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निर्भया केस : दोषियों को अलग- अलग फांसी देने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई 23 मार्च के लिए टाली, 20 मार्च को होनी है फांसी

LiveLaw News Network
5 March 2020 11:28 AM GMT
निर्भया केस : दोषियों को अलग- अलग फांसी देने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई 23 मार्च के लिए टाली, 20 मार्च को होनी है फांसी
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निर्भया गैंगरेप और हत्या मामले में केंद्र और दिल्ली सरकार की उस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट 23 मार्च को सुनवाई करेगा जिसमें दोषियों को अलग- अलग फांसी देने का अनुरोध किया गया है। हालांकि पटियाला हाउस कोर्ट ने चारों दोषियों को फांसी देने के लिए 20 मार्च के लिए नया डेथ वारंट जारी किया है।

गुरुवार को सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जस्टिस आर बानुमति, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस नवीन सिन्हा की पीठ को बताया कि पटियाला हाउस कोर्ट ने नया डेथ वारंट तो जारी किया है लेकिन दोषी इसे भी फिर से उलझा सकते हैं इसलिए दो दोषियों को तो फांसी देने के आदेश जारी किए जा सकते हैं।

वहीं वकील ए पी सिंह ने पीठ को बताया कि दोषी अक्षय ने राष्ट्रपति के पास दूसरी दया याचिका भेजी है जो अभी लंबित है।

इससे पहले 13 फरवरी को पीठ ने चारों दोषियों को जवाब देने के लिए एक और दिन का समय दे दिया था।

इसके साथ ही पीठ ने वरिष्ठ वकील अंजना प्रकाश को दोषी पवन की ओर से बहस करने के लिए एमिक्स क्यूरी के तौर पर नियुक्त किया था। सुनवाई के दौरान दोषी मुकेश की ओर से पेश वृंदा ग्रोवर और विनय व अक्षय की ओर से ए पी सिंह ने जवाब देने के लिए कुछ समय और मांगा था।

इससे पहले पीठ ने ये साफ किया था कि सुप्रीम कोर्ट में लंबित सुनवाई का ट्रायल कोर्ट द्वारा नया डेथ वारंट जारी करने के मामले में असर नहीं डालेगा।

पीठ ने केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को बताया था कि दिल्ली हाईकोर्ट ने एक सप्ताह के भीतर सारे कानूनी उपाय पूरे करने को कहा था लेकिन एक दोषी ने याचिका दाखिल नहीं की। दोषी देश के धैर्य का परीक्षण कर रहे हैं। सरकार कानून के जनादेश का पालन कर रही है ना कि वो अपनी खुशी के लिए फांसी देना चाहती है।

पीठ ने कहा था कि ऐसे में जेल प्रशासन ट्रायल कोर्ट में नया डेथ वारंट जारी करने को लेकर आवेदन दाखिल कर सकती है।

दरअसल सुप्रीम कोर्ट केंद्र और दिल्ली सरकार की उस याचिका पर जल्द सुनवाई के लिए तैयार हो गया था जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट ने दोषियों के अलग- अलग फांसी देने से इनकार कर दिया था। केंद्र और दिल्ली सरकार ने तुरंत हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी थी।

दिल्ली हाईकोर्ट में जस्टिस सुरेश कुमार कैत ने चार फरवरी अहम फैसला सुनाते हुए कहा था कि दोषियों को अलग- अलग फांसी नहीं जी जा सकती। हाईकोर्ट ने केंद्र की मांग ठुकराते हुए निर्देश दिया था कि दोषी अपने सारे विकल्प एक सप्ताह के भीतर आजमा लें। इसके बाद उनकी मौत की सजा के लिए कार्रवाई शुरू होगी।

जस्टिस कैत ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट तक उनकी मौत की सजा एक आदेश से आई है इसलिए हमारी राय में अलग- अलग- अलग फांसी नहीं हो सकती। हालांकि पीठ ने दोषियों द्वारा खेले जा रहे सारे कानूनी दांव पेंचों पर नाराज़गी जताई थी और कहा कि वो जानबूझकर देरी कर रहे हैं और संविधान के अनुच्छेद 21 की आड़ ले रहे हैं।

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