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304 बी आईपीसी को शामिल करने का विधायी इरादा दहेज हत्या के खतरे को दृढ़ता से रोकना था : सुप्रीम कोर्ट

LiveLaw News Network
19 Aug 2022 5:14 AM GMT
304 बी आईपीसी को शामिल करने का विधायी इरादा दहेज हत्या के खतरे को दृढ़ता से रोकना था : सुप्रीम कोर्ट
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यह कहते हुए कि "आईपीसी की धारा 304 बी को शामिल करने का विधायी इरादा दहेज हत्या के खतरे को दृढ़ता से रोकना था" और "धारा 304 बी के तहत मामलों से निपटने में, इस तरह के विधायी इरादे को ध्यान में रखा जाना चाहिए", सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा है कि दहेज हत्या के अपराध के लिए सजा देने में, "समाज में एक मजबूत संदेश जाना चाहिए कि एक व्यक्ति जो दहेज हत्या और / या दहेज निषेध अधिनियम के तहत अपराध करता है, उसके खिलाफ लोहे के हाथों से कार्रवाई की जाएगी।"

सुप्रीम कोर्ट ने मृतका के ससुर और सास को 10 साल के कठोर कारावास की सजा के प्रावधान को बरकरार रखते हुए उनकी वृद्धावस्था को देखते हुए कम सजा की प्रार्थना पर विचार करने से इनकार करते हुए जोर दिया है कि "धारा 304बी के तहत अपराध - दहेज हत्या का अपराध समाज के खिलाफ अपराध है", कि "ऐसे अपराध समाज पर गंभीर प्रभाव डालते हैं", और यह कि "उपरोक्त पहलुओं को ध्यान में रखते हुए, दहेज हत्या के अपराध के लिए सजा के प्रावधान पर विचार करने की आवश्यकता है"

जस्टिस एम आर शाह और जस्टिस बी वी नागरत्ना की पीठ ने संबंधित पक्षों के वकील को सुना और ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित निर्णय और आदेश, झारखंड हाईकोर्ट द्वारा पुष्टि करने के आदेशों को पढ़ने के बाद अपीलकर्ताओं / अभियुक्तों -मृतका की सास, ससुर को आईपीसी की धारा 304बी के साथ पठित धारा 201 के तहत अपराधों के लिए दोषी ठहराने, और यहां तक कि रिकॉर्ड पर पूरे सबूत के पुनर्मूल्यांकन पर, यह राय थी कि ट्रायल कोर्ट और साथ ही हाईकोर्ट दोनों ने, उपरोक्त अपराधों के लिए अभियुक्तों को सही दोषी ठहराया है।

पीठ ने कहा,

"हमें हाईकोर्ट द्वारा पुष्टि की गई निचली अदालत द्वारा पारित दोषसिद्धि के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं दिखता है।"

इसके अलावा, अपीलकर्ताओं की ओर से यह प्रार्थना की गई कि आरोपी की उम्र को देखते हुए कम सजा दी जाए। हालांकि, पीठ ने घोषणा की कि यह ध्यान देने की आवश्यकता है कि यहां अपीलकर्ता / ससुर और सास दहेज हत्या के लिए दोषी हैं और दहेज की मांग को अभियोजन पक्ष द्वारा सिद्ध और साबित कर दिया गया है। जस्टिस शाह और जस्टिस नागरत्ना की पीठ ने कहा कि पीड़िता की मृत्यु उसके विवाह के एक वर्ष की अवधि के भीतर हो गई और आरोपी ने एक झूठा मामला/सिद्धांत प्रस्तुत किया कि मृत्यु अतिसार के कारण हुई थी, जिसे बचाव में स्थापित और सिद्ध नहीं किया गया है।

पीठ ने कहा,

"दहेज मृत्यु के अपराध के लिए न्यूनतम सजा 07 वर्ष है और अधिकतम सजा आजीवन कारावास है। विद्वान ट्रायल कोर्ट ने मामले के पूर्वोक्त तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए और विशेष रूप से इस तथ्य पर विचार करते हुए 10 वर्ष की सजा सुनाई है। यह दहेज हत्या का मामला है, विद्वान ट्रायल कोर्ट ने 10 साल की आरआई सजा लगाने में सही था, जिसे हाईकोर्ट ने सही ठहराया है। धारा 304बी को शामिल करने का विधायी इरादा दहेज हत्या के खतरे को दृढ़ हाथों ले रोकने के लिए था। धारा 304 बी के तहत मामलों से निपटने में, ऐसे विधायी इरादे को ध्यान में रखना होगा। धारा 304 बी के तहत अपराध - दहेज हत्या का अपराध समाज के खिलाफ अपराध है। ऐसे अपराधों का समाज पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। ध्यान में रखते हुए उपरोक्त पहलुओं पर दहेज हत्या के अपराध के लिए सजा के प्रावधान पर विचार करने की आवश्यकता है। समाज में एक मजबूत संदेश जाना चाहिए कि एक व्यक्ति जो दहेज हत्या और/या दहेज निषेध अधिनियम के तहत अपराध करता है उन अपराधों से सख्ती से निपटा जाएगा। "

इसलिए, मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में, बेंच ने पाया कि केवल 10 साल आरआई लगाने को किए गए अपराध के लिए अनुपातहीन नहीं कहा जा सकता है, और यह निष्कर्ष निकाला कि 10 साल आरआई की सजा को लागू करने के लिए अब तक किसी भी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

पीठ अपीलों को खारिज करने के लिए आगे बढ़ी।

केस : अजोला देवी और अन्य बनाम झारखंड राज्य

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