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एनडीपीएस अधिनियम के तहत ईरानी बंदियों के साथ बुरे व्यवहार की शिकायत को सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट ले जाने को कहा

LiveLaw News Network
24 May 2020 4:00 AM GMT
एनडीपीएस अधिनियम के तहत ईरानी बंदियों के साथ बुरे व्यवहार की शिकायत को सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट ले जाने को कहा
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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को ईरान के वाणिज्य दूतावास की एक याचिका की सुनवाई की जो नारकोटिक्स ड्रग्स साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट १९८५ (एनडीपीएस) अधिनियम के तहत निरुद्ध मोसावि मसूद एवं मोहम्मद ज़फ़्फ़रानी के साथ बदसलूकी से संबंधित है।

मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस हृषिकेश रॉय की पीठ ने इस याचिका को यह कहते हुए निपटा दिया कि याचिकाकर्ता मद्रास हाईकोर्ट से संपर्क कर सकता है।

यह याचिका एडवोकेट ऑन रिकर्ड राजीव रहेजा के माध्यम से दायर की गई, जिसमें ईरानी नागरिकों के ख़िलाफ़ दुर्व्यवहार का आरोप जेल अधीक्षक पर लागाया गया है। ये लोग चेन्नई के पुझल सेंट्रल जेल में बंद हैं। याचिका में अनुरोध किया गया है इस जेल में अन्य बंदी जेल अधीक्षक के प्रभाव में आकर ईरानी बंदियों मोसावी और ज़फ़्फ़रानी बंदियों पर जुल्म करते हैं और अब उनको अपनी जान का ख़तरा उत्पन्न हो गया है।

याचिका में कहा गया है कि दोनों ही बंदियों को नेल्सन मंडेला नियमों के अनुसार ज़रूरी सुविधाएं मुहैया करायी जाएं। ये नियम बंदियों के साथ होने वाले व्यवहार से संबधित है।

"बंदियों के साथ व्यवहार को लेकर संयुक्त राष्ट्र के स्टैंडर्ड न्यूनतम नियम (नेल्सन मंडेला नियम) 2015 के अनुसार जेल चलाने वालों को चाहिए कि वह जेल और जेल के बाहर मुक्त जीवन के बीच अंतर को कम करने का प्रयास करना चाहिए, जिसमें बंदियों के उत्तरदायित्व या एक मानव के रूप में उनकी गरिमा के प्रति आदर को कमतर करने की धारणा होती है।"

फिर, इस याचिका में यह भी कहा गया है कि जेल अधीक्षक के ख़िलाफ़ जांच बैठाई जाए और इस जांच के पूरी होने तक उसको निलंबित रखा जाए। साथ ही, दोनों ही ईरानी नागरिकों को एक-एक करोड़ रुपए मुआवज़ा दिया जाए।

" यह कहा गया है कि दूतावास का यह कर्तव्य है कि वह अपने नागरिकों के जीवन और उसकी स्वतंत्रता की अनावश्यक सज़ा और दुर्व्यवहार से रक्षा करे जो कि उस देश का क़ानून उसे नहीं देता है, जिस अदालत ने सज़ा सुनाई है उसने भी इस तरह के व्यवहार की अनुमति नहीं दी है…इस स्थिति को ठीक करने के अन्य सभी संभव उपायों से जब कोई नतीजा नहीं निकला और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री से भी संपर्क करने से कोई बात नहीं बनी तो उम्मीद बांधकर हम सर्वोच्च अदालत की शरण में आए हैं।"

इन दोनों ईरानी नागरिकों को शिवगंगा ज़िले में नारकोटिक कंट्रोल ब्यूरो ने 2013 में पकड़ा था और इन पर मेथफेटमाइन का उत्पादन करने का आरोप है।

मार्च 9, 2018, को NDPS की विशेष अदालत ने उन्हें अन्य आरोपियों के साथ 20 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई।

एक रिपोर्ट के अनुसार, दिसंबर 2018 में भारत में ईरानी वाणिज्य दूतावास के प्रमुख मोहम्मद हाघबिन घोमी ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ईके पलानिस्वामी से मुलाक़ात की और दोनों ईरानी नागरिकों की शिकायतों के बारे में बताया। राजनयिक ने आरोप लागाया कि उनके नागरिकों को उचित सुविधा नहीं दी जा रही है और यहां तक जेल के कैंटीन से अपने पसंद के खाने भी ख़रीदने की अनुमति उन्हें नहीं दी जाती।

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