित 'अधिकार क्षेत्र' के विवाद को उठाना नहीं चाहिए। यहां तक ​​कि पुलिस अधिकारियों को यह महसूस करना चाहिए कि ये आयोग बच्चों के कल्याण के लिए गठित किए गए हैं।

यहां तक ​​कि यह मानते हुए कि WBPCR ने पहले ही जांच शुरू की थी, डॉ राजेश कुमार NCPCR को जानकारी नहीं दे सकते, इसके पीछे हम कोई कारण नहीं देखते। NCPCR के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाना उनके लिए नहीं था। यदि किसी अधिकारी से किसी भी आयोग द्वारा जानकारी मांगी जाती है तो वह आयोग के पत्रों का उत्तर देने के लिए बाध्य होता है। एक आयोग इस मुद्दे को उठा सकता है कि चूंकि यह मामले को जब्त कर लिया गया है और वह इस पर जांच कर रहा है, इसलिए राष्ट्रीय आयोग को दूसरी जांच शुरू नहीं करनी चाहिए लेकिन अधिकारियों के लिए इस तरह के मुद्दे को उठाना सही नहीं है।

क्या वास्तव में एक जांच शुरू की गई है या नहीं यह एक अधिकारी द्वारा तय नहीं किया जा सकता है। इसका निर्णय या तो आयोग या न्यायालय द्वारा किया जाना है। इसलिए, हमारे विचार में, डॉ राजेश कुमार को NCPCR के अधिकार क्षेत्र को चुनौती देने के बजाय NCPCR को जानकारी देने की सलाह दी जानी चाहिए।

ये फैसला दो आयोगों के बीच अहंकार टकराव की आलोचना के साथ शुरू हुआ। इस पहलू पर, फैसले में कहा गया है:

ये बहुत दुःख की बात है! हम दुख के साथ शुरू करते हैं क्योंकि बच्चों की सुरक्षा के लिए स्थापित संस्थान उनके तथाकथित अधिकार क्षेत्र की लड़ाई में उन्हें लगभग पीछे छोड़ चुके हैं।

हम यह मानने के लिए विवश हैं कि राज्य आयोग (WBCPCR) और राष्ट्रीय आयोग (NCPCR) के बीच अहम के इस टकराव में, इस पूरी अवधि के लिए, पुलिस कार्रवाई करने के अलावा, अधिकार स्थापित करने के लिए प्रशासनिक पक्ष पर कुछ भी नहीं किया गया।

दुर्भाग्य से, इस मामले में, एक-दूसरे पर दबाव डालने के बजाय कोई सहयोग नहीं किया गया है। हम दोहराना और पुनर्मूल्यांकन करना चाहेंगे कि इसमें कोई न्यायिक मुद्दे शामिल नहीं हैं।

रिकॉर्ड की जांच कर रही अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि,ट इस मामले में NCPCR ने मामले में शामिल राज्य आयोग के समकक्ष जांच शुरू कर दी थी।


आदेश की प्रति डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें




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