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सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों/ UT को  देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान रिहा किए कैदियों को सुरक्षित परिवहन देने को कहा 

LiveLaw News Network
8 April 2020 5:27 AM GMT
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों/ UT को   देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान रिहा किए कैदियों को सुरक्षित परिवहन देने को कहा 
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सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि जेलों से रिहा किए गए कैदियों को सुरक्षित परिवहन प्रदान किया जाए ताकि वे कोरोनावायरस (COIDID-19) के प्रकोप के परिणामस्वरूप देशव्यापी लॉकडाउन के मद्देनज़र अपने घरों तक पहुंच सकें।

भारत के मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे और न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव की पीठ ने अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल और वरिष्ठ वकील और एमिकस क्यूरी दुष्यंत दवे की टिप्पणियों को संज्ञान में लिया और भीड़भाड़ के परिणामस्वरूप महामारी के चलते कैदियों को होने वाले जोखिमों के संबंध में ये निर्देश जारी किए।

वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने अदालत को बताया कि जिन कैदियों को विभिन्न राज्यों में उच्चाधिकार प्राप्त समिति द्वारा तय किए गए दिशानिर्देशों के अनुसार रिहा किया गया था, वे अपने घरों तक पहुंचने के साधनों की कमी के कारण फंसे हुए हैं।

वहीं अटॉर्नी-जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि बंद के परिणामस्वरूप किसी भी परिवहन की अनुपस्थिति के कारण कैदियों का फंसे रहना अन्याय है।

पीठ ने कैदियों को उचित परिवहन उपलब्ध करवाने का निर्देश दिया:

"इन परिस्थितियों में, हम यह निर्देश देना उचित समझते हैं कि भारत संघ यह सुनिश्चित करेगा कि राज्यों / केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा रिहा किए गए सभी कैदियों को छोड़ा जाए और उन्हें अपने घरों तक पहुँचने के लिए परिवहन प्रदान किया जाए या लॉकडाउन की अवधि के लिए अस्थायी आश्रय गृह में रहने का विकल्प दिया जाए।

इस प्रयोजन के लिए, भारत संघ आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 या किसी अन्य कानून के तहत उचित दिशा-निर्देश जारी कर सकता है।"

पीठ ने आगे कहा कि राज्यों / केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस महानिदेशक के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि रिहा किए गए कैदियों को सुरक्षित परिवहन प्रदान करें और लॉकडाउन के दौरान, अस्थायी आश्रय घरों में रहने का विकल्प भी प्रदान करें।

दरअसल 16 मार्च को, सर्वोच्च न्यायालय ने जेलों में भीड़भाड़ के मुद्दे पर संज्ञान लिया था और कहा था कि COVID-19 के प्रसार को रोकने के लिए कैदियों के लिए सोशल डिस्टेंसिंग बनाए रखना मुश्किल है।

23 मार्च को शीर्ष अदालत ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को 7 साल की कैद की सजा के अपराध वाले विचाराधीन और सजायाफ्ता कैदियों को पैरोल / अंतरिम जमानत पर विचार करने के लिए उच्चाधिकार प्राप्त समितियों का गठन करने का निर्देश दिया था। यह मामला अब 13 अप्रैल, 2020 को सूचीबद्ध किया गया है।

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