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सुप्रीम कोर्ट ने कहा, अशक्तता पेंशन के मामले में पेंशन नियमों में निर्धारित न्यूनतम अर्हकारी सेवा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता

LiveLaw News Network
5 Dec 2019 8:00 AM GMT
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, अशक्तता पेंशन के मामले में पेंशन नियमों में निर्धारित न्यूनतम अर्हकारी सेवा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
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मौजूदा केस में ओडिशा एडमिनेस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल और हाईकोर्ट ने कहा था कि मृत कर्मचारी के पति उड़ीसा सिविल सेवा (पेंशन) नियम- 1992 के नियम 39 के तहत अशक्तता पेंशन के हकदार हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पेंशन नियमों के तहत निर्धारित न्यूनतम सेवा की अर्हता को अशक्तता पेंशन के मामले में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

मौजूदा केस में ओडिशा एडमिनेस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल और हाईकोर्ट ने कहा था कि मृत कर्मचारी के पति उड़ीसा सिविल सेवा (पेंशन) नियम- 1992 के नियम 39 के तहत अशक्तता पेंशन के हकदार हैं।

अपनी अपील में राज्य ने दलील दी है कि मृत कर्मचारी की नौकरी की छोटी अवधि के कारण उसे नियम 39 के तहत अशक्तता पेंशन नहीं दी जा सकती है, उक्त प्रावधान को नियम 47 और पेंशन नियमों के नियम 56 के साथ संयुक्त रूप से पढ़ा जाना चाहिए, जिसमें दस वर्षों की अर्हकारी सेवा स्पष्ट रूप से चिन्हित की गई है और ये उन लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण है, जो अर्हता सेवा के लिए पात्रता की शर्तों को पूरा नहीं करते हैं।

ओडिशा राज्य बनाम मंजू नाइक के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने विचार किया कि क्या पेंशन नियमों के तहत निर्धारित न्यूनतम सेवा की योग्यता को पेंशन नियमों के नियम 39 के तहत अशक्तता पेंशन पर विचार करने के लिए नजरअंदाज किया जा सकता है।

जस्टिस आर भानुमती, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस हृषिकेश रॉय की खंडपीठ ने इस दलील को खारिज कर दिया कि नियम 39 के तहत अशक्तता पेंशन का दावा तब तक नहीं किया जा सकता, जब तक उसी नियम में निर्धारित न्यूनतम सेवा की योग्यता की शर्त पूरी नहीं होती है। कोर्ट ने कहा कि अशक्तता पेंशन के योग्य बनने के लिए पेंशन नियमों में निर्धारित अर्हकारी सेवा की शर्त की संतुष्टी होनी चाहिए। फैसले में कहा गया:

"एक कर्मचारी नियोक्ता को लंबी सेवा प्रदान कर पेंशन का हकदार बन जाता है और इसलिए, इसे नियोक्ता के लिए लंबे समय तक की गई कड़ी मेहनत के पुरस्कार के रूप में देखा जाना चाहिए। पेंशन नियम ऐसी पात्रता के लिए 10 साल की अर्हकारी सेवा सुनिश्च‌ित करते हैं। जब यह प्रश्न उठता है कि पेंशन नियमों के कुछ प्रावधानों को कैसे समझा जाए तो प्रावधान को इस संदर्भ में पढ़ना उचित होता, जिसका अर्थ होता है कि कानून को समग्र रूप से पढ़ना। दूसरे शब्दों में, कानून का एक विशेष प्रावधान, एक ही कानून के अन्य प्रावधानों के संदर्भ में संकलित किया जाना चाहिए ताकि एक पूरे रूप में अधिनियमित किया जा सके। ये एक व्याख्या से बचने के लिए भी आवश्यक होगा, जिसमें एक ही कानून के दो प्रावधानों के बीच संघर्ष होगा और सामंजस्यपूर्ण हल के लिए प्रयास किया जाना चाहिए। दूसरे शब्दों में, एक नियम के प्रावधान का उपयोग किसी अन्य नियम को विफल करने के लिए नहीं किया जा सकता है, जब तक कि उनके बीच सामंजस्य को प्रभावित करना असंभव नहीं है। जैसा कि पहले ही कहा गया है पेंशन कर्मचारी द्वारा सेवा की निरंतरता और दीर्घता द्वारा अर्जित की जाती है और न्यूनतम सेवा योग्यता को अशक्तता पेंशन की आवश्यकता के रूप में देखा जाना चाहिए। पेंशन नियमों को इस प्रकार सामंजस्यपूर्ण तरीके से लागू किया जा सकता है और इस मामले में, उक्त नियम के विभिन्न "प्रावधानों" के बीच कोई टकराव नहीं होगा।

कोर्ट ने इस मामले में कहा कि कर्मचारी ने 10 साल की अर्हकारी सेवा की तुलना में कम वर्षों तक सेवा की थी और चूंकि मानसिक अक्षमता के कारण उसे समय से पहले सेवानिवृत्त होना पड़ा था, इसलिए उसे नियोक्ता द्वारा केवल ग्रेच्युटी देने का हकदार पाया गया और यही पेंशन नियमों में निर्धारित है। बेंच ने अपील की अनुमति देते हुए आगे कहा:

"प्रतिवादी के पति ने दस साल तक सेवा नहीं दी थी इसलिए वह नियमित पेंशन का हकदार नहीं था और इसी कारण से उसे अशक्तता पेंशन का हकदार भी नहीं ठहराया जा सकता है। पेंशन नियमों के विभिन्न प्रावधानों को अलगाव में नहीं पढ़ा जा सकता है और उन्हें सामंजस्य में ही देखा जाना चाहिए और एक ही नियम के तहत विभिन्न सेवा लाभों का दावा करने के लिए अर्हकारी सेवा की आवश्यकता को अप्रासंगिक नहीं कहा जा सकता है। "

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