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सुप्रीम कोर्ट ने ED को आम्रपाली होमबॉयर्स के पैसे निकालने की सीमा तक जेपी मॉर्गन और उसके निदेशकों की संपत्तियों को अटैच करने की अनुमति दी

LiveLaw News Network
23 May 2020 6:44 AM GMT
सुप्रीम कोर्ट  ने ED को आम्रपाली होमबॉयर्स के पैसे निकालने की सीमा तक जेपी मॉर्गन और उसके निदेशकों की संपत्तियों को अटैच करने की अनुमति दी

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा) और एफडीआई मानदंड के उल्लंघन में कथित तौर पर आम्रपाली समूह द्वारा होमबॉयर्स के रुपये निकालने के मामले में यूएस-आधारित जेपी मॉर्गन और उसके निदेशकों की संपत्तियों को संलग्न करने की अनुमति दे दी।

ईडी द्वारा प्रस्तुत दलील के आधार पर कि मामले में जेपी मॉर्गन के खातों में 187 करोड़ रुपये की पहचान की गई है, सुप्रीम कोर्ट ने 2 दिसंबर 2019 को लगाई उस रोक को हटा लिया जिसमें कहा गया था कि प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत अपराध की कार्यवाही के रूप मेंजेपी मॉर्गन और इसके निदेशकों की संपत्ति को संलग्न नहीं किया जाएगा।

प्रवर्तन निदेशालय के लिए पेश एएसजी संजय जैन ने पीठ को बताया कि जेपी मॉर्गन के खिलाफ की गई आपराधिक जांच में, उन्हें प्रथम दृष्टया 187 करोड़ रुपये की आय मिली है और इसके लिए उनके पास जेपी मॉर्गन और इसके निदेशकों के खिलाफ आगे बढ़ने के लिए कारण है। इसलिए पूर्वोक्त सीमा तक उसकी संपत्ति सलंग्न किए जाने की आवश्यकता है। उन्होंने पीठ से अनुरोध किया कि जेपी मॉर्गन और इसके निदेशकों की संपत्ति को संलग्न नहीं करने के लिए दिनांक 2 दिसंबर, 2019 के आदेश को हटाया जाए।

इस पर जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस यूयू ललित की पीठ ने निदेशालय को जेपी मॉर्गन के बैंक खातों के साथ-साथ जेपी मॉर्गन और इसके निदेशकों से संबंधित किसी भी अन्य संपत्ति को आवश्यक सीमा तक संलग्न करने का आदेश दिया।

न्यायालय ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल विक्रमजीत बनर्जी को भारत सरकार की योजना के तहत लोन के माध्यम से 500 करोड़ रुपये की राशि जारी करने के निर्देश लाने के लिए कहा ताकि रुकी हुई आम्रपाली परियोजना को पुनर्जीवित किया जा सके।

इस पर एएसजी ने पीठ को बताया कि इस मुद्दे पर वित्त मंत्रालय में एक बैठक निर्धारित है और वह अदालत द्वारा व्यक्त किए गए विचारों के बारे में संबंधित अधिकारियों को सूचित करेंगे।

न्यायालय ने डीआरटी भी को यह निर्देश दिया कि वे सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री द्वारा बनाए गए खाते में आम्रपाली जुड़ी संपत्ति से प्राप्त किराए को प्रेषित करें।

इस मामले में कोर्ट द्वारा नियुक्त रिसीवर के वरिष्ठ वकील आर वेंकटरमणि ने सुझाव दिया कि मामले में विवाद को देखते हुए भारत सरकार द्वारा जीएसटी माफ किया जाना चाहिए। वैकल्पिक रूप से, यह प्रस्तुत किया गया कि जीएसटी देय राशि को रोका जा सकता है। रिसीवर द्वारा यह भी कहा गया कि एफएआर की बिक्री को निर्देशित किया जा सकता है ताकि निर्माण के उद्देश्य के लिए राशि प्राप्त हो सके।

एएसजी ने कोर्ट को बताया कि कोर्ट द्वारा नियुक्त रिसीवर द्वारा दिए गए सुझावों पर गौर किया जा रहा है। इस मामले पर अगली सुनवाई 27 मई को होगी।

दरअसल पिछले साल 23 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने RERA के तहत आम्रपाली ग्रुप का रजिस्ट्रेशन रद्द करने का आदेश दिया था और ED को उस याचिका पर मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों की जांच के आदेश दिए थे, जिसमें कई होमबॉयर्स ने आम्रपाली ग्रुप के प्रॉजेक्ट्स में बुक किए गए करीब 42,000 फ्लैटों पर कब्जा देने की अपील की थी।

शीर्ष अदालत ने कहा था,

"होम बायर्स का पैसा डायवर्ट कर दिया गया है। डायरेक्टर्स ने डमी कंपनियों के निर्माण, प्रोफेशनल फीस वसूलने, फर्जी बिल बनाने, अंडरवैल्यूड प्राइस पर फ्लैट बेचने, अत्यधिक दलाली के भुगतान आदि से पैसा डाइवर्ट किया। उन्होंने फेमा और एफडीआई मानदंडों का उल्लंघन करते हुए जेपी मॉर्गन से निवेश प्राप्त किया।"

इसमें कहा गया था कि जेपी मॉर्गन और आम्रपाली जोडिएक डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड की आवश्यकताओं के अनुरूप समूह के इक्विटी शेयरों को अत्यधिक कीमत पर खरीदा गया था और घर खरीदारों के फंड को डायवर्ट कर दिया था।

अदालत ने फोरेंसिक ऑडिटर्स की रिपोर्टों को स्वीकार करते हुए कहा, "जेपी मॉर्गन को भुगतान करने के लिए शेयरों को ओवरलैप किया गया था। इसे घर खरीदारों के पैसे को विदेशों में भेजने के लिए एक उपकरण के रूप में अपनाया गया था।"

शीर्ष अदालत ने तब ईडी को निर्देश दिया था कि जांच तीन महीने की अवधि के भीतर निष्पक्ष और उचित तरीके से की जानी चाहिए। कोर्ट ने NBCC को रुकी हुई परियोजना को संभालने का भी निर्देश दिया।

यह नोएडा और ग्रेटर नोएडा के अधिकारियों द्वारा ये प्रस्तुत किए जाने के बाद किया गया था कि उनके पास परियोजनाओं को पूरा करने के लिए विशेषज्ञता और संसाधनों की कमी है। उन्होंने अदालत द्वारा गठित उच्चस्तरीय कमेटी की देखरेख में एक प्रतिष्ठित बिल्डर को परियोजना सौंपने के लिए अदालत से अनुरोध किया था।

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