केजी बेसिन गैस विवाद: रिलायंस और केंद्र सरकार के बीच विवाद मध्यस्थता को भेजा गया, जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई करेंगी समाधान की कोशिश

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    सुप्रीम कोर्ट ने कृष्णा-गोदावरी (KG) बेसिन में प्राकृतिक गैस की खोज और निकासी को लेकर रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड और केंद्र सरकार के बीच लंबे समय से चल रहे विवाद को मध्यस्थता के लिए भेज दिया। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई को मध्यस्थ नियुक्त करने का अनुरोध किया है। साथ ही दोनों पक्षों के सुझाव पर दो विषय विशेषज्ञों की सहायता लेने को भी कहा है।

    चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने शुक्रवार को यह आदेश दिया।

    सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी और सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने पीठ को बताया कि दोनों पक्षों के बीच समझौते की संभावनाओं पर बातचीत हुई, लेकिन कोई समाधान नहीं निकल सका।

    पीठ ने कहा कि दोनों पक्ष समझौते की संभावना तलाशने के लिए समय-समय पर सुनवाई स्थगित करने का अनुरोध करते रहे हैं, लेकिन वे अब तक किसी व्यवहारिक समाधान तक नहीं पहुंच पाए हैं।

    कोर्ट ने कहा,

    "दोनों पक्षों ने समझौते की संभावना तलाशने के लिए समय-समय पर सुनवाई स्थगित करने का अनुरोध किया था। हमें बताया गया है कि वे स्वयं किसी व्यवहारिक समाधान तक नहीं पहुंच सके हैं।"

    इसके बाद पीठ ने जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई से मध्यस्थ की भूमिका निभाने का अनुरोध किया। कोर्ट ने यह भी कहा कि वह दोनों पक्षों द्वारा सुझाए जाने वाले दो विषय विशेषज्ञों की सहायता ले सकती हैं।

    यह विवाद केजी बेसिन में प्राकृतिक गैस के कथित स्थानांतरण और निकासी से जुड़ा है। सरकारी कंपनी तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ONGC) का आरोप है कि उसके ब्लॉक में मौजूद गैस भंडार से प्राकृतिक गैस निकलकर रिलायंस के निकटवर्ती ब्लॉक में पहुंच गई थी और रिलायंस ने उस गैस का भी उत्पादन किया।

    ओएनजीसी का कहना था कि दोनों ब्लॉकों के गैस भंडार आपस में जुड़े हुए थे जिसके कारण उसके क्षेत्र की गैस रिलायंस के ब्लॉक में चली गई।

    इस मामले में डीगोलियर एंड मैकनॉटन की एक अध्ययन रिपोर्ट में भी दोनों गैस भंडारों के आपस में जुड़े होने की बात सामने आई थी। इसके बाद केंद्र सरकार ने मामले की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस एपी शाह की अध्यक्षता में एक समिति गठित की थी।

    समिति के निष्कर्षों के आधार पर केंद्र सरकार ने रिलायंस को करीब 1.74 अरब अमेरिकी डॉलर और ब्याज की मांग का नोटिस जारी किया। यह मांग ओएनजीसी के ब्लॉक से कथित रूप से स्थानांतरित हुई गैस के उत्पादन के आरोपों के आधार पर की गई थी।

    रिलायंस ने इस मांग को चुनौती देते हुए उत्पादन साझा अनुबंध के तहत मध्यस्थता की कार्यवाही शुरू की। यह अनुबंध गैस की खोज और उत्पादन से संबंधित था।

    मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने बहुमत के फैसले में माना कि रिलायंस ने अनुबंध की कुछ शर्तों का उल्लंघन किया, लेकिन यह उल्लंघन इतना गंभीर नहीं था कि सरकार द्वारा मांगी गई राहत दी जा सके।

    केंद्र सरकार ने मध्यस्थता न्यायाधिकरण के फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। फरवरी 2025 में हाईकोर्ट की खंडपीठ ने मध्यस्थता के फैसले को स्पष्ट कानूनी त्रुटि से प्रभावित बताते हुए रद्द कर दिया था।

    हाईकोर्ट ने कहा था कि देश के प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षक होने के नाते सरकार की चुप्पी को इस बात की अनुमति नहीं माना जा सकता कि उसने दूसरे ब्लॉक से स्थानांतरित हुई गैस के उत्पादन को मंजूरी दी थी।

    अदालत ने इस बात पर जोर दिया था कि प्राकृतिक संसाधन राज्य के पास जनता के न्यास के रूप में रहते हैं और उनका दोहन लागू कानूनों तथा अनुबंध की शर्तों के अनुसार ही किया जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने अनुबंध के कथित उल्लंघनों को मामूली मानने के मध्यस्थता न्यायाधिकरण के दृष्टिकोण को भी स्वीकार नहीं किया।

    अब सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों के बीच लंबे समय से जारी विवाद को मध्यस्थता के जरिए सुलझाने की दिशा में कदम उठाया। जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की मध्यस्थता में होने वाली बातचीत से इस विवाद का समाधान निकलने की उम्मीद है।

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