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शादी के लिए धर्म बदलना अस्वीकार्य, इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर

LiveLaw News Network
5 Nov 2020 2:47 PM GMT
शादी के लिए धर्म बदलना अस्वीकार्य, इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर
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सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शादी के उद्देश्य से धर्म परिवर्तन करने को अस्वीकार्य करार देते हुए अलग-अलग धर्म से संबंध रखने वाले एक विवाहित जोड़े को पुलिस संरक्षण न देकर एक ''गलत मिसाल'' कायम की है।

यह याचिका एडवोकेट अलदानिश रीन ने दायर की है। वह इस तथ्य से व्यथित हैं कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उक्त आदेश देते समय न केवल गैर-धर्म में विवाह करने वाले कपल को उनके परिवारों की घृणा के सहारे छोड़ दिया है,बल्कि एक गलत मिसाल भी कायम की है कि ऐसे पार्टनर में से किसी एक द्वारा धर्म परिवर्तन करके अंतर-धार्मिक विवाह नहीं किया जा सकता है।

लिली थॉमस बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर भरोसा करते हुए, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले महीने एक शादीशुदा जोड़े को पुलिस सुरक्षा देने से इनकार कर दिया था। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर एक व्यक्ति किसी अन्य धर्म को सिर्फ किसी सांसारिक लाभ या फायदे के लिए अपनाता है, तो यह धार्मिक कट्टरता होगी।

यह कहते हुए कि हाईकोर्ट ने इस निर्णय की ''गलत व्याख्या'' की है, याचिकाकर्ता ने दलील दी कि,

''भारत का संविधान धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार का प्रावधान करता है और इसमें यह भी शामिल है कि किसी व्यक्ति को किसी भी धर्म या किसी भी धर्म को चुनने और उसका प्रचार या किसी भी धर्म को न अपनाने का अधिकार है। इसमें किसी भी धर्म में किसी भी व्यक्ति के धर्म परिवर्तन का अधिकार भी शामिल है। वह जितने बार चाहे धर्म परिवर्तन कर सकता है,इस पर कोई रोक नहीं है। धर्म का चुनाव किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत पसंद है। यदि न्यायालय किसी व्यक्ति को स्वतंत्र रूप से अपना धर्म चुनने की अनुमति नहीं देता है, तो यह उसके या उसके मौलिक अधिकार के उल्लंघन के समान है,जिसकी भारत के संविधान के तहत गारंटी दी गई है।''

प्रस्तुत किया है कि जजमेंट का मतलब यह नहीं है कि शादी के लिए धर्म परिवर्तन करनो सांसारिक लाभ या फायदा है; बल्कि इसका मतलब केवल यह है कि इस तरह का धर्म परिवर्तन शोषण के उद्देश्यों के लिए नहीं होना चाहिए और केवल शोषण को ''सांसारिक लाभ या फायदे'' के रूप में देखा जाता है।

याचिका में कहा गया है कि,

''जब अलग-अलग धर्म के दो वयस्क, एक-दूसरे के प्यार में पड़ जाते हैं और अपने माता-पिता /समाज/ धार्मिक नेताओं आदि की इच्छा के विरुद्ध एक-दूसरे से शादी करने का फैसला करते हैं, तो ऐसे में धर्म बदलने की इच्छा को शोषण नहीं कहा जा सकता है। कानून और अदालतें तभी हस्तक्षेप कर सकती हैं, जब किसी तीसरे व्यक्ति की वजह से सीधा शोषण हो रहा हो...''

गौरतलब है कि याचिकाकर्ता और उसकी बहन (वर्तमान में एससीबीए के संयुक्त कोषाध्यक्ष है) दोनों ही धर्म से मुस्लिम हैं और विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत अपने संबंधित हिंदू पति-पत्नी से विवाह कर चुके हैं।

कहा गया है कि उन्होंने विशेष विवाह अधिनियम की ''बोझिल प्रक्रिया'' और ''अनुचित प्रावधानों'' को देखा है और भागकर शादी करने जोड़े के लिए उक्त प्रावधानों का पालन करना बहुत मुश्किल हो जाता है।

याचिका में कहा है कि व्यावहारिक रूप से, विशेष विवाह अधिनियम केवल उन जोड़ों के लिए है जहां दोनों परिवार ऐसे विवाह के लिए तैयार हैं या कम से कम वह कपल को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहते हैं।

ऐसा इसलिए है क्योंकि अधिनियम एक नोटिस की अवधि को अनिवार्य करता है और इस तरह के नोटिस पर आपत्तियां आमंत्रित करता है, जिससे भागकर शादी करने वाले जोड़ों के लिए मुश्किल होती है।

अधिनियम की धारा 5, 6, 7 और 11 के तहत दी गई प्रक्रिया का हवाला देते हुए, याचिकाकर्ता ने कहा कि,

''इनके तहत भागकर शादी करने वाले जोड़े किसी भी विवाह अधिकारी के समक्ष आवेदन नहीं कर सकते हैं। आवेदन करने से पहले उनमें से किसी एक का संबंधित विवाह अधिकारी के अधिकार क्षेत्र में कम से कम 30 दिनों तक निवास करना जरूरी है। वहीं इसको साबित करने के लिए उनको कोई प्रमाण दिखाना पड़ता है,जैसे कि किराया समझौता आदि जो कि भागकर शादी करने वाले जोड़े के लिए मुश्किल है। इसके अलावा ऐसे विवाह पर आपत्ति मांगी जाती है,जिसमें सिर्फ परिवार के सदस्य ही नहीं समाज का कोई भी व्यक्ति ऐसे विवाह पर अपनी आपत्ति दर्ज करा सकता है और इसके लिए तीस दिन का समय दिया जाता है। ऐसे में विवाह करने के इच्छुक जोड़े को इतने दिन इंतजार करना पड़ता है।

वहीं कपल को ऐसी परिस्थितियों में तीन गवाहों की भी व्यवस्था करनी होती है। जो कि उनके लिए मुश्किल काम होता है।''

याचिकाकर्ता ने हादिया मामले में न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ की टिप्पणियों पर भरोसा किया है और उनको अपनी याचिका में दोहराया,जो इस प्रकार हैंः

''कानून एक वैध विवाह के लिए शर्तों को निर्धारित करता है। यह रिश्तों के उलझने पर पर उपचार प्रदान करता है। न तो राज्य और न ही कानून पार्टनर की पसंद को निर्धारित कर सकता हैं या इन मामलों में निर्णय लेने की हर व्यक्ति की क्षमता को सीमित कर सकते हैं। ये संविधान के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सार हैं।''

इसलिए याचिकाकर्ता ने न्यायालय से आग्रह किया है कि वह भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 को लागू करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के उक्त आदेश को रद्द कर दें और संबंधित दंपति को तत्काल पुलिस सुरक्षा प्रदान करे।

आगे यह भी मांग की गई है कि विशेष विवाह अधिनियम 1954 के प्रावधानों को चुनौती देने वाले विभिन्न हाईकोर्ट में लंबित सभी मामलों को सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया जाए और उन पर निर्णय दिया जाए ताकि पूरे देश के लिए अधिनियम में एकरूपता लाई जा सकें।

वैकल्पिक रूप से यह भी प्रार्थना की गई है कि एक सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक समिति बनाई जाए,ताकि वह विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के प्रभावी कार्यान्वयन के संबंध में उपयुक्त संशोधनों की अनुशंसा कर सकें।

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