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कर्नाटक अयोग्य विधायक मामला : सुप्रीम कोर्ट में अंतिम सुनवाई शुरू, कर्नाटक हाईकोर्ट में उपचुनाव याचिका की सुनवाई पर रोक

LiveLaw News Network
23 Oct 2019 11:33 AM GMT
कर्नाटक अयोग्य विधायक मामला : सुप्रीम कोर्ट में अंतिम सुनवाई शुरू, कर्नाटक हाईकोर्ट में उपचुनाव याचिका की सुनवाई पर रोक
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कर्नाटक में अयोग्य करार दिए गए 17 बागी विधायकों की याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट को कांग्रेस की उस याचिका पर सुनवाई करने से रोक दिया है जिसमें चुनाव आयोग के राज्य में 15 सीटों पर उपचुनाव को टालने को चुनौती दी गई है।

सुनवाई के दौरान जस्टिस एन वी रमना, जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस कृष्ण मुरारी की पीठ ने बुधवार को हाईकोर्ट द्वारा कांग्रेस की अन्य अर्जी, जिसमें आदर्श चुनाव संहिता को निलंबित करने के आयोग के फैसले को चुनौती गई है, पर कोई आदेश जारी करने से इनकार कर दिया। इसके बाद पीठ ने अयोग्य विधायकों की याचिका पर अंतिम सुनवाई शुरू कर दी।

"स्पीकर का फैसला कानूनी रूप से गलत"

विधायकों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि वर्तमान विधानसभा के कार्यकाल के लिए उन्हें 2023 तक अयोग्य घोषित करने का स्पीकर का फैसला कानूनी रूप से गलत है। रोहतगी ने तर्क दिया कि स्पीकर ने नोटिस का जवाब देने के लिए केवल 3 दिन का समय दिया जबकि विधानसभा के नियमों के अनुसार न्यूनतम 7 दिन का समय दिया जाना चाहिए।

मुकुल ने कहा कि उपचुनाव लड़ने से उन्हें रोका नहीं जा सकता, क्योंकि ये उनका संवैधानिक अधिकार है। उन्होंने कहा कि स्पीकर को उनके इस्तीफे पर फैसला करना चाहिए था ना कि अयोग्यता पर क्योंकि ये इस्तीफे स्वैच्छिक थे ना कि किसी दबाव में। अगर कोई इस्तीफा देकर दोबारा जनता के बीच चुनाव में जाना चाहता है तो उसे कैसे रोका जा सकता है। वहीं याचिकाकर्ता की ओर से पेश आर्यम सुंदरम ने भी दलील दी थी कि स्पीकर को सिर्फ ये तय करना था कि विधायकों ने स्वेच्छा से इस्तीफे दिए हैं या नहीं।ये सुनवाई गुरुवार को भी जारी रहेगी।

इससे पहले 26 सितंबर को चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि वो राज्य में 15 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव टाल रहा है जब तक कि सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर अंतिम फैसला ना सुनाए।

उपचुनाव टालने की मांग

चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने कोर्ट के उस रुख के बाद ये कहा जब पीठ ने कहा कि वो इस मुद्दे पर अंतिम फैसला देना चाहती है और इसके लिए जरूरी है कि उपचुनाव टाले जाएं। जस्टिस खन्ना ने कहा था कि अगर कोर्ट अयोग्यता को गलत पाता है तो उपचुनाव के कोई मायने नहीं रह जाते।

दरअसल कर्नाटक विधानसभा के वर्तमान स्पीकर ने अयोग्य विधायकों का पक्ष लेते हुए सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि विधायकों को इस्तीफा देने का लोकतांत्रिक अधिकार है और तत्कालीन स्पीकर को इस्तीफे पर फैसला देना चाहिए था ना कि अयोग्यता पर। स्पीकर की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि वो उस समय के फैसले की आलोचना नहीं कर रहे लेकिन ये बता रहे हैं कि ऐसे हालात में क्या होना चाहिए।

