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व्यक्‍तिगत स्वंतत्रता से जुड़े मामलों में हमारे जजों को अपनी रीढ़ दिखाने की जरूरत हैः जस्टिस लोकुर

LiveLaw News Network
22 Nov 2019 5:08 AM GMT
व्यक्‍तिगत स्वंतत्रता से जुड़े मामलों में हमारे जजों को अपनी रीढ़ दिखाने की जरूरत हैः जस्टिस लोकुर
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जस्टिस लोकुर ने संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के बाद कश्मीर घाटी में मौलिक अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के उल्लंघन की ओर इशार किया है।

सुप्रीम कोर्ट के हालिया न्यायिक और प्रशासनिक फैसलों के खिलाफ कड़ी टिप्पणी करते हुए, जस्टिस मदन लोकुर ने कहा कि भारत के मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे ने ऐसे समय में पदभार ग्रहण किया था, जब उन्हें सुप्रीम कोर्ट की "विश्वसनीयता और महत्ता बहाल करने" के "अवांछनीय कार्य" का सामना करना पड़ेगा।

सुप्रीम कोर्ट हाल ही में एक के बाद एक कई विवादास्पद मामलों को सूचीबद्घ करने के कारण सुर्खियों में रहा। जस्टिस बोबडे पर सोमवार को सीजेआई का कार्यभार संभालने के साथ ही ऐसे मामलों का निपटने करने की जिम्‍मेदारी होगी।

हिंदुस्तान टाइम्स में लिखे एक लेख में जस्टिस लोकुर ने संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के बाद कश्मीर घाटी में मौलिक अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के उल्लंघन की ओर इशार किया और कहा,

"कुछ हालिया न्यायिक फैसले और प्रशासनिक फैसले से लगता है कि हमारे कुछ न्यायधीशों को अपनी रीढ़ दिखाने की ज़रूरत है, विशेष रूप से व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मुद्दों से निपटने में- किसी को भी प्रभावी उपाय के बिना मात्र इस कारण जेल में डाला या रखा नहीं जा सकता है, क्योंकि जजों को सीलबंद कवर में सूचना पास की गई है या उनके पार समय नहीं है (शायद कॉपी-पेस्ट को छोड़कर) या गलत सूचना के कारण या कोई व्यक्ति जेल में सुरक्षित है।"

जजों की नियुक्ति और स्थानांतरण से संबंधित कॉलेजियम के हालिया फैसलों के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा,

"यदि संवैधानिक न्यायालयों के न्यायाधीशों के स्थानांतरण में राहत प्रदान करने में कानून के बारे में उनकी समझदारी (शायद गलत हो) के लिए भी विचार किया जा सकता है, तो एक अभियुक्त महज मजिस्ट्रेट या सत्र न्यायाधीश से क्या उम्मीद कर सकता है?"

यह पहली बार नहीं है जब जस्टिस लोकुर ने असंगत और अस्पष्टीकृत न्यायिक नियुक्तियों पर अपना रोष व्यक्त किया है। पिछले महीने उन्होंने सुझाव दिया था कि कॉलेजियम के फैसले निश्चित रूप से सत्तारूढ़ सरकार के प्रभाव में किए जाते हैं, ताकि उनकी प्राथमिकताओं और प्रतिशोधों को समाहित किया जा सके।

उन्होंने कहा इन्हीं टिप्‍पणियों में जोड़ते हुए कहाः

"कानूनी बिरादरी के भीतर मौन आशंकाओं और बंद तोते और उसके चचेरे भाई द्वारा वकीलों और नागरिकों की छापेमारी और गिरफ्तारी का डर को दूर करना उस विश्वास को पैदा करेगा।"

उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को न्यायाधीशों की नियुक्तियों के कारणों के "आभासी गैर-प्रकटीकरण" के नए पैटर्न को रोकना चाहिए और इसके बजाय न्यायपालिका और आम जनता के बीच संचार के माध्यमों को खुला रखना चाहिए।

"पारदर्शिता एक पेंडुलम की तरह नहीं है। कुछ साल पहले तक का कोलेजियम के प्रस्तावों के माध्यम से न्यायाधीशों की नियुक्तियों का खुलासा हाल के दिनों में एक आभासी गैर-प्रकटीकरण की ओर बढ़ गया है। जजों के बीच एक संतुलन कायम होना चाहिए और एक स्वतंत्र और स्पष्ट चर्चा होनी चाहिए। ज‌स्टिस लोकुर ने कहा।

उन्होंने सुझाव दिया कि जजों के विश्वास को बहाल करने और संस्थागत समर्थन और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए, "सभी स्तरों पर जजों को यह विश्वास दिया जाना चाहिए कि उन्हें ईमानदार फैसलों के लिए "दंडित" नहीं किया जाएगा, भले ही वह निर्णय गलत हो।"

इसके अलावा, उन्होंने सुझाव दियाकि जस्टिस बोबडे को "सभी न्यायाधीशों में विश्वास जगाने का प्रयास करना चाहिए कि वे कानून और संविधान के अनुसार अपने कर्तव्यों के निर्वहन में पूरी तरह से सुरक्षित रहेंगे।"

न्यायमूर्ति लोकुर ने अपनी अंतिम टिप्पणी में कहा कि क्या नागरिक न्यायपालिका में विश्वास बनाये रख सकते हैं, जो ''अभी तक रेंग तो नहीं रही मगर झुकने लगी है"

जस्टिस लोकुर दिसंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट से रिटायर्ड हुए थे और इन दिनों फिजी के सुप्रीम कोर्ट के नॉन-रेजिडेंट पैनल में जज के रूप में कार्यरत हैं।

इससे पहले वो जस्टिस बोबडे नीत इन-हाउस पैनल पर, जिसे पूर्व CJI रंजन गोगोई के खिलाफ यौन उत्पीड़न की जांच करने का काम सौंपा गया था, "संस्थागत पूर्वाग्रह" का आरोप लगा चुके हैं।

उन्होंने कहा थाः

"कई सवालों को अनुत्तरित छोड़ दिया गया है और वास्तव में कई एक रहस्य के अंदर लिपटी हुई पहेली को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं। कुछ पारदर्शिता की आवश्यकता है। क्या आंतरिक समिति का कोई सदस्य या सुप्रीम कोर्ट का कोई सदस्य मदद कर सकता है?"

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