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ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट 1940 की धारा 3 (बी) (i) के तहत मेड‌िकल ऑक्सीजन आईपी और नाइट्रस ऑक्साइड आईपी भी 'दवाएं' हैं: सुप्रीम कोर्ट

LiveLaw News Network
14 April 2020 12:51 PM GMT
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Supreme Court of India

सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि 'मेडिकल ऑक्सीजन आईपी' और 'नाइट्रस ऑक्साइड आईपी' भी ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट 1940 की धारा 3 (बी) (i) के अर्थ में 'दवा' हैं। जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस अजय रस्तोगी की पीठ ने कहा कि इन गैसीय पदार्थों पर आंध्र प्रदेश मूल्य वर्धित कर अधिनियम 2005 की अनुसूची V की प्रविष्टि 88 के तहत 'दवाओं' के रूप में कर लगाया जाए।

बेंच ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ आंध्र प्रदेश सरकार की ओर से दायर अपील पर विचार कर रही थी, जिसमें कहा गया था कि ये पदार्थ अनुसूची IV के तहत दवाओं के रूप में कर योग्य हैं। राज्य के अनुसार, वे अनुसूची V के तहत 'अवर्गीकृत माल' के रूप में कर योग्य हैं, जिन पर अनुसूची IV की तुलना में ज्यादा कर लगता है।

हाईकोर्ट का कहना था कि ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट 1940 की धारा 3 (बी) (i) में, उल्लिखित अभिव्यक्ति 'ड्रग्स' के दायरे में ऐसे सभी पदार्थ शामिल हैं, जिसका उपयोग रोग या विकार के उपचार, रोकथाम और शमन के लिए किया जाता है।

हाईकोर्ट ने कहा था कि, (i) मेडिकल ऑक्सीजन आईपी का उपयोग रोगियों के उपचार, रोगों और विकारों की तीव्रता को कम करने के लिए किया जाता है, और (ii) नाइट्रस ऑक्साइड आईपी का उपयोग सर्जिकल ऑपरेशन और मामूली प्रोसिजर्स में ऐनेस्थेटिक के रूप में किया जाता है।

हाईकोर्ट के निर्णय को चुनौती देते हुए आंध्र प्रदेश सरकार ने दलील दी थी कि प्रत्येक 'पदार्थ' को केवल इसलिए एंट्री 88 के दायरे में नहीं रखा जा सकता है, क्योंकि इसका उपयोग औषधीय प्रयोजनों के लिए किया जाता है। एंट्री 88 के दायरे में आने वाला पदार्थ 1940 अधिनियम की धारा 3 (1) (बी) में निर्धारित परिभाषा के अनुरूप होना चाहिए।

न्यायालय ने नोट किया कि अनुसूची IV की प्रविष्टि 88 के दायरे में ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट 1940 की धारा 3 के तहत परिभाषित 'दवाएं और औषधियां' शामिल हैं। इसलिए कोर्ट के समक्ष मुद्दा यह था कि क्या 'मेडिकल ऑक्सीजन' और 'नाइट्रस ऑक्साइड' अधिनियम के अनुसार दवा होंगी?

धारा 3 (बी) (i) में किसी बीमारी या विकार के निदान, उपचार, शमन या रोकथाम के लिए या में उपयोग की जाने वाली दवाएं या पदार्थ शामिल हैं। 'मेडिसिन' शब्द को 1940 अधिनियम में परिभाषित नहीं किया गया है। इसलिए, न्यायालय ने शब्द के सामान्य अर्थ का उपयोग किया।

'मेडिसिन' शब्द की सामान्य या लोकप्रिय समझ को, सामान्य और विशेष रूप से, किसी भी बीमारी या विकार के निदान, उपचार, शमन या रोकथाम में के लिए उपयोगी इसके उपचारात्मक गुणों से चिन्हित किया जाता है।

कोर्ट ने कहा कि नाइट्रस ऑक्साइड का उपयोग एनेस्थेटिक एजेंट के रूप में किया जाता है। 99.9% शुद्धता वाले मेडिकल ऑक्सीजन का मुख्य रूप से अस्पतालों में उपयोग किया जाता है। मेडिकल ऑक्सीजन का उपयोग रोगियों के उपचार और रोग या विकार की तीव्रता को कम करने के लिए भी किया जाता है। इसका उपयोग अचानक बीमार पड़ने और स्वास्थ्य की रिकवरी में सहायता के लिए भी किया जाता है। मेडिकल ऑक्सीजन का उपयोग आघात, रक्तस्राव, सदमे, ऐंठन और अन्य स्थितियों में भी किया जाता है।

कोर्ट ने उपरोक्त निष्कर्षों के लिए कई मेडिकल पब्‍लिकेशन और फैसलों का उल्लेख किया।

"इसमें कोई संदेह नहीं है कि मेडिकल ऑक्सीजन आईपी और नाइट्रस ऑक्साइड आईपी ऐसी दवाइयां हैं, जिनका उपयोग मनुष्य की किसी भी बीमारी या विकार के उपचार, शमन या रोकथाम के लिए किया जाता है, जो 1940 अधिनियम की धारा 3 (बी) (i) के दायरे में आती हैं। हम मानते हैं कि मेडिकल ऑक्सीजन आईपी और नाइट्रस ऑक्साइड आईपी 1940 अधिनियम की धारा 3 (बी) (i) के दायरे में आती हैं और पर‌िणामस्वरूप 2005 अधिनियम की प्रविष्टि 88 में शामिल की जाती हैं।"

केस का विवरण

टाइटल: आंध्र प्रदेश बनाम मैसर्स लिंडे इंडिया लिमिटेड

केस नंबर: 2020 की सिविल अपील 2230

कोरम: जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस अजय रस्तोगी

निर्णय डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें



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