न्यायपालिका में बढ़ रही हैं 'ब्लैक शीप', हर स्तर पर बहुसंख्यकवाद की ओर बढ़ रही हैं अदालतें: जस्टिस दीपक गुप्ता

Amir Ahmad

11 Sept 2026 2:00 PM IST

  • न्यायपालिका में बढ़ रही हैं ब्लैक शीप, हर स्तर पर बहुसंख्यकवाद की ओर बढ़ रही हैं अदालतें: जस्टिस दीपक गुप्ता

    सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस दीपक गुप्ता ने न्यायपालिका की मौजूदा स्थिति को लेकर गंभीर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका में ईमानदार और सक्षम जजों की बड़ी संख्या के बावजूद 'ब्लैक शीप' (ग़लत काम करने वाले) की संख्या बढ़ रही है और देश की अदालतें धीरे-धीरे बहुसंख्यकवाद की ओर बढ़ती दिखाई दे रही हैं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र केवल बहुमत का शासन नहीं है बल्कि इसमें अल्पमत और असहमति की आवाज को भी समान महत्व मिलना चाहिए।

    स्वतंत्रता दिवस के बाद लिखे अपने लेख में जस्टिस गुप्ता ने कहा कि किसी देश की स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं है। वास्तविक स्वतंत्रता तब होगी, जब नागरिक बिना डर के सोच और बोल सकें सरकार और व्यवस्था से असहमति जता सकें तथा अपने विचार खुलकर रख सकें। उनके मुताबिक देश तब सही मायने में स्वतंत्र होगा जब जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव न हो और वंचित वर्गों तथा अल्पसंख्यकों को समान अवसर मिले।

    उन्होंने कहा कि भारत ने पिछले दशकों में काफी प्रगति की है। लोगों का जीवन स्तर बेहतर हुआ है, जीवन प्रत्याशा बढ़ी है और देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हुई है। भारत वैश्विक शक्ति बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। लेकिन सवाल यह है कि अगर बड़ी आबादी अब भी गरीबी रेखा के नीचे जीवन जी रही है तो केवल बड़ी अर्थव्यवस्था का क्या लाभ है।

    कानूनी पेशे में करीब आधी सदी बिताने का उल्लेख करते हुए जस्टिस गुप्ता ने कहा कि वह अपने लेख में न्यायिक व्यवस्था पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। उनके अनुसार कोई भी देश तब तक वास्तव में स्वतंत्र नहीं हो सकता जब तक उसकी न्यायपालिका स्वतंत्र और निडर न हो। इसके लिए ऐसे जज जरूरी हैं जिनमें ईमानदारी, बौद्धिक क्षमता और सबसे बढ़कर अन्याय के खिलाफ खड़े होने का साहस हो।

    उन्होंने कहा कि जजों को अपनी शपथ के अनुरूप बिना भय और पक्षपात के न्याय करना चाहिए। संवैधानिक अदालतें केवल विवादों का निपटारा करने वाली संस्थाएं नहीं हैं, बल्कि उनकी जिम्मेदारी नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना भी है। उन्होंने याद दिलाया कि संविधान निर्माताओं ने मौलिक अधिकारों को इतना महत्व दिया कि उनके उल्लंघन की शिकायत लेकर सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार भी मौलिक अधिकार बनाया गया।

    जस्टिस गुप्ता ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में संवैधानिक अदालतों ने मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए अपेक्षित संवेदनशीलता और मजबूती कई मामलों में नहीं दिखाई। उन्होंने आपातकाल के दौरान जस्टिस एच.आर. खन्ना के ऐतिहासिक असहमति वाले फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने स्पष्ट किया कि आपातकाल के दौरान भी किसी नागरिक को कानून में निर्धारित प्रक्रिया के अलावा उसके मौलिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।

    उन्होंने जमानत व्यवस्था पर भी सवाल उठाया और कहा कि कानूनी सिद्धांत है कि 'जेल नहीं, जमानत नियम है', लेकिन वास्तविकता में स्थिति इसके उलट होती जा रही है। उन्होंने कहा कि जिस देश में कानून का शासन और तब तक निर्दोष माने जाने का सिद्धांत स्वीकार किया जाता है, जब तक अपराध साबित न हो जाए, वहां हर दोषसिद्ध व्यक्ति के मुकाबले करीब तीन विचाराधीन कैदी होना चिंताजनक है।

