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पत्रकारिता के स्रोतों की सुरक्षा प्रेस की स्वतंत्रता के लिए एक बुनियादी शर्त : पेगासस मामले में सुप्रीम कोर्ट

LiveLaw News Network
27 Oct 2021 10:28 AM GMT
पत्रकारिता के स्रोतों की सुरक्षा प्रेस की स्वतंत्रता के लिए एक बुनियादी शर्त : पेगासस मामले में सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को पेगासस स्पाइवेयर मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय स्वतंत्र विशेषज्ञ कमेटी का गठन करने का आदेश दिया। कमेटी की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस आरवी रवींद्रन करेंगे। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया एनवी रमना, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस हेमा कोहली की पीठ ने सोमवार को लोकतंत्र में व्यक्तियों की अंधाधुंध निगरानी की प्रथा, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर 'ठंडा प्रभाव' डालता है, के खिलाफ अपना कड़ा विरोध व्यक्त किया।

पीठ ने कहा, "कानून के शासन द्वारा शासित एक लोकतांत्रिक देश में व्यक्तियों की अंधाधुंध जासूसी की अनुमति नहीं दी जा सकती है। यह केवल संविधान के तहत कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया का पालन करके पर्याप्त वैधानिक सुरक्षा उपायों के साथ ही संभव है।"

कोर्ट ने यह भी कहा कि निगरानी का प्रेस की स्वतंत्रता पर ठंडा प्रभाव पड़ेगा। कोर्ट ने कहा कि पत्रकारिता के स्रोतों की सुरक्षा प्रेस की स्वतंत्रता के लिए बुनियादी शर्तों में से एक है।

आदेश में कहा गया, "इस तरह के अधिकार का एक महत्वपूर्ण और आवश्यक परिणाम सूचना के स्रोतों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। पत्रकारिता स्रोतों की सुरक्षा प्रेस की स्वतंत्रता के लिए बुनियादी शर्तों में से एक है। इस तरह की सुरक्षा के बिना, स्रोतों को जनहित के मुद्दों पर जनता को सूचित करने के लिए प्रेस की सहायता करने से रोका जा सकता है। एक लोकतांत्रिक समाज में प्रेस की स्वतंत्रता के लिए पत्रकारिता के स्रोतों के संरक्षण के महत्व और इस पर जासूसी तकनीकों के संभावित ठंडे प्रभाव को ध्यान में रखते हुए वर्तमान मामले में, जिसमें नागरिकों के अधिकारों के उल्लंघन के कुछ गंभीर आरोप हैं, को उठाया गया है, र्कोट का कार्य बहुत महत्वपूर्ण है। इस आलोक में यह न्यायालय सच्चाई का निर्धारण करने और यहां लगाए गए आरोपों की तह तक जाने के लिए मजबूर है।"

निजता के अधिकार पर किसी भी प्रतिबंध को अनिवार्य रूप से संवैधानिक जांच से गुजरना होगा

न्यायालय ने स्वीकार किया कि जहां प्रौद्योगिकी लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए उपयोगी है, वहीं यह राज्य की अनुचित घुसपैठ को भी जन्म दे सकती है और किसी व्यक्ति की निजता के अधिकार का उल्लंघन कर सकती है। यह भी स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया कि निजता के अधिकार पर लगाए गए किसी भी प्रतिबंध को अनिवार्य रूप से संवैधानिक जांच से गुजरना होगा।

कोर्ट ने कहा, "एक सभ्य लोकतांत्रिक समाज के सदस्यों को गोपनीयता की उचित अपेक्षा होती है। गोपनीयता पत्रकारों या सामाजिक कार्यकर्ताओं की एकमात्र चिंता नहीं है। भारत के प्रत्येक नागरिक को गोपनीयता के उल्लंघन के खिलाफ संरक्षित किया जाना चाहिए। यह अपेक्षा है, जो हमें अपने पंसद, स्वतंत्रता और स्वाधीनता का प्रयोग करने में सक्षम बनाती है।"

निजता के अधिकार में हस्तक्षेप तभी होना चाहिए जब वह आनुपातिक हो और राष्ट्रीय सुरक्षा/हितों की रक्षा के लिए नितांत आवश्यक हो

बेंच ने आगे कहा कि राज्य को राष्ट्रीय हितों की रक्षा और नागरिकों की निजता के उल्लंघन के के बीच संतुलन हासिल करने का प्रयास करना चाहिए। एक उदाहरण का हवाला देते हुए कोर्ट ने खेद व्यक्त किया कि आज की दुनिया में खुफिया एजेंसियों द्वारा निगरानी के माध्यम से एकत्र की गई जानकारी हिंसा और आतंक के खिलाफ लड़ाई के लिए आवश्यक है।

हालांकि, किसी व्यक्ति की निजता के अधिकार के साथ हस्तक्षेप 'केवल तभी किया जाना चाहिए जब यह राष्ट्रीय सुरक्षा/हितों की रक्षा के लिए बिल्कुल जरूरी हो और आनुपातिक हो।' कोर्ट ने कहा, इस तरह की कथित तकनीक के उपयोग के लिए विचार साक्ष्य आधारित होने चाहिए।

उल्लेखनीय है कि सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बेंच के समक्ष तर्क दिया था कि मौजूदा मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित है और इसलिए इसे न्यायिक बहस या सार्वजनिक चर्चा का विषय नहीं बनाया जा सकता है। उन्होंने बताया था कि मामले में अतिरिक्त हलफनामा दायर करने पर केंद्र ने अनिच्छा व्यक्त की है।

निगरानी प्रेस की स्वतंत्रता पर ठंडा प्रभाव डालती है जो लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है

कोर्ट ने आगे कहा कि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि निगरानी और यह ज्ञान कि किसी पर जासूसी का खतरा है, किसी व्यक्ति के अपने अधिकारों का प्रयोग करने के तरीके को प्रभावित कर सकता है। यह कई मामलों में सेल्फ-सेंसरशिप का कारण बन सकता है।

प्रेस की स्वतंत्रता पर अनुपातहीन राज्य निगरानी के प्रभाव पर विचार करते हुए न्यायालय ने कहा, "यह विशेष रूप से चिंता का विषय है, जब यह प्रेस की स्वतंत्रता से संबंधित है, जो लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर इस तरह का ठंडा प्रभाव प्रेस की महत्वपूर्ण सार्वजनिक-प्रहरी भूमिका पर हमला है, जो प्रेस की सटीक और विश्वसनीय जानकारी प्रदान करने की क्षमता को कमजोर करता है।"

बेंच ने नोट किया कि एक लोकतांत्रिक समाज में प्रेस की स्वतंत्रता के लिए पत्रकारिता के स्रोतों की रक्षा करने और संभावित ठंडे प्रभाव के आलोक में 'सच्चाई का निर्धारण करने और आरोपों की तह तक जाने' के लिए वह मजबूर है।

केस शीर्षक: मनोहर लाल शर्मा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और जुड़े मामले

सिटेशन: एलएल 2021 एससी 600

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