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प्रशांत भूषण के खिलाफ की गई कार्यवाही न्याय का मज़ाक हैः चेन्‍नई के वकीलों का सुप्रीम कोर्ट को पत्र

LiveLaw News Network
19 Aug 2020 9:52 AM GMT
प्रशांत भूषण के खिलाफ की गई कार्यवाही न्याय का मज़ाक हैः चेन्‍नई के वकीलों का सुप्रीम कोर्ट को पत्र
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चेन्नई के वकीलों के एक समूह ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया और सुप्रीम कोर्ट के अन्य जजों को पत्र लिखा है। पत्र में उन्होंने एडवोकेट प्रशांत भूषण को ट्वीट के लिए, जिसमें उन्होंने सीजेआई और सुप्रीम कोर्ट कामकाज पर सवाल उठाया था, अवमानना ​​का दोषी ठहराए जाने के तरीके पर चिंता प्रकट की है।

फैसले की आलोचना करते हुए पत्र में कहा गया है, "वकीलों के पास, हितधारक होने के कारण और न्याय वितरण प्रणाली का अभिन्न अंग होने के कारण, अदालतों के कामकाज की जांच करने का अद्वितीय विशेषाधिकार और कर्तव्य हैं और वे आदलतों के कामकाज की जांच करने के न्याय व्यवस्‍था की आत्मा के प्रहरी के रूप में कार्य करते हैं।

वे न्यायपालिका और जनता के बीच की कड़ी हैं। एक निडर बार द्वारा व्यक्त की गई राय वास्तव में न्यायपालिका को लाभान्वित करती है, अन्यथा, इसके पास अपने कामकाज के बारे में लोगों की राय जानने के लिए कोई तंत्र नहीं है। न्यायपालिका शून्य में काम नहीं करती है बल्‍कि एक राजनीतिक प्रणाली के तहत कार्य करती है और लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित करती है।"

उन्होंने कहा कि चीजों की प्रकृति में, आपराधिक अवमानना ​​की कार्रवाई प्रतिवादी के लिए "गला घोंटने जैसा माहौल" बनाती है, क्योंकि मामले में न्यायालय शिकायतकर्ता/ पीड़ित, अभियोजक और न्यायाधीश है। इसलिए, उसे "हमेशा सावधानीपूर्वक, बुद्धिमानी से और चौतरफा सोचते हुए" कार्रवाई करनी चाहिए।

पत्र मे कहा गया है कि श्री भूषण के खिलाफ की गई कार्यवाही ने विभिन्न विसंगतियों को उजागर किया है, जिनसे "न्याय का उपहास" हुआ है।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया है कि श्री भूषण को सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे विचार को प्रकट करने के लिए "अकेला" निशाना बनाया है, जिसे कई और लोगों ने साझा और व्यक्त किया था, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान और पूर्व जज भी शामिल थे।

पत्र में आगे कहा गया है कि श्री प्रशांत भूषण के खिलाफ प्रक्रियागत सुरक्षा उपायों और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किए बिना जिस "जल्दबाजी में" कार्यवाही की गई है, वह चिंताजनक है।

पत्र में कहा गया है कि फैसले में इस बात पर कोई चर्चा नहीं की गई है कि ट्वीट को कैसे "दुर्भावनापूर्ण" पाया गया है। श्री भूषण के हलफनामे और उसमें दिए गए तथ्यों और परिस्थितियों, जिनके आधार पर उन्होंने अपनी राय दी थी, उसकी भी चर्चा नहीं की गई है और न ही राय को निराधार माना गया है; इसके बाद भी न्यायालय ने उन्हें दोषी करार देने की अपनी संवैधानिक शक्ति का प्रयोग किया है।

वकीलों ने पत्र में ‌लिखा है कि ऐसा करने में, अदालत ने उनकी सभी आपत्तियों को खारिज किया है- (i) मामले की लिस्टिंग (ii) जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच द्वारा सुनवाई और (iii) केस की ‌लिस्टिंग के लिए प्रशासनिक आदेश की आपूर्ति न करना या शिकायत की प्रति की आपूर्ति न करना।