    जस्टिस गुप्ता ने उमर खालिद के मामले का उदाहरण देते हुए कहा कि वह छह साल से अधिक समय से जेल में हैं और उनके मामले की सुनवाई तक शुरू नहीं हुई है। उन्होंने सवाल उठाया कि ऐसे में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और शीघ्र सुनवाई के अधिकार का क्या होगा। उन्होंने कहा कि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने खुद खालिद के मामले में दिए गए फैसले की वैधता पर सवाल उठाया।

    उन्होंने कहा कि कई मामलों में न्याय की प्रक्रिया ही सजा बन जाती है। किसी व्यक्ति को 'राष्ट्रविरोधी' का ठप्पा लगाकर उसकी जिंदगी बर्बाद कर दी जाती है और दुर्भाग्य से कई बार अदालतें ऐसे नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने में सफल नहीं होतीं।

    जस्टिस गुप्ता ने सोनम वांगचुक की हिरासत का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वांगचुक करीब छह महीने तक हिरासत में रहे। कानून का सामान्य विद्यार्थी भी जानता है कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर जल्द फैसला होना चाहिए। लेकिन इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई टालते हुए सरकार से मामले पर दोबारा विचार करने को कहा। बाद में जब सरकार को लगा कि अदालत उसके पक्ष में फैसला नहीं देगी तो हिरासत का आदेश वापस ले लिया गया। इसके बाद अदालत ने मामले को निष्फल मान लिया। जस्टिस गुप्ता के अनुसार अदालत को यह तय करना चाहिए था कि वांगचुक की हिरासत कानूनी थी या नहीं।

    बहुसंख्यकवाद को लेकर उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में बहुमत का शासन होता है, लेकिन बहुसंख्यकवाद, जिसमें दूसरे पक्ष की आवाज ही नहीं सुनी जाती, लोकतंत्र के मूल विचार के खिलाफ है। उन्होंने आरोप लगाया कि न्यायपालिका के सभी स्तर धीरे-धीरे इसी दिशा में बढ़ते दिखाई दे रहे हैं।

    राम जन्मभूमि मामले का उल्लेख करते हुए जस्टिस गुप्ता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि पूजा स्थलों से जुड़े दूसरे विवादों को दोबारा नहीं खोला जाएगा। इसके बावजूद बाद में ज्ञानवापी मस्जिद मामले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से यह पता लगाने का आदेश दिया गया कि वर्तमान मस्जिद वाली जगह पर पहले मंदिर था या नहीं। उनके मुताबिक इस आदेश को यह कहकर उचित ठहराया गया कि यह केवल जांच है, अंतिम फैसला नहीं।

    जस्टिस गुप्ता ने कहा कि इस आदेश ने मुकदमों का रास्ता खोल दिया, जिसका असर विभिन्न समुदायों के बीच भाईचारे पर पड़ सकता है। उन्होंने इसे बहुसंख्यक वर्ग को खुश करने की कोशिश के रूप में देखा।

    उन्होंने धार्मिक आधार पर अलग-अलग मामलों में जमानत दिए जाने के कथित अंतर का भी उल्लेख किया। जस्टिस गुप्ता ने कहा कि जब एक समुदाय के लोगों ने गंगा में नाव पर चिकन खाया तो उन्हें महीनों तक जमानत नहीं मिली, जबकि उसी पवित्र नदी में बहुसंख्यक समुदाय के कुछ लोगों द्वारा शराब पीने के मामले में कुछ ही घंटों में जमानत दी गई।

    सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्तियों पर भी उन्होंने सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि हाल के महीनों में सुप्रीम कोर्ट में कई नियुक्तियां हुई हैं और कुछ हाईकोर्ट के मुख्य जजों को भी सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किया गया। उनके अनुसार लगभग सभी, यदि सभी नहीं, उच्च जातियों से आते हैं और इनमें बड़ी संख्या ब्राह्मणों की है।

    उन्होंने स्पष्ट किया कि वह नियुक्त किए गए किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत योग्यता या ईमानदारी पर सवाल नहीं उठा रहे हैं। उनका कहना है कि देश के विभिन्न समुदायों और धर्मों में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। हाईकोर्ट के वरिष्ठ जजों में भी दूसरे समुदायों और धर्मों से आने वाले कई ऐसे लोग हैं, जो ईमानदारी और क्षमता के मामले में उत्कृष्ट हैं। ऐसे में देश की सुप्रीम कोर्ट में समाज के सभी वर्गों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व होना चाहिए।

