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सीपीसी का ऑर्डर 8 रूल 6 एः लिखित बयान दाखिल हो जाने के बाद भी प्रति-दावे पर रोक नहीं

LiveLaw News Network
20 Nov 2019 7:47 AM GMT
सीपीसी का ऑर्डर 8 रूल 6 एः लिखित बयान दाखिल हो जाने के बाद भी प्रति-दावे पर रोक नहीं
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तीन जजों की पीठ ने कहा कि सीपीसी के ऑर्डर 8 रूल 6 ए लिखित बयान दर्ज होने के बाद प्रति-दावा दाखिल करने पर कोई रोक नहीं लगाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि एक अदालत अपने विवेक का प्रयोग कर मुकदमे के मुद्दों को तैयार होने तक लिखित बयान के बाद भी प्रति-दावा दाखिल करने की अनुमति दे सकती है।

जस्टिस एनवी रमाना की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने कहा कि सीपीसी के ऑर्डर 8 रूल 6 ए लिखित बयान दर्ज होने के बाद प्रति-दावा दाखिल करने पर कोई रोक नहीं लगाता है।

सन्दर्भ

तीन जजों वाली बेंच, जिसमें जस्टिस मोहन एम शांतनगौदर और जस्टिस अजय रस्तोगी भी शामिल हैं, ने दो जजों की पीठ द्वारा संदर्भित एक कानूनी मुद्दे का जवाब दिया था, जिसमें पूछा गया था कि क्या नागरिक प्रक्रिया संहिता के ऑर्डर 8 रूल 6 ए की भाषा आदेशात्मक है?, दूसरे शब्दों में, क्या सीपीसी का ऑर्डर 8 रूल 6A लिखित बयान दर्ज करने के बाद प्रति-दावा दाखिल करने पर रोक लगाने का आदेश देता है?

सीपीसी का ऑर्डर 8 रूल 6 ए क्या है?

रूल 6 ए प्रतिवादी के प्रतिवाद से संबंधित है, जिसके अनुसार किसी मुकदमे में एक प्रतिवादी, नियम 6 के तहत मुजरा (Set Off) की दलील के अपने अधिकार के अलावा, वादी के दावे के खिलाफ काउंटर-क्लेम के जरिए, वादी के खिलाफ या तो मुकदमा दाखिल होने से पहले या बाद में प्रतिवादी के खिलाफ कार्रवाई के कारण के संबंध में कोई भी हक या दावा खड़ा कर सकता है, हालांकि ये प्रतिवादी के अपना बचाव रखने से पहले या बचाव पक्ष देने के लिए निर्धारित समय से पहले खड़ा किया जाए। ये प्रति-दावा नुकसान की दावेदारी की प्रकृति का हो या नहीं, तो भी।

काउंटर-क्लेम की आड़ में समय-बद्घ मुकदमों को स्वीकार नहीं किया जा सकता है

बेंच ने कहा कि प्रतिवाद दायर करने के लिए समय सीमा स्पष्ट रूप से विधानमंडल द्वारा प्रदान नहीं की जाती है, बल्कि कार्रवाई के कारण के उपबंध के रूप में केवल सीमा प्रदान की जाती है। बेंच ने कहा:

"ऐसा कहने के बाद, इसका मतलब यह नहीं है कि लिखित बयान दर्ज करने के बाद किसी भी समय जवाबी दावा दायर किया जा सकता है। जैसा कि जवाबी दावे को वादी माना जाता है, आमतौर पर इसके तहत प्रदान की गई समय सीमा की सीमा अधिनियम, 1963 के तहत सबसे पहले अनुपालन करने की आवश्यकता होती है, समय-बद्घ मुकदमों का काउंटर-क्लेम की आड़ में, मात्र इस तथ्य के कारण कि कार्रवाई का कारण आदेश 8 रूल 6A के मापदंडों के अनुसार उत्पन्न हुआ है, का स्वागत नहीं किया जा सकता है।"

जवाबी दावा दायर करने की बाहरी सीमा का संबंध मुद्दों को फ्रेम करने से है

बेंच ने संदर्भ (अशोक कुमार कालरा बनाम विंग सीडीआर सुरेंद्र अग्निहोत्री) का जवाब देते हुए कहाः