पत्र में लिखा गया है, "किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का बचाव करने के मामले में ऐसी आपत्तियां महत्वपूर्ण होती हैं। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने माना है कि अवमानना कानून से बंधा नहीं है और प्रक्रिया सारांश हो सकती है, उचित निर्णय के लिए उचित प्रक्रिया आवश्यक है।"

इस पृष्ठभूमि में, वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष निम्नलिखित मुद्दों को उठाया है, उम्मीद जाहिर की है कि न्यायालय इन पर विचार करेगा-

-कार्यवाही सारांश हो, तो भी क्या आपराधिक अवमानना की कार्यवाही का संचालन जज (ओं) की पर अनिश्चितताओं छोड़ा जा सकता है, जो कि मामले को सुनते हैं, खासकर जब अदालत अभियोजक और न्यायाधीश दोनों के रूप में कार्य कर रही हो और प्रतिवादी का जीवन और स्वतंत्रता दांव पर हो? निष्पक्ष और न्यायिक अभियोजन सुनिश्चित करने के लिए, अदालत को, एक संस्था के रूप में, प्रक्रिया को संहिताबद्ध नहीं करना चाहिए और कड़ाई से उसी का पालन करना चाहिए, ताकि प्रतिवादी को पर्याप्त जानकारी हो कि कैसे आगे बढ़ना है?

- किसी व्यक्ति को ऐसे मामले में दोषी ठहाराने में, जिससे अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत जीवन का अधिकार को प्रभावित हो, से पहले प्राकृतिक न्याय की प्रक्रिया और सिद्धांतों का पालन अनिवार्य नहीं होना चाहिए, खासकर जब सुप्रीम कोर्ट ट्रायल कोर्ट और फाइनल कोर्ट दोनों के रूप में कार्य करता है?

-जब अवमाननकर्ता ने चार प्रारंभिक आपत्तियाँ उठाईं हैं- कोर्ट के प्रशासनिक आदेशों की गैर-प्रस्तुतियां, माहेश्वरी की शिकायत को गैर-प्रस्तुत‌ि, पूर्वाग्रह की संभावना और प्रत्यक्ष अदालत में सुनवाई शुरू होने के बाद खुली अदालत में सुनवाई। क्या बेंच को प्रत्येक आपत्तियां की सुनवाई नहीं करनी चाहिए, प्रत्येक आपत्ति पर एक तर्कपूर्ण आदेश पारित करना और उसके बाद प्रतिवादी को अपना बचाव तैयार करने में सक्षम नहीं करना चाहिए?

-जब प्रतिवादी ने केवल प्रारंभिक उत्तर दायर किया था और उचित बचाव जुटाने में परेशानी व्यक्त की थी, तो क्या मामले को अंतिम उत्तर शपथ पत्र और साक्ष्य के लिए स्‍थगित नहीं किया जाना चाहिए था, यदि कोई हो?

-प्रतिवादी द्वारा उठाइ गई सभी प्रारंभिक आपत्तियों की सारांश अस्वीकृति और जल्दबाजी में उसी दिन अंतिम सुनवाई के लिए मामले को उठाने से प्रतिवादी के खिलाफ क्या एक दमनकारी माहौल नहीं बनता है और निष्पक्ष सुनवाई का अवसर खत्म नहीं होता?

-जब आपराधिक अवमानना ​​कार्यवाही प्रकृति में आपराधिक हो और कार्यवाही को विनियमित करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय नियमन, 1975 के नियम, थर्ड पार्टी हलफनामों, गवाहों और दस्तावेजों की जांच पर विचार करे, तो प्रतिवादी को साक्ष्य पेश करने का अवसर नहीं दिया जाना चाहिए... ?

