लॉ स्टूडेंट नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे

लॉ स्टूडेंट नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे

विवादास्पद नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने वाले विभिन्न याचिकाकर्ताओं में दो कानून के छात्र भी हैं, जिन्होंने नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 की वैधता के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

सिम्बायोसिस लॉ स्कूल के छात्र मुनीब अहमद खान और अपूर्वा जैन, अधिवक्ता एहतेशाम हाशमी, अदीर तालिब और पत्रकार जिया उस सलाम द्वारा इस अधिनियम को शीर्ष अदालत में चुनौती देने के लिए दायर याचिका में शामिल हुए हैं।

उनका तर्क है कि मुस्लिम समुदाय के साथ भेदभाव करने के लिए अधिनियम अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। यह तर्क दिया गया है कि अधिनियम ने धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा को नकार दिया, जो कि भारत के संविधान की एक मूल विशेषता है।

उन्होंने याचिका में कहा कि कानून संविधान की मूल संरचना और मुसलमानों के खिलाफ स्पष्ट रूप से भेदभाव करने का इरादा है। ये संविधान में निहित समानता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है और धर्म के आधार पर बहिष्कार करके अवैध आप्रवासियों के एक वर्ग को नागरिकता देने का इरादा रखता है।

याचिका में कहा गया कि प्रत्येक नागरिक समानता के संरक्षण का हकदार है। यदि कोई विधेयक किसी विशेष श्रेणी के लोगों को निकालता है तो उसे राज्य द्वारा वाजिब ठहराया जाना चाहिए। नागरिकता केवल धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि जन्म के आधार पर हो सकती है। प्रश्न है कि भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में नागरिकता योग्यता की कसौटी कैसे हो सकती है। ये कानून समानता और जीने के अधिकार का उल्लंघन है और इसे रद्द किया जाना चाहिए।

वहीं वकील एहतेशाम हाशमी ने भी याचिका दाखिल की है। इसके अलावा पीस पार्टी, जन अधिकार मंच, रिहाई मंच और सिटीजनस अगेंस्ट हेट NGO ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है। पूर्व IAS अधिकारी सोम सुंदर बरुआ, अमिताभ पांडे और IFS देव मुखर्जी बर्मन के साथ- साथ ऑल असम स्टूडेंट यूनियन ने भी संशोधन क़ानून की वैधता को चुनौती दी है। इससे पहले इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर चुका है।