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'अभियोजन पक्ष अपराध साबित करने में विफल रहा' POCSO कोर्ट ने वालयार बलात्कार और मौत मामले के आरोपियों को बरी किया

LiveLaw News Network
30 Oct 2019 8:03 AM GMT
अभियोजन पक्ष अपराध साबित करने में विफल रहा POCSO कोर्ट ने वालयार बलात्कार और मौत मामले के आरोपियों को बरी किया
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दो नाबालिग लड़कियों (जो सगी बहन थीं ) के बलात्कार और उनकी मौत के मामले में सभी चार आरोपियों को बरी करने के बाद केरल के नागरिकों में बड़े पैमाने पर आक्रोश बढ़ रहा है। यह घटना वर्ष 2017 की है, जो केरल के पलक्कड़ जिले के वालयार में हुई थी।

बड़ी बहन जो 13 साल की थी, वह 13 जनवरी, 2017 को अपने घर में फांसी पर लटकी पाई गई थी। इस घटना के दो महीने के बाद 9 साल की उसकी छोटी बहन भी 4 मार्च, 2017 को अपने घर में फांसी पर लटकी पाई गई। दोनों अनुसूचित जाति समुदाय की थीं। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के अनुसार, दोनों लड़कियों का यौन शोषण हुआ था। छोटी लड़की के मामले में शव परीक्षण रिपोर्ट में होमिसाइडल हैंगिंग याने मारकर फांसी पर लटकाने की संभावना जताई गई थी।

हालांकि पुलिस ने हत्या के मामले की जांच नहीं की और सभी चार आरोपी वी.मधु, एम.मधु, शिबू और प्रदीप कुमार के खिलाफ अपनी अंतिम रिपोर्ट भारतीय दंड संहिता के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने, बलात्कार और अप्राकृतिक यौन संबंध के अपराधों का मामला बनाते हुए दायर की थी।

वहीं पॉक्सो अधिनियम (POCSO या प्रोटेक्शन आफ चिल्ड्रेन फ्राम सेक्सुअल अफेंसेस एक्ट) के तहत यौन शोषण करने का मामला बनाया गया था। मामले में एक और आरोपी है, जो नाबालिग था और उसके खिलाफ कार्रवाई किशोर न्याय बोर्ड में चल रही है।

पलक्कड़ स्थित पॉक्सो स्पेशल कोर्ट ने 30 सितंबर को एक आरोपी प्रदीप कुमार को बरी किया था। अन्य तीन आरोपियों को स्पेशल कोर्ट ने 25 अक्टूबर को बरी कर दिया गया।

मामले की जांच में केस कमज़ोर

इस मामले में आरोपियों को बरी किए जाने ने समाज के लोगों को विचलित किया है, यह शिकायत सामने आई है कि इस मामले की जांच जानबूझकर ठीक से नहीं की गई। मामले को दबाने का प्रयास किया गया है। वहीं मामले में एक आरोपी की तरफ से लंबे समय तक कोर्ट में पेश होने वाले वकील एन राजेश को बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किए जाने ने एक और विवाद को जन्म दे दिया, क्योंकि ऐसा इस मामले के निपटारा होने से पहले ही कर दिया गया था।

सीडब्ल्यूसी के अध्यक्ष के रूप में पदभार संभालने के बाद ही उन्होंने मामले के आरोपी के बारे में संक्षिप्त जानकारी दी थी, लेकिन इस बात को लेकर हुए हंगामे के बाद राजेश को सीडब्ल्यूसी अध्यक्ष के पद से हटा दिया गया।

विधानसभा में उठा मामला

केरल विधानसभा में सोमवार को इस मामले की गूंज सुनाई दी जब विपक्ष ने मामले की जांच और अभियोजन की खामियों को उजागर किया। मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने विधानसभा के फ्लोर पर कहा कि सरकार इस तरह की किसी भी चूक की जांच करेगी और फिर से जांच या सीबीआई से मामले की जांच कराने की जरूरत पर निर्णय करेगी या विचार करेगी।

सीएम ने कहा कि सरकार इस फैसले के खिलाफ अपील करेगी और इसके लिए अनुभवी वकील की सेवाएं लेगी। हालांकि 25 अक्टूबर को तीन आरोपियों को बरी किए जाने वाले फैसले की प्रति का अभी इंतजार है, जबकि 30 सितंबर को दिए गए उस फैसले की कॉपी जारी कर दी गई है, जिसमें प्रदीप कुमार को बरी कर दिया गया था। फैसले पर एक नजर से पता चलेगा कि केस कमजोर सबूतों पर बनाया गया था।

न्यायाधीश मुरली कृष्ण एस, प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, पलक्कड़, ने आरोपी प्रदीप कुमार के फैसले में कहा था कि, ''मुझे यह मानने में कोई हिचक नहीं है कि अभियोजन पक्ष उचित संदेह से परे अभियुक्त के खिलाफ कथित अपराधों को साबित करने में विफल रहा है।''