-क्या न्यायालय प्रतिवादी को सबूत के माध्यम से या अन्यथा साबित करने का अवसर प्रदान किए बिना यह यह निष्कर्ष सकता है कि प्रतिवादी द्वेष से प्रेरित था?

-क्या बेंच, मास्टर ऑफ रोस्टर द्वारा प्रशासनिक आदेश के अभाव में, सुप्रीम कोर्ट और अंतिम चार CJI की भूमिका के बारे में 27.06.2020 के दूसरे ट्वीट से जुड़े मामले की सुनवाई के लिए मुकदमा कर सकती है?

-जब अपराध का आरोप आपराधिक अवमानना ​का है, तो क्या विशिष्ट आरोपों का गठन नहीं किया जाना चाहिए और अवमाननाकर्ता को उन सभी आरोपों का जवाब देने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया जाना चाहिए?

-हालांकि न्यायालय किसी भी प्रकाशन के खिलाफ स्वत: संज्ञान ले सकता है, क्या रजिस्ट्रार जनरल सुप्रीम कोर्ट के नियमों की अनदेखी कर सकते हैं और अटॉर्नी जनरल की मंजूरी के बिना दायर दोषपूर्ण याचिका को रिकॉर्ड कर सकते हैं? यह रजिस्ट्रार जनरल की ऐसी कार्रवाई है, जो न्यायालय के नियमों का उल्लंघन है, जिसके परिणामस्वरूप त्वरित मामला हुआ है।

-जब अवमाननकर्ता ने पीठासीन न्यायाधीश, माननीय श्री जस्टिस अरुण मिश्रा (उत्तर हलफनामे का पैरा 92) द्वारा अनुचित कार्य की घटना का उल्लेख किया है, तो

क्या इस मामले को दूसरी बेंच के पास भेजने के अनुरोध को खारिज करने के लिए एक उचित आदेश पारित करना उचित नहीं होगा, क्या इस मामले को दूसरी बेंच के पास भेजने के अनुरोध को खारिज करने के लिए एक उचित आदेश पारित करना उचित नहीं होगा, ऐसा प्रतीत होता है कि मामले में व्यक्तिगत पूर्वाग्रह का एक तत्व है, विशेषकर जब भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश को एक औपचारिक पत्र के माध्यम से प्रतिवादी ने भी यही अनुरोध किया है।

-क्या अटॉर्नी जनरल के विचार का पता नहीं लगाया जाना चाहिए था, उन्हें नोटिस जारी की गई थी और वह अदालत में मौजूद थे?

कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं समेत 2000 से अधिक वकीलों ने भूषण के समर्थन के जारी एक बयान का समर्थन किया है।

बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया की कार्यकारी समिति ने भी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर अपनी नाराजगी व्यक्त की।

बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया, कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव (सीएचआरआई), कैम्पेन फॉर जूडिश‌ियल एकाउंटेबिलिट‌ी एंड रिफॉर्म्स (सीजेएआर) जैसे निकायों ने भी भूषण के खिलाफ फैसले की आलोचना की है।

पृष्ठभूमि

14 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने भूषण को न्यायपालिका के खिलाफ ट्वीट करने के लिए आपराधिक अवमानना ​​का दोषी ठहराया था। भूषण ने हार्ले डेविडसन बाइक पर बैठे सीजेआई बोबडे की तस्वीर के संदर्भ में किए गए एक ट्वीट में आरोप लगाया था कि सुप्रीम कोर्ट को लॉकडाउन में रखते हुए सीजेआई महंगी बाइक सवारी का आनंद ले रहे हैं।

एक अन्य ट्वीट में आरोप लगाया गया कि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले छह वर्षों में लोकतंत्र के विनाश में योगदान दिया, और अंतिम 4 सीजेआई ने इसमें विशेष भूमिका निभाई है।

न्यायालय ने कहा कि ट्वीट "विकृत तथ्यों" पर आधारित हैं और इन्होंने अदालत के अधिकार और सम्मान को कम किया है। यहां पढ़ें पूरा बयान

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