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[सीपीसी : ऑर्डर VII नियम 10 एवं 10ए] वाद लौटाये जाने पर उसे नये सिरे से सुना जाएगा : सुप्रीम कोर्ट

LiveLaw News Network
7 Aug 2020 5:45 AM GMT
[सीपीसी : ऑर्डर VII नियम 10 एवं 10ए] वाद लौटाये जाने पर उसे नये सिरे से सुना जाएगा : सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि यदि नागरिक प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के ऑर्डर VII नियम 10 और 10ए के तहत किसी वाद को समुचित अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए वापस किया जाता है, तो मुकदमा नये सिरे से आगे बढ़ेगा।

संदर्भ

न्यायमूर्ति रोहिंगटन फली नरीमन, न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा और न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी की खंडपीठ इस बाबत एक संदर्भ का जवाब दे रही थी। गत वर्ष न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस की खंडपीठ ने 'तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम लिमिटेड बनाम मॉडर्न कंस्ट्रक्शन [(2014) 1 एससीसी 648]' तथा 'जोगिन्दर तुली बनाम एस एल भाटिया [(1997) 1 एससीसी 502]' मामलों में दिये गये फैसलों के बीच स्पष्ट विरोधाभास के मद्देनजर कहा था कि इस मसले पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। यह कहा गया था कि जब तक कोई पक्षकार यह साबित नहीं करता कि बगैर अधिकार क्षेत्र वाले कोर्ट के समक्ष मुकदमे की सुनवाई किया जाना वास्तविक तौर पर पूर्वग्रह से ग्रसित है, तब तक उस मुकदमे की समुचित अदालत में नये सिरे से सुनवाई व्यापक हित में नहीं होगी।

'मॉडर्न कंस्ट्रक्शन' मामले में पुनर्विचार की आवश्यकता नहीं है

बेंच ने संदर्भ का जवाब देते हुए कहा कि दोनों फैसलों के बीच कोई विभेद नहीं है। इसने कहा कि जैसा कि जोगिन्दर तुली मामले में कानून को लेकर कोई चर्चा नहीं है, इसलिए इसका कानून के तौर पर कोई अधिमान मूल्य नहीं है।

बेंच ने कहा :

"हम संबंधित कानून पर विचार करने के बाद मॉडर्न कंस्ट्रक्शन और जोगिन्दर तुली मामलों में दिये गये फैसलों में कोई विरोधाभास नहीं पाते हैं और हमें इस पर पुनर्विचार की जरूरत नहीं महसूस होती है। 'मॉडर्न कंस्ट्रक्शन' मामले में कानून की प्रामाणिक व्याख्या की गयी है। हम तदनुसार संदर्भ का जवाब देते हैं।"

'ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम तेजपारस एसोसिएट्स एंड एक्सपोर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड' का फैसला निष्प्रभावी

कोर्ट ने ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड [(2019) 9 एससीसी 435] मामले में दिये गये उस फैसले को भी खारिज कर दिया, जिसमें सीपीसी में 1997 में संशोधन के जरिये ऑर्डर VII में नियम 10ए जोड़े जाने के मद्देनजर कहा गया था कि यह नहीं कहा जा सकता कि सभी परिस्थितियों में किसी समुचित अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए लौटाये गये वाद को नयी फाइलिंग के तौर पर विचार किया जायेगा।

बेंच ने कहा कि सीपीसी के ऑर्डर VII नियम 10ए की भाषा नागरिक प्रक्रिया संहिता की धारा 24(2) और 25(3) की भाषा के विपरीत है।

"सांविधिक व्यवस्था अब स्पष्ट हो गयी है। अधिकार क्षेत्र वाले एक कोर्ट से दूसरे कोर्ट में मुकदमे को हस्तांतरित किये जाने से जुड़े मामलों में कोर्ट के पास धारा 24(2) और 25(3) के तहत विशेषाधिकार मौजूद है कि उस मामले की सुनवाई नये सिरे से शुरू होगी या उस बिंदु से जहां तक सुनवाई पहुंच चुकी थी या याचिका वापस ले लिया गया था, लेकिन ऑर्डर VII नियम 10 और 10ए के तहत ऐसा विशेषाधिकार नहीं दिया गया है और मुकदमा नये सिरे से ही आगे बढ़ेगा।"

'मॉडर्न कंस्ट्रक्शन' [(2014)1 एससीसी 648] निर्णय

इस फैसले में यह व्यवस्था दी गयी थी कि ऐसी स्थिति में, सक्षम अधिकार क्षेत्र वाले कोर्ट के समक्ष वाद प्रस्तुत किये जाने के बाद उसे नये वाद के रूप में मानकर उसका ट्रायल नये सिरे से किया जाएगा, भले ही बगैर अधिकार क्षेत्र वाले कोर्ट में उसकी सुनवाई पूरी ही क्यों न हो गयी हो। कोर्ट ने इस प्रकार कहा था, "जिस अदालत में केस लगाया गया था और उसका मानना है कि उसे सुनने का अधिकार नहीं है, तो उस वाद को सीपीसी के ऑर्डर 7 नियम 10 के प्रावधानों के मद्देनजर लौटाया जाता है और वादी इसे सक्षम अधिकार क्षेत्र वाले कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है। इस प्रकार के तथ्यात्मक सांचे में, वादी परिसीमन अधिनियम की धारा 14 के प्रावधानों के मद्देनजर बगैर अधिकार क्षेत्र वाले कोर्ट के समक्ष गंवाये समय को लिमिटेशन पीरियड से अलग रखे जाने का हकदार है, साथ ही वादी कोर्ट फीस के तौर पर चुकायी गयी रकम को भी समायोजित करने की मांग कर सकता है। हालांकि, सक्षम अधिकार क्षेत्र वाले कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत वाद को नया वाद समझा जाता है और उसकी सुनवाई नये सिरे से होती है, भले ही संबंधित वाद बगैर अधिकार क्षेत्र वाले कोर्ट ने सुनवाई पूरी ही क्यों न कर ली हो।"

केस का नाम : मेसर्स ईएक्सएल कैरियर्स बनाम फ्रैंकफिन एविएशन सर्विसेज प्राइवेट लिमिटैड

केस नं. : सिविल अपील नं. 2904/2020

कोरम : न्यायमूर्ति आर एफ नरीमन, न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा और न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी

वकील: सीनियर एडवोकेट मनोज स्वरूप और पी. एस. पटवाली

जजमेंंट की प्रति डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें



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