वहीं याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश मुकुल रोहतगी ने चुनाव आयोग को भी पक्षकार बनाने का अनुरोध करते हुए कहा था कि विधायकों को इस तरह चुनाव को दौरान जनता के पास जाने से रोका नहीं जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने ही विधायकों को सरंक्षण दिया था कि उन्हें विश्वास मत के दौरान उपस्थित रहने पर विवश नहीं किया जा सकता लेकिन स्पीकर ने इसी आधार पर अयोग्य करार दिया कि उन्होंने पार्टी व्हिप का पालन नहीं किया।

दरअसल इससे पहले सुप्रीम कोर्ट इसका परीक्षण करने को तैयार हो गया था कि कर्नाटक में उपचुनाव कराने पर रोक लगाई जाए या विद्रोही अयोग्य विधायकों को चुनाव लड़ने की अनुमति दी जाए।

कांग्रेस नेताओं की ओर से पेश कपिल सिब्बल ने किसी भी अंतरिम राहत का विरोध किया था। पीठ ने कांग्रेस नेता सिद्धारामैया, दिनेश गुंडूराव, कर्नाटक विधानसभा स्पीकर और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया था।

यह है मामला

गौरतलब है कि कर्नाटक के 17 अयोग्य विधायकों ने तत्कालीन स्पीकर के रमेश कुमार के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल की हैं जिसमें उनके इस्तीफे को खारिज कर दिया था और उन्हें 15 वीं कर्नाटक विधानसभा के कार्यकाल के लिए अयोग्य घोषित कर दिया।

विधायकों को येदियुरप्पा मंत्रालय में शामिल नहीं किया जा सका क्योंकि उन्हें अयोग्य घोषित किया गया था। विधायकों ने अयोग्य ठहराए जाने को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का स्पष्ट उल्लंघन बताया है क्योंकि शीर्ष अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा था कि विश्वास मत के दौरान सदन में उपस्थित होने के लिए बाध्य करने के लिए स्पीकर द्वारा कोई कदम नहीं उठाया जा सकता। उन्होंने अध्यक्ष पर 10 वीं अनुसूची के प्रावधानों को तोड़-मरोड़कर

अयोग्य ठहराने को गलत बताया और यह भी कहा है कि अनिवार्य नोटिस अवधि के बिना निर्णय लिया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अध्यक्ष ने संविधान की व्याख्या के साथ जानबूझकर छेड़छाड़ की।

अपनी याचिका में बागी विधायकों ने यह भी तर्क दिया है कि उनमें से अधिकांश ने पहले ही इस्तीफा दे दिया था और उनके इस्तीफे पर फैसला करने के बजाए स्पीकर ने अवैध रूप से उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया जबकि स्पीकर को पहले इस्तीफों पर फैसला करना चाहिए था।

यह भी तर्क दिया गया है कि स्पीकर ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन किया है क्योंकि अयोग्यता से पहले कोई सुनवाई नहीं की गई। इन अयोग्य विधायकों ने कहा है कि 28 जुलाई को पारित स्पीकर के आदेश "पूरी तरह से अवैध, मनमानी और दुर्भावनापूर्ण" हैं क्योंकि उन्होंने मनमाने ढंग से उनके स्वैच्छिक इस्तीफे को अस्वीकार कर दिया था।

उन्होंने कहा है कि उन्होंने 6 जुलाई कोइस्तीफा दे दिया था लेकिन स्पीकर केआर रमेश कुमार ने कांग्रेस पार्टी द्वारा 10 जुलाई को "पूरी तरह से गलत" याचिका के आधार पर उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया।

वहीं तीन JDS सदस्यों - एएच विश्वनाथ, के गोपालैया और केसी नारायगौड़ा ने उन्हें अयोग्य घोषित करने के लिए स्पीकर के आदेश की वैधता पर सवाल उठाते हुए अपनी अलग रिट याचिका दायर की है और स्पीकर के आदेश को रद्द करने की मांग की है।

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