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सीजेआई बोबडे ने कहा, न्याय जब बदला लेने के रूप में होता है तो वह अपना चरित्र खो देता है

Sharafat Khan
8 Dec 2019 1:45 AM GMT
सीजेआई बोबडे ने कहा,  न्याय जब बदला लेने के रूप में होता है तो वह अपना चरित्र खो देता है
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हैदराबाद बलात्कार और हत्या मामले के चार आरोपियों की हालिया पुलिस मुठभेड़ की ओर इशारा करते हुए मुख्य न्यायाधीश एस ए बोबडे ने जोधपुर, राजस्थान में नए उच्च न्यायालय भवन के उद्घाटन समारोह में बोलते हुए टिप्पणी की कि न्याय जब बदले के रूप में होता है तो वह अपना चरित्र खो देता है।

चीफ जस्टिस बोबडे ने कहा,

"देश में हाल की घटनाओं ने इस पूरी बहस को नए जोश के साथ छेड़ दिया है ... मुझे नहीं लगता कि न्याय कभी भी तत्काल हो सकता है या तत्काल होना चाहिए। और न्याय कभी भी बदला लेने के रूप में नहीं होना चाहिए। मेरा मानना है कि न्याय जब बदले के रूप में होता है तो वह अपना चरित्र खो देता है।"

उन्होंने वर्तमान न्यायिक प्रणाली में मौजूदा अंतराल को स्वीकार किया और कहा कि स्वयं-सुधार तंत्र को विकसित किया जाना चाहिए था।

उन्होंने कहा, "इसमें कोई संदेह नहीं है कि आपराधिक न्याय प्रणाली को आपराधिक मामलों के निपटान में लगने वाले समय को देखते हुए अपनी स्थिति और रवैये पर पुनर्विचार करना चाहिए।"

उन्होंने कहा कि न्यायिक प्रणाली में तकनीक का उपयोग समय पर न्याय तक पहुंच को मजबूत करने में एक उपकरण के रूप में कार्य करेगा।



हाल ही में लॉन्च किए गए नए सुप्रीम कोर्ट ऐप और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस संचालित अनुवाद इंजन SUVAS का उदाहरण देते हुए कहा,

"मैं इस प्रक्रिया के अगले चरण के रूप में अपनी न्याय प्रशासन प्रणाली की दक्षता में सुधार करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग की परिकल्पना करता हूं। न्याय प्रशासन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग हमें न्यायिक समय और संसाधनों को पुनर्निर्देशित करने और जटिल मामलों को हल करने में सहायक है, जिसमें दिमाग लगाने की आवश्यकता होती है। "

उन्होंने मुकदमेबाजी से पहले मध्यस्थता को बढ़ावा देने पर ज़ोर दिया जिससे मुकदमेबाजी पर अंकुश लगाने में सहायता मिले। इस संबंध में यह सुझाव दिया गया कि मध्यस्थता के परिणाम में डिक्री का बल होना चाहिए।

सीजेआई ने कहा,

"मुकदमेबाजी के निष्कर्ष के लिए लिया गया समय एक बड़ी बाधा है, इसलिए एडीआर के उपयोग को मजबूत करने के लिए आवश्यक है, विशेष रूप से प्री-लिटिगेशन मध्यस्थता। आश्चर्यजनक रूप से मध्यस्थता में डिग्री या डिप्लोमा प्रदान करने के लिए कोई पाठ्यक्रम उपलब्ध नहीं है। हमने पहल की है और बीसीआई से इस पर काम करने के लिए कहा है। बीसीआई ने इस संदर्भ में नए पाठ्यक्रमों की शुरुआत के लिए सैद्धांतिक रूप से सहमति जताई। "

इस कार्यक्रम का उद्घाटन राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने किया। इस कार्यक्रम में केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद, सीजेआई एसए बोबडे, न्यायमूर्ति एनवी रमना और नालसा के कार्यकारी अध्यक्ष भी मौजूद थे।

सीजेआई की स्पीच डाउनलोड करने के लिए यहांं क्लिक करेंं



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