यह पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था। कोर्ट ने कहा कि पुलिस ने कोई ऐसा दावा नहीं किया था कि लड़की की मौत आत्महत्या के अलावा किसी अन्य कारण से हुई थी। कोर्ट ने कहा कि, ''मामले में गवाही के दौरान न तो अभियोजन पक्ष और न ही बचाव पक्ष का यह केस था या दावा था कि लड़की की मौत आत्महत्या के कारण नहीं हुई है।''

यौन शोषण का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं

प्रदीप कुमार लड़कियों के परिवार से लगभग 100 मीटर दूर एक किराए के मकान में रहता था। यह केस के दौरान साबित हो गया था कि वह अपने घर पर लड़की को ट्यूशन दिया करता था। प्रदीप कुमार ने लड़की का यौन शोषण किया था, इस बात को साबित करने के लिए तीन युवतियों की गवाही करवाई गई थी, जो अभियोजन पक्ष गवाह 9, 10 और 12 के रूप में पेश हुई थीं।

उन्होंने अदालत को बताया कि बड़ी बहन ने उनके सामने स्वीकार किया था कि प्रदीप कुमार ने उसके सामने अपनी नग्नता का प्रदर्शन किया था। गवाहों ने बताया कि रास्ते में प्रदीप कुमार का सामना करने पर पीड़िता डरती और सहमी जाती थी। गवाह नंबर 12 ने यह भी बताया कि लड़की ने उसे बताया था कि आरोपी ने एक बार उसे एक कमरे में बंद कर दिया था और उससे कहा था कि वह आरोपी के मोबाइल से आरोपी की नग्न तस्वीरें क्लिक करे।

अदालत ने हालांकि आरोपी के बारे में लड़की के बयानों के समय के बारे में विरोधाभासों होने के कारण इन गवाहों के बयानों पर विश्वास नहीं किया, जबकि इनमें से दो गवाह नंबर 9 व 11 मामले की सुनवाई के दौरान अपने बयान से मुकर गई थी।

गवाह नंबर 9 के अनुसार, लड़की ने आरोपी के बारे में उनको तब बताया था जब वे विधानसभा चुनावों में वोट ड़ालने के लिए प्रचार करने के लिए एक साथ निकली थीं। जबकि गवाह नंबर 10 ने कहा कि लड़की ने यह बात तब बताई थी, जब वे एक छात्र राजनीतिक संगठन के लिए प्रचार कर रही थीं। गवाह नंबर 12 के अनुसार, उसकी मां पंचायत चुनाव में चुनाव लड़ रही थीं और पीड़ित लड़की चुनाव कार्य में उनकी मदद कर रही थी। गवाह नंबर 12 ने कहा कि तभी उसने आरोपी के बारे में उनको बताया था।

कोर्ट ने कहा कि,'

"इन गवाहों के बयानों का यह विरोधाभास इनके बयानों की वास्तविकता पर संदेह करने के लिए पर्याप्त है।'' कोर्ट ने यह भी नोट किया कि गवाह नंबर 12 ने बयान दिया था कि आरोपी ने मृतक लड़की से कहा था कि वह आरोपी की नग्न तस्वीर आरोपी के मोबाइल से क्लिक करे, परंतु पुलिस के समक्ष सीआरपीसी की धारा 161 के तहत दिए गए बयान में गवाह ने यह बात नहीं कही थी।"

इस चूक को अदालत ने एक मुख्य विरोधाभास के रूप में माना। इस संबंध में, अदालत ने 'सुभाष बनाम हरियाणा राज्य'मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि धारा 161 के तहत पुलिस को दिए गए बयान में एक गवाह द्वारा की गयी महत्वपूर्ण चूक को विरोधाभास माना जा सकता है।

गवाह नंबर 12 के बयान के अनुसार, पीड़ित लड़की ने पंचायत चुनाव कार्य के दौरान आरोपी के बारे में बताया था, जो 2015 में हुआ था। जबकि, आरोपी ने जनवरी 2016 से ही पीड़ित के घर के पास रहना शुरू किया था।

इससे, अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि पीडब्ल्यू या अभियोजन गवाह 9, 10 और 12 ''झूठे गवाह''थे जिन्होंने अभियोजन पक्ष की सहायता के लिए अदालत के सामने झूठ बोला था।''

लड़की के माता-पिता ने गवाही के दौरान अपने बयान में प्रदीप कुमार द्वारा मृतका का यौन उत्पीड़न करने संबंधी कोई बात नहीं कही थी। उनके बयान केवल गवाह 9, 10 और 12 से सुनी हुई बातों पर आधारित थे।

कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं

फैसले में कहा गया कि मामले में वैज्ञानिक सबूतों की कमी थी। ''कोई वीर्य या शुक्राणु का नमूना न तो मृत लड़की से एकत्र किए गए या न ही अभियुक्तों के कपड़ों से एकत्र किए गए। आरोपियों को कथित अपराध से जोड़ने के लिए वैज्ञानिक सबूतों की पूर्ण अनुपस्थिति थी।''

