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कर्नाटक हाईकोर्ट ने सड़क दुर्घटना में जननांगों को खोने वाले युवा के मुआवजे की राशि बढ़ाई

LiveLaw News Network
9 Nov 2019 4:15 AM GMT
कर्नाटक हाईकोर्ट ने सड़क दुर्घटना में जननांगों को खोने वाले युवा के मुआवजे की राशि बढ़ाई
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कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक दुर्घटना में जननांगों को खोने वाले 21 वर्षीय युवा को मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (एमएसीटी) द्वारा प्रदान किए गए 2,70,000 रुपये मुआवजे की राशि को बढ़ाकर 24 लाख रुपये कर दिया है।

न्यायमूर्ति एस.एन सत्यनारायण और न्यायमूर्ति पी.जी.एम पाटिल की खंडपीठ ने मामले में सहायता करने के लिए अदालत द्वारा नियुक्त वकील कोर्ट मित्र गिरीश भट की दलीलों पर सहमति जताई। खंडपीठ ने कहा, '

'चोटों की प्रकृति इतनी गंभीर है कि उसने वास्तव में पीड़ित के जीवन को बदल दिया है और उसे सबसे दयनीय स्थिति में डाल दिया है। जहां अपनी मर्दानगी प्राप्त करने से पहले ही वह पुरुष लिंग से तटस्थ लिंग में स्थानांतरित कर दिया गया है।''

आंध्र प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम (एपीएसआरटीसी) का एक माल वाहक वाहन उक्त दुर्घटना में शामिल था और अदालत ने एपीएसआरटीसी को निर्देश दिया है कि वह चार सप्ताह के अंदर मुआवजा राशि ट्रिब्यूनल के पास जमा करा दें।

क्या था मामला

22 दिसंबर, 2010 को सुरेश नाइक एक साइकिल पर किसी के साथ पीछे बैठकर जा रहा था। उसी समय उनको एपीएसआरटीसी डीजीटी के माल वाहन पंजीकरण संख्या एएजेड-5263 ने टक्कर मार दी थी, जिसमें सुरेश को काफी चोट आई और इन चोटों की वजह से उसके लिंग और अंडकोश की थैली का विच्छेदन हो गया। उसकी दाईं हंसली की हड्डी पर फ्रैक्चर के साथ कूल्हे की हड्डी में भी फ्रैक्चर हो गया था। उसकी सर्जरी की गई, जिसके परिणामस्वरू उसके लिंग को जड़ से हटाना पड़ा और दोनों अंडकोष को भी निकाल दिया गया।

घायल के पिता ने दुर्घटना के बाद एमएसीटी कोर्ट के समक्ष कार्यवाही शुरू की, क्योंकि पीड़ित नाबालिग था। उसके पिता ने विभिन्न आधारों पर 50,00,000 रुपये के मुआवजे की मांग की। हालांकि, वह दावों को ट्रिब्यूनल के समक्ष पुष्ट करने में असमर्थ थे, इसलिए एमएसीटी कोर्ट ने 2,70,000 के मुआवजे का आदेश दिया। साथ ही इस राशि पर 8 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज भी देने का आदेश दिया गया।

दलील दी गई कि अंडकोष और लिंग को हटाने से पीड़ित की मर्दानगी पूरी तरह से छिन गई है। यह उसको लगी शारीरिक चोटों से कहीं अधिक है, जो मानसिक आघात उसने दुर्घटना की तारीख से लेकर ट्रायल कोर्ट के समक्ष उसके द्वारा दावा याचिका दायर करने तक झेला है। उस पर ट्रिब्यूनल ने ठीक से विचार नहीं किया।

इस दावेदार के मामले को अन्य मामलों की तरह देखा गया, जिनमें दावा करने वालों को लगी चोट उनकी कमाई की क्षमता और भावी जीवन के रास्ते में बांधा बन जाती हैं। इस तरह के दृश्य को देखते हुए दुर्घटना के बाद की गंभीरता को पूरी तरह से नकार दिया गया है।

न्यायालय का आदेश

हाईकोर्ट ने ''जी. रवींद्रनाथ / आर चैधरी बनाम ई श्रीनिवास और एक अन्य'' के मामले में शीर्ष अदालत के अप्रत्यक्ष या असूचित फैसले पर भरोसा किया, जहां इसी तरह की परिस्थितियों में शीर्ष अदालत ने मुआवजा देने पर विचार किया था।

हाईकोर्ट ने पूर्वोक्त निर्णय को आधार बनाते हुए स्वतंत्र रूप से मुआवजे की फिर से गणना की या आकलन किया, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि दावेदार को उचित और तर्कसंगत मुआवजा प्रदान किया जा सकें।

पीठ ने सुविधाओं के नुकसान और शादी की संभावना खत्म होने के तहत मुआवजे की राशि में वृद्धि करके उसे 6,00,000 रुपये तक बढ़ा दिया।

पीठ ने कहा कि

"इस तथ्य के प्रकाश में कि लिंग को पूरी तरह से हटा दिया गया है, ऐसे में शादी की कोई संभावना नहीं रही है । यहां तक कि यौन गतिविधियों का भी कोई मौका नहीं है, इसलिए, वह उक्त आनंद को अपने बाकी के जीवन के लिए पूरी तरह से खो चुका है।''

जिस सामाजिक कलंक का सामना अब दावेदार को करना होगा, उसके आधार पर अदालत ने 4,50,000 रुपये का मुआवजा दिया। अदालत ने कहा कि ''पुरुषों के समूह में उसके लिए एक अनदेखा प्रतिबंध रहेगा, क्योंकि वह उसकी शारीरिक स्थिति के कारण उसकी कंपनी को स्वीकार नहीं करेंगे और इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है, इसलिए, इस सामाजिक कलंक का प्रभाव उसके बाकी के जीवन पर पड़ेगा।''

प्राधिकरण पहले ही ट्रिब्यूनल को 2,70,000 का भुगतान कर चुका है। अदालत ने प्राधिकरण को निर्देश दिया है कि वह ब्याज के साथ मुआवजे की शेष संशोधित राशि 21,30,000 का भुगतान कर दे। यह राशि दस साल की अवधि के लिए राष्ट्रीयकृत बैंक में जमा की जाएगी, जिसमें दावेदार को यह अधिकार होगा कि वह समय-समय पर ब्याज प्राप्त कर सके।

आदेश की प्रति डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें


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