नंदीग्राम उपचुनाव से पहले कांग्रेस प्रत्याशी को राहत: जमानत के खिलाफ याचिक पर सुप्रीम कोर्ट का तत्काल सुनवाई से इनकार

  • नंदीग्राम उपचुनाव से पहले कांग्रेस प्रत्याशी को राहत: जमानत के खिलाफ याचिक पर सुप्रीम कोर्ट का तत्काल सुनवाई से इनकार

    सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को पश्चिम बंगाल पुलिस की उस याचिका को तत्काल सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने से इनकार किया, जिसमें कांग्रेस प्रत्याशी मिलन प्रधान को हाईकोर्ट की ओर से दी गई अंतरिम जमानत को चुनौती दी गई। प्रधान नंदीग्राम विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी हैं। राज्य सरकार ने अनुरोध किया था कि मामले की सुनवाई गुरुवार को ही की जाए, क्योंकि शुक्रवार को गांधी जयंती के कारण अदालत बंद रहेगी और सोमवार को नंदीग्राम में उपचुनाव होना है।

    मामले का उल्लेख चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ के समक्ष किया गया। पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यह हत्या के मामले में दी गई अंतरिम जमानत से जुड़ा मामला है। उन्होंने अदालत से तत्काल सुनवाई का अनुरोध करते हुए कहा कि यदि चुनाव से पहले मामले पर सुनवाई नहीं हुई तो याचिका का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।

    सॉलिसिटर जनरल ने जब गुरुवार को मामले को सूचीबद्ध करने के लिए दोबारा आग्रह किया और उपचुनाव का हवाला दिया, तो चीफ जस्टिस ने कहा,

    “हम आश्वासन दे सकते हैं कि हम इसे खारिज कर देंगे, लेकिन सोमवार को खारिज करेंगे।”

    इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को मामले की तत्काल सुनवाई करने से इनकार किया और संकेत दिया कि याचिका पर सोमवार को सुनवाई हो सकती है।

    इससे एक दिन पहले, 29 सितंबर को कलकत्ता हाईकोर्ट ने मिलन प्रधान को तीन सप्ताह की अंतरिम जमानत दी थी। जस्टिस तीर्थंकर घोष ने प्रधान की उस याचिका पर यह आदेश दिया था, जिसमें उन्होंने 6 अक्टूबर को होने वाले नंदीग्राम विधानसभा उपचुनाव में नामांकन दाखिल करने और चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत की मांग की थी। हाईकोर्ट ने उन्हें 21 अक्टूबर तक अंतरिम जमानत दी।

    मिलन प्रधान की गिरफ्तारी 2007 के नंदीग्राम आंदोलन से जुड़े आपराधिक मामलों में हुई। उनकी गिरफ्तारी नामांकन पत्र दाखिल करने के बाद हुई। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में इस तथ्य पर गौर किया कि जब प्रधान ने अपना नामांकन दाखिल किया था, तब वह हिरासत में नहीं थे। अदालत ने यह भी कहा कि राज्य की ओर से ऐसा कोई सामग्री पेश नहीं की गई, जिससे यह पता चले कि 2007 के बाद किसी अपराध के सिलसिले में प्रधान वांछित है।

    हाईकोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि राज्य जिन मामलों का हवाला दे रहा है, उनकी जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) कर चुका है। अदालत ने कहा कि करीब 19 साल पुराने मामलों में जारी वारंट पर कार्रवाई के लिए पुलिस के पास पर्याप्त समय है।

    राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में अंतरिम जमानत का विरोध किया। उसकी ओर से कहा गया कि प्रधान के खिलाफ मामलों में हत्या सहित गंभीर आरोप हैं और उनके खिलाफ गिरफ्तारी की प्रक्रिया जारी की गई। राज्य ने यह आशंका भी जताई थी कि रिहाई के बाद प्रधान गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं।

    वहीं, प्रधान की ओर से अदालत में कहा गया कि उन्हें उम्मीदवार के तौर पर नामांकन दाखिल करने के बाद गिरफ्तार किया गया और राज्य की ओर से ऐसा पर्याप्त सामग्री पेश नहीं की गई, जिससे कथित अपराधों में उनकी भूमिका स्पष्ट हो। उनकी ओर से चुनाव लड़ने और प्रचार करने के लिए अंतरिम जमानत देने का अनुरोध किया गया।

    हाईकोर्ट ने मामले के इन पहलुओं पर विचार करने के बाद प्रधान को 21 अक्टूबर तक अंतरिम जमानत देने का आदेश दिया। अब पश्चिम बंगाल पुलिस ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने उपचुनाव से पहले मामले को तत्काल सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने से इनकार किया और मामले को सोमवार को सुने जाने का संकेत दिया।

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