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जस्टिस कृष्णा अय्यर का सबसे महत्वपूर्ण योगदान अनुच्छेद 21 की मानवतावादी व्याख्याः जस्टिस वी रामसुब्रमण्यम

LiveLaw News Network
5 Jan 2020 6:13 AM GMT
जस्टिस कृष्णा अय्यर का सबसे महत्वपूर्ण योगदान अनुच्छेद 21 की मानवतावादी व्याख्याः जस्टिस वी रामसुब्रमण्यम
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चौथे जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर मेमोरियल लेक्चर में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस वी रामसुब्रमण्यम ने व्याख्यान दिया। पढ़िए, व्याख्यान के महत्वपूर्ण हिस्से-

जस्टिस वीआर कृष्‍ण अय्यर मेमोरियल लेक्चर के लिए निमंत्रण पाना वाकई एक विशेष स्तर का सम्मान है। जस्टिस कृष्ण अय्यर की महानता यह है कि उनके बहुमुखी व्यक्तित्व का वर्णन करने के लिए भी हमारे पास शब्दों की कमी पड़ जाती है, और फिर हमें उपयुक्त शब्दावली के लिए जस्टिस अय्यर की ओर देखना पड़ता है।

मैं शारदा कृष्णा सतगमय फाउंडेशन फॉर लॉ एंड जस्टिस के ट्रस्टियों को धन्यवाद देता हूं, जिन्होंने मुझे यह सम्मान और विशेषाधिकार दिया है। जैसा कि सोली सोराबजी ने कहा, जस्टिस कृष्णा अय्यर का संवैधानिक कानून के विकास में सबसे महत्वपूर्ण योगदान उनकी अनुच्छेद 21 की रचनात्मक, विस्तारवादी और मानवतावादी व्याख्या है।

सोली सोराबजी के अनुसार, 'उनके न्यायिक करियर का यह विलक्षण पहलू उन्हें जरूरतमंदों और उपेक्षितों, निराश्रितों और निराश, गरीबों और पीड़ितों के, वास्तव में भारत के आम आदमी के, दिलों और दिमागों में महान और स्थायी स्थान दिलाता है।

जस्टिस वी रामसुब्रमण्यम ने अपने भाषण के पहले हिस्से में निजता के कानून के विकास के बारे में चर्चा की। उन्होंने कहाः

भारतीय अदालतों की शुरुआत नकारात्मक रही थी, जैसा कि एमपी शर्मा बनाम सतीश चंद्र (एआईआर 1954 एससी 300) के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले में देखा जा सकता है, जहां उसने कहा था कि अमेरिका के चौथे संशोधन के अनुरूप, कृत्रिम निर्माण प्रक्रिया द्वारा हमारे संविधान में निजता के अधिकार को शामिल करने का कोई औचित्य नहीं है।

हालांकि 1963 में खारा सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (AIR 1963 SC 1295) के मामले में अल्पमत में रहे ज‌स्टिस सुब्बा राव द्वारा निजता के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार के हिस्से के रूप में मान्यता दी गई थी। उस मामले में एक व्यक्ति पर डकैती के एक मामले में आरोप लगा था हालांकि बाद में सबूतों के अभाव में वह रिहा कर दिया गया। हालांकि यूपी पुलिस रेगुलेशन एक्ट के तहत उसके नाम पर एक 'हिस्ट्रीशीट' खोली गई और उसे निगरानी में रखा गया। उसे लगातार पुलिस स्टेशन में हाजिरी लगानी पड़ती थी और कभी-कभी पुलिस डॉमिसिलियरी व‌िजिट के नाम पर रात में उसके घर पर धमक पड़ती थी।

वे दरवाजे पर दस्तक देते, उसे नींद से जगाते हैं, और वह जब भी अपने गांव से बाहर जाता है तो उसे पुलिस को सूचना देनी पड़ती।

मामले में हालांकि पीठ का बहुमत का दृष्टिकोण था कि डॉमिसिलियरी व‌िजिट गलत है लेकिन निगरानी को गैरकानूनी नहीं है। लेकिन न्यायमूर्ति सुब्बा राव ने अपने अल्पमत के विचार में कहा कि अनुच्छेद -21 में स्वतंत्रता की अवधारणा निजता को भी व्यापक रूप से शामिल करती है और एक व्यक्ति का घर, जहां वह अपने परिवार के साथ रहता है, वह उसका "महल" है और इससे ज्यादा कुछ भी गलत नहीं उसकी निजता में हस्तक्षेप किया जाए।

न्यायमूर्ति सुब्बा राव ने कहा कि प्रत्येक लोकतांत्रिक देश घरेलू जीवन को पवित्र मानता है; इससे उसे आराम, शारीरिक सुख, मन की शांति और सुरक्षा की उम्मीद होती है। इसलिए, उनके अनुसार निगरानी के सभी कार्य अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करेंगे।

व्याख्यान के अगले हिस्से में जस्टिस वी रामसुब्रमण्यम पश्चिम में निजता के कानून के विकास और निजता के कानून पर विज्ञान और प्रौद्योगिकी के प्रभावों पर चर्चा की।

जस्टिस वी रामसुब्रमण्यम का पूरा व्याख्यान सुनने के लिए क्लिक करें-


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