प्रतिबंध केवल कार्रवाई के कारण के संबंध में है। ऐसा कहने के बाद, यह प्रतिवादी को पर्याप्त विलंब के साथ प्रति-दावा दायर करने का अधिकार नहीं देता है, भले ही निर्धारित अवधि समाप्त न हुई हो। अदालत को जवाबी दावा दायर करने के लिए बाहरी सीमा को ध्यान में रखना पड़ता है, जो मुद्दों को फ्रेम किए जाने तक आंकी जाती है। इस तरह के मामलों में अदालत के पास, नीचे दिए गए समावेशी कारकों पर विचार और मूल्यांकन करने के बाद, जो केवल उदाहरण हैं, संपूर्ण नहीं, प्रति-दावा दाखिल करने का दावे को स्वीकार करने का विवेक है

1-देरी की अवधि।

2- मांगी गई कार्यवाही के लिए निर्धारित सीमा अवधि।

3- देरी का कारण।

4- प्रतिवादी का अपने अधिकार का दावा।

5- मुख्य अभियोग और प्रति-दावे के बीच कार्रवाई के कारण की समानता।

6- नए मुकदमेबाजी की लागत।

7- अन्याय और प्रक्रिया का दुरुपयोग।

8- विपरीत पक्ष के प्रति पूर्वाग्रह।

9- और प्रत्येक मामले के तथ्य और परिस्थितियां।

10- किसी भी मामले में, मुद्दे तय हो जाने के बाद नहीं।

क्या यह मुद्दों फ्रेम हो जाने के बाद दायर किया जा सकता है? बहुमत ने कहा, नहीं

एक अन्य राय में, जस्टिस शांतनगौदर ने कहा, असाधारण परिस्थितियों में, वादी की ओर से साक्ष्य की रिकॉर्डिंग शुरू करने के चरण तक एक प्रति-दावा दाखिल करने की अनुमति दी जा सकती है। बहुमत, इस संबंध में मानता है किः

"हालांकि हम इस विचार के हैं कि प्रतिवादी को मुद्दों फ्रेम हो जाने के बाद और मुकदमा पर्याप्त मात्रा में आगे बढ़ जाने के बाद प्रतिवाद दायर करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। यह न्याय के उद्देश्य को समाप्त कर देगा और त्वरित न्याय के सिद्धांत के लिए हानिकारक होगा, जैसा क‌ि सीपीसी के विशेष संशोधन के लिए कारणों और उद्देश्यो में निहित है।"

हालांकि जस्टिस शांतनगौदर ने कहा कि कि इस चरण के बाद प्रति-दावों की अनुमति देना, मुद्दों का निर्धारण न केवल मुकदमे को लम्बा खींच देगा, बल्कि उन अधिकारों को भी पूर्वाग्रह से ग्रसित कर देगा जो समय के साथ वादी के साथ निहित हो सकते हैं, लेकिन उन्होंने राय दी कि सबूतों की रिकॉर्डिंग शुरू होने के बाद प्र‌ति दावा दा‌खिल करना अवैध नहीं है। उन्होंने कहाः

असाधारण परिस्थितियों में, कार्यवाही की बहुलता और प्रभावी पुन: परीक्षण की स्थिति को रोकने के लिए, कोर्ट मुद्दों के निर्धारण के बाद भी, जब तक कि साक्ष्य दर्ज करना शुरू नहीं किया है, प्रतिवाद स्वीकार कर सकती है; इसका कारण यह है कि मुद्दों के निर्धारण और साक्ष्य की रिकॉर्डिंग शुरू होने के बीच हस्तक्षेप की अवधि के दौरान कानूनी कार्यवाही में कोई महत्वपूर्ण बढ़ोतरी नहीं होती है। यदि इस अवधि के दौरान एक जवाबी दावा लाया जाता है, तो यदि आवश्यक हो, किसी पक्ष के अधिकारों के गंभीरता के साथ पक्षपात किए बिना और उस के मुताबिक साक्ष्य दर्ज करते हुए कोर्ट द्वारा एक नया मुद्दा तैयार किया जा सकता है।


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