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मोटर दुर्घटना मुआवजा : 'प्रणय सेठी' निर्णय अधिक लाभ प्रदान करने वाले क़ानून के संचालन को सीमित नहीं करता: सुप्रीम कोर्ट

LiveLaw News Network
8 Aug 2021 12:58 PM GMT
मोटर दुर्घटना मुआवजा : प्रणय सेठी निर्णय अधिक लाभ प्रदान करने वाले क़ानून के संचालन को सीमित नहीं करता: सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 'प्रणय सेठी' मामले में दिया गया निर्णय मोटर दुर्घटना मुआवजे के मामले में अधिक लाभ देने वाले वैधानिक प्रावधान के संचालन को सीमित नहीं करता है।

न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित और न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी की पीठ ने कहा कि यदि एक वैधानिक प्रपत्र ने एक सूत्र तैयार किया है जो बेहतर या अधिक लाभ प्रदान करता है, तो ऐसे वैधानिक प्रपत्र को तब तक संचालित करने की अनुमति दी जानी चाहिए जब तक कि वैधानिक साधन अन्यथा अमान्य नहीं पाया जाता है।

कोर्ट ने दुर्घटना के कारण जयराम शुक्ल की मौत मामले में दावे पर विचार करते हुए इलाहाबाद स्थित मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण द्वारा सात प्रतिशत ब्याज के साथ 24,43,432/- रुपये मुआवजा संबंधी फैसले को चुनौती देने वाली बीमा कंपनी की अपील को खारिज कर दिया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इससे पहले प्रथम अपील खारिज कर दी थी।

इस अपील में, बीमा कंपनी ने दलील दी थी कि उत्तर प्रदेश मोटर वाहन नियमावली, 1998 के नियम 220ए के उप-नियम 3 (iii) 'राष्ट्रीय बीमा कंपनी लिमिटेड बनाम प्रणय सेठी (2017) 16 एससीसी 680' मामले में इस न्यायालय की संविधान पीठ द्वारा निकाले गए निष्कर्षों के विपरीत है। उक्त नियम के अनुसार, मृतक की भविष्य की संभावनाओं को मृतक के वास्तविक वेतन या न्यूनतम मजदूरी में जोड़ा जाएगा। यदि मृतक की आयु 50 वर्ष से अधिक थी, तो वेतन का 20% जोड़ा जाना है।

इसलिए, कोर्ट को इस सवाल पर विचार करना था कि क्या संबंधित नियमावली के नियम 220ए के उप-नियम 3 (iii) को सीमित दायरा दिया जाना चाहिए या इसे पूरी तरह से संचालित करने की अनुमति दी जानी चाहिए?

इसका उत्तर देने के लिए, पीठ ने कहा कि 'प्रणय सेठी' मामले में दिया गया निर्णय मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 168 के संदर्भ में "उचित मुआवजे" पर पहुंचने के दृष्टिकोण से था।

कोर्ट ने बीमा कंपनी की दलीलों को खारिज करते हुए कहा,

"11. यदि एक सांविधिक साधन के रूप में एक परिणाम उपलब्ध कराया जाता है जो एक अनुकूल उपाय प्रदान करता है, तो प्रणय सेठी मामले में दिया गया निर्णय इस तरह के वैधानिक प्रावधान के संचालन को सीमित करने के लिए नहीं लिया जा सकता है, खासकर तब जब नियमों की वैधता को किसी चुनौती के दायरे में नहीं रखी गई थी। ऐसे मामलों में जहां मृतक की आयु 50-60 वर्ष के आयुवर्ग में थी, 'प्रणय सेठी' मामले में दिये गये निर्णय के अनुरूप 15% का नुस्खा मैक्सिमा (अधिकतम) के रूप में नहीं लिया जा सकता है। वैधानिक शासन में उपलब्ध किसी भी शासी सिद्धांत के अभाव में, यह केवल एक संकेत के रूप में था। यदि एक वैधानिक साधन ने एक सूत्र तैयार किया है जो बेहतर या अधिक लाभ प्रदान करता है, तो ऐसे वैधानिक साधन को तब तक संचालित करने की अनुमति दी जानी चाहिए जब तक कि वैधानिक साधन अन्यथा अमान्य नहीं पाया जाता है।"

ऐसी टिप्पणी करते हुए पीठ ने अपील को खारिज कर दिया।

'प्रणय सेठी' जजमेंट

'प्रणय सेठी' मामले में, संविधान पीठ ने उस मामले में भविष्य की संभावनाओं के संबंध में अतिरिक्त के बारे में सवाल पर विचार किया था, जहां मृतक नियोजित था या वार्षिक वेतन वृद्धि आदि के प्रावधान के बिना निश्चित वेतन पर था? कोर्ट ने निम्न उदाहरण दिया था :

आय का निर्धारण करते समय, मृतक की आय में वास्तविक वेतन का 50% भविष्य की संभावनाओं के लिए जोड़ा जाना चाहिए, जहां मृतक की स्थायी नौकरी थी और वह 40 वर्ष से कम आयु का था। यह अतिरिक्त जोड़ 30% होना चाहिए, यदि मृतक की आयु 40 से 50 वर्ष के बीच 48 वर्ष थी। यदि मृतक की आयु 50 से 60 वर्ष के बीच है, तो अतिरिक्त जोड़ 15% होना चाहिए। वास्तविक वेतन को टैक्स कम करने के बाद बचे वास्तविक वेतन के रूप में पढ़ा जाना चाहिए।

यदि मृतक स्व-नियोजित था या एक निश्चित वेतन पर था, तो स्थापित आय का 40% अतिरिक्त वांछित होना चाहिए, जहां मृतक की आयु 40 वर्ष से कम थी। जहां मृतक की आयु 40 से 50 वर्ष के बीच थी, वहां 25 प्रतिशत तथा जहां मृतक की आयु 50 से 60 वर्ष के बीच थी, वहां 10% अतिरिक्त राशि को गणना की आवश्यक विधि के रूप में माना जाना चाहिए। स्थापित आय का अर्थ है टैक्स को कम करके शेष आय ।

मल्टीप्लीकेंड के निर्धारण के लिए, व्यक्तिगत और रहन सहन के खर्च की कटौती, ट्रिब्यूनल और अदालतें सरला वर्मा के पैराग्राफ 30 से 32 द्वारा निर्देशित की जाएंगी, जिसे हमने यहां पुन: प्रस्तुत किया है।

मल्टीप्लायर का चयन उस निर्णय के पैरा 42 के साथ पठित सरला वर्मा की तालिका में दर्शाए अनुसार होगा। (vii) गुणक लगाने का आधार मृतक की आयु होनी चाहिए।

पारंपरिक मदों अर्थात् संपत्ति की हानि, संघ की हानि और अंत्येष्टि व्यय पर उचित आंकड़े, क्रमश: 15,000/-, 40,000/- और 15,000/- रुपये होने चाहिए। उक्त राशि को प्रत्येक तीन वर्ष में 10% की दर से बढ़ाया जाना चाहिए।

केस : न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम उर्मिला शुक्ला; सीए 4634 / 2021

कोरम: न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित और न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी

साइटेशन : एलएल 2021 एससी 359

वकील: अधिवक्ता वीरेश बी सहरिया, शर्वे सिंह, अधिवक्ता प्रदीप मिश्रा, अधिवक्ता ए.डी.एन. राव (एमिकस क्यूरी)

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