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सीएए/एनआरसी के विरोध 'गैर कानूनी' नहीं है: प्रदर्शनकारियों को दिए जमानत आदेश में कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा

LiveLaw News Network
19 Feb 2020 6:02 AM GMT
सीएए/एनआरसी के विरोध

कर्नाटक हाईकोर्ट ने यह देखते हुए कि "जांच दुर्भावानापूर्ण और पक्षपातपूर्ण प्रतीत हो रही है," 22 लोगों को जमानत देदी है।

मैंगलोर पु‌लिस ने उन लोगों पर घातक हथ‌ियारों से लेस होकर गैर कानूनी सभा करने, मैंगलोर के उत्तर पुलिस थाने को जलाने का प्रयास करने, पुलिस की ड्यूटी में बाधा डालने, सार्वजनिक संपत्त‌ि को नुकसान पहुंचाने और 19 दिसंबर, 2019 को धारा 144 सीआरपीसी के तहत पुलिस आयुक्त, मैंगलोर द्वारा लगाए गए निरोधात्मक आदेश का उल्लंघन करने के आरोप लगाया था। आरोपी कथित रूप से नागरिकता संशोधन अधिनियम के विरोध में आयोजित रैली का हिस्सा ‌थे।

जस्टिस जॉन माइकल कुन्हा ने आरोपियों को जमानत देते हुए कहा;

"ऐसे अपराध में, जिनमें आरोपियों की संख्या ज्यादा हो, प्रत्येक अभियुक्त की पहचान और भागीदारी को पर्याप्त सुनिश्चितता के साथ तय किया जाना चाहिए।"

वर्तमान मामलों में, एसपीपी- I द्वारा पेश किए गए केस रिकॉर्डों के अध्ययन से प्रतीत होता है कि कथित घटना में शमिल अभियुक्तों की पहचान उनकी पीएफआई (पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया) से संबद्धता के आधार पर तय की गई है और वे मुस्लिम समुदाय के हैं। हालांकि यह कहा गया है कि याचिकाकर्ताओं की संलिप्तता सीसीटीवी फुटेज और तस्वीरों में कैद है, जबकि न्यायालय के समक्ष ऐसी कोई सामग्री नहीं पेश की गई है, जिसमें किसी भी याचिकाकर्ता की घातक हथियारों से लैस होकर मौजूदगी दिखती हो।"

राज्य सरकार की ओर से दी गई एक आपत्ति कि 19 दिसंबर 2019 को मुस्लिम युवाओं द्वारा केंद्र सरकार द्वारा लागू सीएए का विरोध किए जाने की सूचना थी, और उस संबंध में, पुलिस आयुक्त, मंगलुरु ने धारा 144 सीआरपीसी के तहत 18 ‌दिसंबर 2019 रात 9 बजे से 20 दिसंबर 2019 को आधी रात 12 बजे तक निषेधाज्ञा लागू की ‌थी, अदालत ने कहा "यह दावा इंगित करता है कि सभा का सामान्य उद्देश्य सीएए और एनआरसी के कार्यान्वयन का विरोध था जो खुद आईपीसी की धारा 141 के अंतर्गंत 'गैर-कानूनी उद्देश्य' नहीं है।

जांच एजेंसियों द्वारा इकट्ठा किए गए साक्ष्यों पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा;

"जांच एजेंसी द्वारा इकट्ठा की गई सामग्री में किसी भी याचिकाकर्ता के घटनास्‍थल पर मौजूद रहने के संबंध में कोई वि‌शिष्ट सबूत नहीं है, दूसरी ओर, 1500 - 2000 की मुस्लिम भीड़ के खिलाफ व्यापक आरोप लगाए गए हैं, और कहा गया है कि वे पत्थरों, सोडा की बोतलों और कांच के टुकड़ों जैसे हथियारों से लैस ‌थे।

एसपीपी-I ने जो तस्वीरों पेश की हैं, उनसे पता चलता है कि भीड़ में से शायद ही किसी सदस्य के पास हथियार थे, एक को छोड़कर जिसने आपने हाथ में बोतल ले रखी थी। इनमें से किसी भी तस्वीर में पुलिस स्टेशन या पुलिसकर्मी आसपास नहीं द‌िख रहे हैं। दूसरी ओर, याचिकाकर्ताओं द्वारा पेश तस्वीरों से पता चलता है कि पुलिसकर्मी खुद भीड़ पर पथराव कर रहे थे।"

पीठ ने इस तथ्य पर भी विचार किया कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ 31 एफआईआर दर्ज की, जबकि घायलों के परिवार और पुलिस के गोली में मारे गए लोगों के परिजनों की की शिकायतों पर कोई मामला दर्ज नहीं किया गया है।

कोर्ट ने कहा-

"भले ही कानून की आवश्यकता है कि संज्ञेय अपराध में लिप्त पुलिस अधिकारियों के खिलाफ की गई विशेष ‌शिकायतों में पुलिस स्वतंत्र एफआईआर दर्ज करे, फिर भी मौजूदा मामले में प्रतिवादी पुलिस एफआईआर दर्ज करने में विफल रही है, जो यह दिखाता है पुलिस की मनमानी पर निर्दोष लोगों की फंसाकर पुलिस की ज्यादतियों को जानबूझकर छ‌िपाने का प्रयास किया जा रहा है।

पुलिस का अतिद्वेष भी इस बात से जाहिर होता है कि पुलिस के हाथों मारे गए व्यक्तियों के खिलाफ भी आपीसी की धारा 307 के तहत एफआईआर दर्ज की गई है। पीड़ितों द्वारा दर्ज की गई शिकायतों के आधार पर एफआईआर दर्ज करने में पुलिस की विफलता और पुलिस पर लगे आरोपों में पृष्ठभूमि में, झूठे और गलत आरपों की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है।"

पीठ ने जमानत देने के आदेश पर कहा-

"उपरोक्त परिस्थितियों में, याचिकाकर्ताओं को जमानत देने से इनकार करना और उनकी स्वतंत्रता को जिला प्रशासन और पुलिस की दया के भरोसे छोड़ देना न्याय के साथ मज़ाक होगा। रिकॉर्ड्स से प्रतीत होता है कि कि साक्ष्यों को जान बूझकर खत्म करने की कोश‌िश की गई और याचिकाकर्ताओं की स्वतंत्रता छीनने के लिए सबूत गढ़े गए।

जांच दुर्भावनापूर्ण और पक्षपातपूर्ण प्रतीत होती है, उक्त परिस्थितियों में, याचिकाकर्ताओं के अधिकारों और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए, उन्हें जमानत देना आवश्यक है।"

अदालत ने अभियुक्तों को एक लाख रुपए के बांड पर जमानत देने का निर्देश दिया। साथ ही उन्हें निर्देश दिया गया है कि जब भी आवश्यकता हो न्यायालय के समक्ष उपस्थित हो और ऐसी ही अपराधों में शामिल न हों। न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को बिना अनुमति के ना छोड़ें।

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