    जस्टिस गुप्ता ने जजों की नियुक्ति की कॉलेजियम व्यवस्था को भी समस्या की जड़ बताया। उन्होंने कहा कि कॉलेजियम व्यवस्था विफल रही है और पूरी तरह अपारदर्शी हो गई। उनके अनुसार कॉलेजियम बेहद महत्वपूर्ण फैसले बिना पर्याप्त कारण बताए लेता है।

    उन्होंने कहा कि मुकदमों के निपटारे में भारी खर्च और लंबा समय लगने के बावजूद देश के लोगों ने न्यायपालिका पर लंबे समय तक भरोसा बनाए रखा है। हालांकि अब यह भरोसा कमजोर पड़ रहा है। सामाजिक माध्यमों पर जज लगातार निगरानी और आलोचना के दायरे में हैं, लेकिन इसके बावजूद आज भी बड़ी संख्या में लोग विधायिका और कार्यपालिका की तुलना में न्यायपालिका पर अधिक भरोसा करते हैं।

    जस्टिस गुप्ता ने वकीलों की भूमिका पर भी सवाल उठाया और कहा कि स्वतंत्र न्यायपालिका के लिए स्वतंत्र वकील समुदाय जरूरी है। उनके अनुसार वकीलों को राजनीतिक संबद्धता और जातीय पहचान से ऊपर उठकर नागरिकों के अधिकारों के लिए खड़ा होना चाहिए और सत्ता के सामने सवाल उठाने का साहस रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि वकीलों की फीस बहुत बढ़ गई, जबकि जरूरतमंदों के लिए मुफ्त कानूनी मदद का काम काफी कम हुआ है।

    उन्होंने बार काउंसिलों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर टिप्पणी की। जस्टिस गुप्ता ने कहा कि बार काउंसिलों का प्रमुख काम गलत आचरण करने वाले वकीलों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करना और कानूनी शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करना है, लेकिन दोनों मोर्चों पर व्यवस्था बुरी तरह विफल रही है। उन्होंने कहा कि कुछ संस्थानों को छोड़ दें तो देश के कई लॉ कॉलेजों में शिक्षा का स्तर अपेक्षा के अनुरूप नहीं है और पेशेवर आचरण का उल्लंघन करने वाले वकीलों के खिलाफ भी प्रभावी कार्रवाई नहीं होती।

    उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को सबसे महत्वपूर्ण अधिकारों में से एक बताया। उनका कहना है कि इस स्वतंत्रता का कई मामलों में खुले तौर पर उल्लंघन हो रहा है और अदालतें कई बार मूक दर्शक बनी रहती हैं।

    जस्टिस गुप्ता ने विरोध और असहमति के अधिकार को लोकतंत्र का अनिवार्य हिस्सा बताते हुए कहा कि शांतिपूर्ण विरोध में कुछ लोगों को असुविधा होना स्वाभाविक है। उनके अनुसार ऐसा कोई प्रभावी प्रदर्शन नहीं हो सकता जिससे किसी को कोई असुविधा न हो। उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि अब कुछ जज यह सुझाव देने लगे हैं कि विरोध प्रदर्शनों को कैसे सीमित किया जाए। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या ऐसे जज नागरिकों के असहमति जताने के अधिकार की रक्षा कर पाएंगे।

    अंत में जस्टिस गुप्ता ने कहा कि न्यायपालिका में अधिकांश जज ईमानदार और सक्षम हैं, लेकिन 'ब्लैक शीप्स' की संख्या बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि शीर्ष स्तर पर बैठे जजों को इस स्थिति पर आत्ममंथन करना चाहिए और न्यायपालिका की खोई प्रतिष्ठा वापस लाने के लिए कदम उठाने चाहिए।

    उन्होंने चेतावनी दी कि अगर लोगों का न्यायपालिका से भरोसा उठ गया तो न्यायपालिका खुद अप्रासंगिक हो जाएगी। ऐसी स्थिति लोकतांत्रिक भारत के लिए बेहद गंभीर होगी, क्योंकि जहां लोकतंत्र नहीं होता, वहां नागरिक वास्तविक अर्थों में स्वतंत्र नहीं हो सकते।

    जस्टिस गुप्ता ने अमेरिकी राजनेता जे. विलियम फुलब्राइट के कथन का हवाला देते हुए कहा,

    “लोकतंत्र में असहमति विश्वास की अभिव्यक्ति है।”

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