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COVID 19 की अनिश्चित ​​​स्थिति के कारण सुप्रीम कोर्ट में फिज़िकल हियरिंग के संबंध में हम कोई निर्णय लेने की स्थिति में नहीं हैं : जस्टिस एल नागेश्वर राव

LiveLaw News Network
3 Aug 2021 3:12 PM GMT
COVID 19 की अनिश्चित ​​​स्थिति के कारण सुप्रीम कोर्ट में फिज़िकल हियरिंग के संबंध में हम कोई निर्णय लेने की स्थिति में नहीं हैं : जस्टिस एल नागेश्वर राव
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न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव ने मंगलवार को टिप्पणी की कि COVID 19 को लेकर अनिश्चित ​​​स्थिति के कारण सुप्रीम कोर्ट फिज़िकल हियरिंग (शारीरिक सुनवाई) कब और कैसे फिर शुरू की जाए, इस बारे में "निर्णय लेने की स्थिति में नहीं है।"

सुप्रीम कोर्ट परिसर में जस्टिस अनिरुद्ध बोस के साथ बैठे जस्टिस राव ने वरिष्ठ अधिवक्ता पीएस नरसिम्हा से पूछा कि क्या नरसिम्हा अपने कार्यालय के दायरे में ही बहस करना पसंद करते हैं या क्या वह बेंच के सामने फिज़िकल रूप से कोर्ट रूम में रहना चाहते हैं।

जब पीठ के सामने यह संकेत दिया गया कि COVID 19 ​​​​के मामलों की संख्या फिर से बढ़ रही है, तो न्यायमूर्ति राव ने कहा,

"हां, इसलिए हम निर्णय लेने की स्थिति में नहीं हैं। एक पल आपको लगता है कि चीजें बेहतर हो रही हैं और फिर अचानक सूचना आती है कि तीसरी लहर आसपास है।"

अधिवक्ता नरसिम्हा ने कहा कि वीसी सुनवाई के अपने फायदे हैं, मामलों की फाइनल सुनवाई के लिए वह फिज़िकल सुनवाई को प्राथमिकता देंगे। इस बिंदु पर, न्यायमूर्ति राव ने टिप्पणी की कि न्यायालय कई दिनों से वीसी के माध्यम से अधिवक्ताओं की सुनवाई कर रहा है।

न्यायमूर्ति राव ने टिप्पणी की कि वीसी की सुनवाई 'यहां बने रहने के लिए' है और 'तकनीक को अच्छे उपयोग में लाया जा सकता है।'

साथ ही न्यायाधीश ने व्यक्त किया कि 'अदालत में जब स्क्रीन पर वकालत होती है तो वह अपने सबसे अच्छे रूप में नहीं होती है, क्योंकि आखों के माध्यम से संपर्क का आभाव होता है।

न्यायमूर्ति राव ने कहा,

"हम आप सभी को याद कर रहे हैं। हम यहां अदालत में बैठे हैं और हम देखते हैं कि हमारे सामने सीटें खाली हैं, हमारे सामने केवल क्लर्क बैठे हैं।"

पिछले महीने भी सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) ने मुख्य न्यायाधीश एनवी रमाना को पत्र लिखकर COVID-19 मामलों में गिरावट के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट के फिज़िकल रूप से कामकाज को फिर से शुरू करने पर विचार करने के लिए लिखा था।

मार्च 2020 में महामारी की शुरुआत के बाद से भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 30 जुलाई को फिज़िकल अदालत में एक मामले की सुनवाई की, जहां दोनों पक्ष शारीरिक रूप से पेश हुए थे।

न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति एस रवींद्र भट की खंडपीठ ने मामले को फिज़िकल सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया था, जब एक आपराधिक मामले में दोनों पक्षों के वकील ने अपना मामला पेश करने के लिए शारीरिक रूप से पेश होने पर सहमति व्यक्त की थी। मामले की अगली सुनवाई 2 सितंबर को होगी।

अपने अनुभव के बारे में बात करते हुए एडवोकेट राजेश श्रीवास्तव ने लाइव लॉ को बताया कि इतने लंबे समय के बाद कनेक्शन टूटने या म्यूट होने के डर के बिना कोर्ट के अंदर रहना बहुत अच्छा रहा।

उन्होंने कहा,

"जब मैं पहली बार जुलाई 19965 में सर्वोच्च न्यायालय में आया था तब भी ऐसा ही महसूस हुआ था। अदालत के सामने शारीरिक उपस्थिति आपको जो अहसास देती है, उसका कोई विकल्प नहीं है। व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होना एक भावनात्मक क्षण रहा। मुझे अवश्य ही अवसर के लिए माननीय न्यायाधीशों को धन्यवाद देना होगा। अगली सुनवाई की प्रतीक्षा है।"

