कॉलेजियम की दोहराई सिफारिशों पर रोक न लगाए केंद्र, ठोस कारण के बिना नियुक्ति रोकी न जाए: जस्टिस केएम जोसेफ
Amir Ahmad
17 Aug 2026 12:36 PM IST

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस केएम जोसेफ ने केंद्र सरकार से अपील की कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की ओर से दोहराई गई न्यायिक नियुक्तियों की सिफारिशों को लंबित न रखा जाए।
उन्होंने कहा कि ऐसी सिफारिशों पर तब तक कार्रवाई होनी चाहिए जब तक नियुक्ति के खिलाफ कोई वास्तव में ठोस और नियुक्ति से संबंधित कारण मौजूद न हो।
केरल हाईकोर्ट बार एसोसिएशन की ओर से अमेरिका की स्वतंत्रता की घोषणा की 250वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित व्याख्यान में जस्टिस जोसेफ ने न्यायिक नियुक्तियों को लेकर सरकार और न्यायपालिका के बीच मतभेद खत्म करने की भी अपील की।
उन्होंने कहा कि यह असहमति जल्द दूर होनी चाहिए, ताकि देश को बेहतरीन जज मिल सकें, क्योंकि न्याय करना आसान प्रक्रिया नहीं है।
जस्टिस जोसेफ ने कहा,
“जब कॉलेजियम दूसरे जज मामले और तीसरे जज मामले के तहत किसी नाम की सिफारिश करता है और उसे दोहराता है, तो केंद्र सरकार को उन प्रस्तावों पर नहीं बैठना चाहिए, जो उसके लिए बाध्यकारी हैं। जब तक नियुक्ति के रास्ते में कोई वास्तव में अच्छा, ठोस और नियुक्ति से संबंधित कारण न हो, तब तक नियुक्ति की जानी चाहिए।”
उन्होंने कहा कि दूसरे और तीसरे जज मामले में दिए गए फैसलों का उद्देश्य न्यायपालिका को सरकारी नियंत्रण से मुक्त रखना और ऐसे सर्वश्रेष्ठ लोगों को जज नियुक्त करना था, जिनमें केवल कानून का ज्ञान ही नहीं, बल्कि निर्भीकता और स्वतंत्रता जैसे गुण भी हों।
जस्टिस जोसेफ ने कहा कि सर्वश्रेष्ठ जज से आशय केवल कानून में दक्ष व्यक्ति से नहीं है, बल्कि उसमें कई मानवीय और नैतिक गुणों का होना जरूरी है।
उन्होंने पूर्व चीफ जस्टिस एमएन वेंकटचलैया के एक साक्षात्कार का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति सज्जन है और उसे कानून का थोड़ा ज्ञान भी है तो वह पर्याप्त हो सकता है। उनके अनुसार जजों में निर्भीक और स्वतंत्र होकर निर्णय लेने की क्षमता होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि किसी सरकार के लिए यह सोचना क्षणिक रूप से लाभदायक हो सकता है कि ऐसा व्यक्ति नियुक्त हो, जो जरूरत पड़ने पर सरकार से सवाल न करे लेकिन देश के लोकतांत्रिक इतिहास में स्वतंत्र और विद्वान जजों का योगदान कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि देश के गणराज्य के निर्माण और उसे मजबूत करने में ऐसे जजों का योगदान बहुत बड़ा रहा है।
जस्टिस जोसेफ ने सुप्रीम कोर्ट में संविधान पीठ के मामलों के लंबे समय से लंबित रहने पर भी गंभीर चिंता जताई।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में स्थायी संविधान पीठ गठित करने का सुझाव दिया। उनके अनुसार संविधान पीठों के सामने 28 मुख्य मामले लंबित हैं और बड़ी पीठों के मामलों की औसत लंबित अवधि 2,738 दिन है। इनमें 11 मामले एक से पांच साल, छह मामले छह से दस साल और छह से अधिक मामले दस साल से ज्यादा समय से लंबित हैं।
उन्होंने कहा,
“मेरी विनम्र और सम्मानपूर्वक अपील है कि सुप्रीम कोर्ट में एक स्थायी संविधान पीठ होनी चाहिए।”
पूर्व जस्टिस ने कहा कि संवैधानिक महत्व के मामलों का जल्द निपटारा होना चाहिए। उनके मुताबिक ऐसे मामलों में देरी का असर उन कई अन्य मामलों पर भी पड़ता है जिनका फैसला संविधान पीठ के निर्णय पर निर्भर करता है।
उन्होंने कहा कि संविधान पीठ के मामलों को एक साल से अधिक समय तक लंबित नहीं रखा जाना चाहिए।
उन्होंने 2016 में संविधान पीठ को भेजे गए उस सवाल का भी उदाहरण दिया, जिसमें यह मुद्दा था कि क्या अदालतें दलबदल विरोधी याचिकाओं पर फैसला करने के लिए विधानसभा अध्यक्षों के लिए समय-सीमा तय कर सकती हैं।
जस्टिस जोसेफ ने कहा कि मामले की स्थिति देखने पर उन्हें ऐसा नहीं मिला कि इस संदर्भ का अब तक फैसला हुआ है। उन्होंने संवैधानिक महत्व के मामलों के शीघ्र निपटारे की जरूरत पर जोर दिया।
जस्टिस जोसेफ ने सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की बढ़ती संख्या पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि केवल जजों की संख्या बढ़ाने से अदालत का बोझ कम नहीं होगा जब तक मामलों के आने की संख्या को नियंत्रित नहीं किया जाता।
उन्होंने उपलब्ध जानकारी के आधार पर कहा कि सुप्रीम कोर्ट में करीब 93 हजार मामले लंबित हैं और सवाल उठाया कि केवल जजों की संख्या बढ़ाकर इस समस्या का समाधान किया जा सकता है या नहीं।
उन्होंने सुझाव दिया कि 38 जजों की मौजूदा संख्या को देखते हुए एक स्थायी पांच जजों की पीठ बनाई जा सकती है जो लंबित संवैधानिक सवालों पर लगातार सुनवाई करे।
जस्टिस जोसेफ ने भारतीय और अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट की कार्यप्रणाली के अंतर का भी उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि अमेरिका में सभी नौ जज एक साथ बैठते हैं, जबकि भारत में जज अलग-अलग पीठों में सुनवाई करते हैं। ऐसे में एक पीठ के सामने चल रही कार्यवाही के बारे में दूसरी पीठ को जरूरी नहीं कि पूरी जानकारी हो।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र के लगातार विस्तार को भी मामलों के बढ़ते बोझ का एक कारण बताया।
उन्होंने कहा कि 22 ऐसे कानून हैं जिनके जरिए सुप्रीम कोर्ट को अपीलीय, मूल या मूल-अपीलीय अधिकार क्षेत्र दिया गया है। उनके अनुसार इनमें कुछ ऐसे अधिकार क्षेत्र भी शामिल हैं, जिनकी मूल संविधान में परिकल्पना नहीं की गई।