एक अन्य महत्वपूर्ण कारक जिसने अभियुक्तों के पक्ष में संतुलन बनाया, वह था डॉक्टर प्रियथा द्वारा दिया गया बयान। डॉक्टर प्रियथा ही वह फॉरेंसिक सर्जन थीं ,जिसने लड़की का पोस्टमार्टम किया था। इस गवाह ने प्रति-परीक्षण के दौरान यह कहा था कि लड़की के गुदा में चोट का कारण बवासीर का संक्रमण भी हो सकता है। इसके आधार पर अदालत ने माना कि कोई ऐसा निर्णायक सबूत नहीं था कि लड़की से अप्राकृतिक संबंध बनाए गए थे।

''गवाह नंबर 11, फॉरेंसिक विभाग के सहायक सर्जन, जिन्होंने पोस्टमार्टम परीक्षण किया था, उन्होंने हालांकि माना था कि लड़की के गुदा में लगी चोट एनल पेनिट्रेशन के कारण हो सकती हैं, हालांकि उन्होंने एक वैकल्पिक राय भी दी थी कि यह उस क्षेत्र में हुए संक्रमण के कारण भी हो सकती हैं। पोस्टमार्टम परीक्षण के बाद चिकित्सक द्वारा दी गई राय यह कहने के लिए निर्णायक प्रमाण नहीं है कि लड़की का एनल पेनिट्रेशन हुआ था।

एक विशेषज्ञ साक्ष्य का उपयोग केवल सहयोगी साक्ष्य के उद्देश्य के लिए किया जा सकता है। इस मामले में, ऐसे पुष्ट सबूतों का अभाव है,जिनको गवाह नंबर 11 द्वारा दी गई राय के आधार पर सही माना जाए। इतना ही नहीं इस विशेषज्ञ के बयान से पता चलता है कि उसने खुद एक वैकल्पिक विचार दिया था ,जिसमें माना था कि लड़की के गुदा क्षेत्र में संक्रमण भी हो सकता है।''

अदालत ने यह भी कहा कि बचाव पक्ष के इस तर्क में बल था कि अभियुक्तों को हिरासत में लेने के बाद जांच अधिकारी द्वारा गवाहों के बयानों में हेरफेर किया गया था।

इसके अलावा, अदालत ने अभियोजन पक्ष के उन तथ्यों को भी खारिज कर दिया जो भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के अनुसार अभियुक्त के स्वीकारोक्ति बयान से ली गई जानकारी को दर्शा रहे थे। अभियोजन पक्ष ने कहा कि आरोपी ने पुलिस के समक्ष अपराध का स्थान बताया था।

इसके अलावा अभियोजन पक्ष ने कहा कि अपराध के समय आरोपी द्वारा पहने गए कपड़े भी उसने ही पुलिस को दिखाए थे। लेकिन कोर्ट ने कहा कि धारा 27 के तहत इकबालिया बयान को स्वीकार करने के लिए, खोजे गए तथ्य सिर्फ अभियुक्त की जानकारी में होने चाहिए। यहां, गवाह नंबर 9, 10 और 12 के बयानों में आरोपी के स्वीकारोक्ति बयान से पहले अपराध के कथित स्थान के बारे में उल्लेख किया गया था।

इसके अलावा, यह दिखाने के लिए कोई वैज्ञानिक या अन्य सबूत नहीं थे कि आरोपी के स्वीकारोक्ति बयान के आधार पर जो कपड़े बरामद किए गए थे, ये वहीं कपड़े थे जो अपराध के समय आरोपी द्वारा पहने गए थे।

इस संबंध में न्यायालय ने कहा कि,''इसलिए अभियुक्त का कथित इकबालिया बयान अभियोजन पक्ष के लिए भी उपयोगी नहीं है।'' कोर्ट ने कहा कि परिस्थितियों की पूरी श्रृंखला में अभियोजन पक्ष द्वारा केवल दो परिस्थितियों को ही साबित किया जा सका।

एक आरोपी पीड़ित के घर के पास किराए के मकान में रहता था। दो, आरोपी के पास पीड़ित लड़की के साथ अपराध करने का अवसर था,भले ही वह उसके घर खेलने के लिए गई थी या ट्यूशन लेने के लिए गई थी।

कोर्ट ने कहा कि,''आरोपी को कथित अपराध के साथ जोड़ने के लिए किसी अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्य का अभाव है'', इसलिए आरोपी प्रदीप कुमार को भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (2) (आई) व (एन), 377, 305 और 354 और पॉक्सो अधिनियम की धारा 5 (1) रिड विद धारा 6 और धारा 7 रिड विद धारा 8 और एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम की धारा 3 (1) (डब्ल्यू) (आई) और 3 (2) (वी) (ए) के तहत बरी किया जाता है।

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