यह बताते हुए कि वे किसी भी दिन वर्चुअल सुनवाई के बजाए फिज़िकल सुनवाई क्यों पसंद करते हैं, श्री श्रीवास्तव ने कहा कि मानव स्पर्श (ह्यूमन टच) न्याय वितरण प्रणाली का एक अनिवार्य हिस्सा है और इसका कोई विकल्प नहीं है।

उन्होंने कहा,

"जबकि कोई अदालत की प्रतिक्रिया को ध्यान में रखते हुए अपनी दलीलों को संशोधित कर सकता है, वही आभासी सुनवाई में गायब है।"

COVID-19 की शुरुआत ने सुप्रीम कोर्ट को वकीलों, वादियों, अदालत के कर्मचारियों, न्यायाधीशों और अन्य हितधारकों की सुरक्षा के लिए वर्चुअल सुनवाई को अपनाने और यह सुनिश्चित करने के लिए प्रेरित किया कि बिना किसी व्यवधान के जनता को न्याय दिया जाए।

पिछले एक साल में फिज़िलक सुनवाई को फिर से शुरू करने के मुद्दे पर वादियों और वकीलों के बीच मतभेद देखा गया है। जबकि कुछ लोग वर्चुअल मानदंड को जारी रखना पसंद करते हैं, इसे काफी सफलता कहते हैं, विशेष रूप से उस अभूतपूर्व स्थिति को देखते हुए जिसमें यह शुरू हुआ, कई अन्य फिज़िकल कोर्ट में सुनवाई पर वापस लौटने पर जोर देते हैं।

पिछले साल अगस्त में, शीर्ष अदालत ने अधिवक्ताओं की सहमति से मामलों की अंतिम सुनवाई के लिए कुछ अदालतों के कमरों में प्रायोगिक आधार पर फिज़िकल सुनवाई फिर से शुरू करने का फैसला किया था। यद्यपि फिज़िकल सुनवाई के लिए 1000 मामलों की एक सूची प्रकाशित की गई थी, लेकिन यह आगे नहीं बढ़ी क्योंकि केवल कुछ ही अधिवक्ताओं ने इसके लिए सहमति दी थी।

जब दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस साल जनवरी में अपने दिल्ली के अपने अधीनस्थ न्यायालयों में 18 जनवरी से बड़े पैमाने पर फिज़िकल सुनवाई फिर से शुरू करने का फैसला किया था, तो उसे कड़ी प्रतिक्रिया मिली थी। इतना ही नहीं, इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष याचिका दायर की गई थी।

तत्कालीन सीजेआई एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने कहा था कि हालांकि न्यायालय फिज़िकल सुनवाई पर वापस जाने के लिए उत्सुक है, हालांकि, स्वास्थ्य अधिकारियों की राय को ध्यान में रखते हुए ही ऐसा किया जा सकता।

मामले की सुनवाई के दौरान फिज़िकल सुनवाई फिर से शुरू करने के संबंध में मतभेद फिर से देखा गया, क्योंकि वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने 'स्पष्ट और वर्तमान खतरे' से संबंधित मुद्दा उठाया था, जिसमें वकीलों ने खुद को COVID ​​​​-19 के खतरे की आशंका बताई, जबकि वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने कहा था कि वर्चुअल सुनवाई के कारण आम आदमी को न्याय नहीं मिल पा रहा है।

प्रतिक्रिया के परिणामस्वरूप, दिल्ली उच्च न्यायालय ने तब अग्रिम सूचना पर वकीलों को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश होने की अनुमति देने का निर्णय लिया था।

सुप्रीम कोर्ट की समन्वय समिति ने 13 फरवरी, 2021 को स्पष्ट किया था कि एक बार वर्चुअल कोर्ट के साथ हाइब्रिड तरीके से सुप्रीम कोर्ट के फिर से शुरू होने के बाद, पार्टियों के पास फिज़िकल या वर्चुअल रूप से उपस्थित होने का विकल्प होगा।

सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने मार्च में मुख्य न्यायाधीश को अपने प्रतिनिधित्व के माध्यम से जोर देकर कहा था कि महामारी के दौरान न्याय के चक्र को चालू रखने के लिए वर्चुअल सुनवाई केवल एक 'स्टॉप-गैप' व्यवस्था थी, और यह कि ओपन कोर्ट की सुनवाई एक परंपरा और एक संवैधानिक आवश्यकता दोनों है।

सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने यह कहते हुए कि महामारी 'बहुत नियंत्रण में है, मुख्य न्यायाधीश से मामलों की फिज़िकल सुनवाई के लिए सर्वोच्च न्यायालय खोलने का आग्रह किया था।

सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन, एससीबीए, आदि द्वारा कई अभ्यावेदन के बाद फिज़िकल सुनवाई को फिर से शुरू करने के प्रयास में किए गए। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने प्रायोगिक आधार पर 15 मार्च, 2021 से हाइब्रिड तरीके से मामलों की सुनवाई शुरू करने का निर्णय लिया।

