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उत्तराखंड में बड़े पैमाने पर डंप किया जा रहा है कचरा, एनजीटी ने सरकार से फोटो के सहारे किए गए प्रदूषण के दावों की जांच करने को कहा, पढ़िए आदेश

LiveLaw News Network
29 Aug 2019 12:19 PM GMT
उत्तराखंड में बड़े पैमाने पर डंप किया जा रहा है कचरा, एनजीटी ने सरकार से फोटो के सहारे किए गए प्रदूषण के दावों की जांच करने को कहा, पढ़िए आदेश
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उत्तराखंड की पहाड़ियों और ऊंचाई वाले तीर्थस्थलों में सभी प्रकार के कचरे को बड़े पैमाने पर डंप किए जाने की तस्वीरों के साथ बढ़ते प्रदूषण के दावों पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने राज्य सरकार को तस्वीरों में किए गए दावों को सत्यापित करने और इस बारे में एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए कहा है।

एनजीटी के चेयरपर्सन जस्टिस ए के गोयल की अध्यक्षता वाली पीठ ने मुख्य सचिव, उत्तराखंड को एनजीओ फ्रेंड्स और इंटरनेशनल यूनियन ऑफ फॉरेस्ट रिसर्च ऑर्गनाइजेशन के पूर्व अध्यक्ष डॉक्टर अजय सिंह रावत द्वारा किए गए दावों का सत्यापन करने का निर्देश दिया है।

अधिवक्ता और पर्यावरण कार्यकर्ता आकाश वशिष्ठ के माध्यम से अपनी याचिका दायर करने वाले याचिकाकर्ताओं ने उन तरीकों पर सवाल उठाया है, जिनसे अपशिष्ट को अवैध रूप से डंप किया गया। उनका यह दावा है कि इस तरह डंपिंग करने से हवा, नदियां, भूजल और राज्य के समग्र वातावरण प्रदूषित हुआ और अपने दावे का समर्थन करने के लिए उन्होंने कई तस्वीरें पेश कीं।

वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव दत्ता ने पीठ को बताया, "राज्य की पूरी पहाड़ियां हर जगह अनियंत्रित डंपिंग के कारण संकट में थीं। कचरा फेंका जाता है, जमा हो जाता है और फिर उसमें आग लगा दी जाती है। इस समस्या की जड़ बड़े होटल, रिसॉर्ट और रेस्तरां हैं। पर्यटक पहाड़ियों को लूट रहे हैं।"

चूंकि पीठ पहले ही एक अन्य याचिका में इस विषय को सुन चुकी है, इसलिए उसने आदेश दिया, "मुख्य सचिव, उत्तराखंड को संबंधित विभागों, विशेषकर वन और सिंचाई विभागों से तस्वीरों के संदर्भ में सत्यापित तथ्यों को प्रस्तुत करना चाहिए और इस बारे में एक रिपोर्ट प्रस्तुत करनी चाहिए।"

कचरे का ढेर एक आम दृश्य

याचिका में कहा गया है कि, "राज्य के हर कस्बे या जगह पर, कचरे को डंप करना एक नियमित काम बन गया है और कचरे का ढेर एक आम दृश्य बन गया है। इस कचरे का अधिकांश भाग होटल, रिसॉर्ट्स और पर्यटकों द्वारा किया जाता है।" घरों, रेस्तरां और स्थानीय आबादी भी इसमें शामिल हैं। इस मुद्दे की भयावहता इतनी अधिक है कि बद्रीनाथ, केदारनाथ, यमुनोत्री, गंगोत्री और गौमुख जैसे उच्च-ऊंचाई वाले तीर्थस्थल भी हर तरह के कचरे से भरे हैं। इन उच्च ऊंचाई में भी अत्यधिक प्रदूषण हो गया है।

"प्लास्टिक, पॉलिथीन, कांच, आदि से बनी शराब की बोतलें, एल्युमिनियम के डिब्बे, चिकित्सा अपशिष्ट, पशुओं के मांस का डंपिंग उत्तराखंड के वातावरण को ज़बरदस्त और अपूरणीय क्षति पहुंचा रहा है। इस तरह का गैर कानूनी डंपिंग राज्य में चोटियों और ग्लेशियरों के लिए सबसे बड़ा खतरा है।ये चोटियां और ग्लेशियर पानी का प्रत्यक्ष स्रोत हैं और कई नदियों और नदियों की उत्पत्ति और देश की जीवनरेखा हैं।"

तेंदुआ कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के पास कचरे को चबाते हुए पाया गया

"कुछ चौंकाने वाले उदाहरणों में, एक तेंदुआ कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के पास कचरे को चबाते हुए पाया गया था। हेमकुंड साहिब में लक्ष्मण गंगा के स्रोत पर भी कचरा डाला गया है, जो 14.2202 फीट की ऊंचाई पर है। आगे, बाराहाट, उत्तरकाशी में कचरा 30 ट्रकों में लादकर नगर पालिका प्रशासन द्वारा बहुत पवित्र भागीरथी नदी में फेंक दिया गया। रुद्रप्रयाग, एक छोटे से हिमालयी शहर में नगर पालिका अवैध रूप से अलकनंदा नदी और नदी के करीब के क्षेत्रों में ठोस कचरे को डंप कर रही है।"

यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय द्वारा 2018 में राज्यसभा में दिए गए एक लिखित जवाब से पता चला कि ठोस अपशिष्ट के प्रसंस्करण के मामले में उत्तराखंड देश में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला राज्य है, क्योंकि यह 1406 टन अपशिष्ट का उत्पादन करता है।



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