हालांकि, COVID 19 की दूसरी लहर और मामलों में वृद्धि ने अदालत की सुनवाई को फिज़िकल रूप से या हाइब्रिड रूप में फिर से शुरू करने के प्रयासों पर रोक लगा दी।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने दिसंबर, 2020 में फिज़िकल सुनवाई के माध्यम से मामलों की सुनवाई शुरू की थी, लेकिन बाद में हालात देखते हुए उसे आंशिक रूप से वर्चुअल सुनवाई के विकल्प पर वापस लौटना पड़ा।

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, न्यायमूर्ति एसके कौल ने उनके सामने एक सुनवाई के दौरान टिप्पणी की थी कि वर्चुअल सुनवाई वकीलों को फिज़िकल कोर्ट की तुलना में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अधिक धैर्यपूर्ण सुनवाई का अहसाह देती है।

अप्रैल माह में जस्टिस चंद्रचूड़ ने सुप्रीम कोर्ट की नई वेबसाइट फॉर जजमेंट और ई-फाइलिंग के लॉन्च के दौरान वर्चुअल सुनवाई के संबंध में वादियों के बीच आशंका को संबोधित किया था। उन्होंने कहा था कि वर्चुअल कोर्ट होने का विचार भारतीय न्यायिक प्रणाली का लचीलापन दिखाना है न कि फिज़िकल सुनवाई को बदलना। हालांकि, वे देश भर के न्यायालयों में आने वाले वकीलों, वादियों के सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा करने की आवश्यकता के प्रति भी सचेत हैं।

सर्वोच्च न्यायालय की ई-समिति के अध्यक्ष न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ ने जून माह में सभी उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को एक पत्र द्वारा संबोधित किया था, जिसमें कहा गया था कि COVID-19 महामारी के कारण फिज़िकल कोर्ट में सुनवाई करना संभव न हो और इस स्थिति में अदालतें कुछ समय के लिए सुनवाई के हाइब्रिड मॉडल का सहारा ले सकती हैं।

स्थिति को देखते हुए ई-समिति ने उच्च न्यायालयों को अपनी पसंद के किसी भी प्लेटफॉर्म पर वीसी व्यवस्था करने और वर्तमान वीसी प्लेटफॉर्म के को लेकर किसी भी समस्या का सामना करने की स्थिति में उपलब्ध फंड को फिर से विनियोजित करने के लिए अधिकृत करने के लिए कहा था।

देश में विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूद डिजिटल विभाजन को स्वीकार करते हुए मुख्य न्यायाधीश एनवी रमाना ने हाल ही में एक पैनल चर्चा के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में वकीलों को न्यायालयों में पेश होने के लिए सुविधाएं देने की आवश्यकता पर बल दिया था।

जबकि देश भर में कई संस्थान फिर से फिज़िकल रूप से कामकाज करने लगे हैं, भारत में न्यायालय अब भी वर्चुअल रूप से कार्य कर रहे हैं।

"कठिनाई के बीच में अवसर है", अल्बर्ट आइंस्टीन का एक उद्धरण पूरी तरह से वर्णन करता है कि कैसे भारतीय न्यायपालिका, वर्चुअल कोर्ट के माध्यम से पिछले साल से महामारी की स्थिति का सामना कर रही है।

वर्चुअल कोर्ट के संबंध में वकीलों द्वारा उठाए गए कुछ मुद्दों में खराब कनेक्टिविटी, घटिया ऑडियो-वीडियो गुणवत्ता और एक समय में एक मामले में पेश होने वाले सभी वकीलों को समायोजित करने में विफलता शामिल है। अन्य में अदालत के कर्मचारियों द्वारा अन-म्यूट नहीं किया जाना और वकीलों को सुने बिना मामले को स्थगित करना और आवाज और वीडियो प्रसारण की गुणवत्ता निशान तक नहीं होना शामिल है।

वर्चुअल कोर्ट या हाइब्रिड सिस्टम के पक्ष में लोगों ने तर्क दिया है कि यह वादियों को अधिक लचीलापन देता है और पक्षकारों के अधिकारों की रक्षा करता है।

हालांकि यह सच है कि एक खुली अदालत प्रणाली को पूरी तरह से आभासी प्रणाली द्वारा प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है, यह स्वीकार करना महत्वपूर्ण है कि देश जिस अभूतपूर्व संकट का सामना कर रहा है, वर्चुअल कोर्ट पेशे और जनता दोनों के लिए सेविंग ग्रेस की तरह रही हैं। .

जैसा कि न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को लिखे अपने पत्र में कहा कि 25 से मार्च 2020 से 30 अप्रैल 2021 तक महामारी के दौरान, 96,74,257 मामले (उच्च न्यायालय: 33,76,408 और जिला न्यायालय: 62,97,849) अदालतों द्वारा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से ई-कोर्ट परियोजना द्वारा प्रदान किए गए डिजिटल बुनियादी ढांचे का उपयोग करते हुए सुने गए।

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