सुप्रीम कोर्ट ने खुद को सुप्रीम कोर्ट वकील बताकर बिल्डरों से ठगी करने की आरोपी महिला को दी जमानत

Amir Ahmad

7 Feb 2026 1:39 PM IST

  • सुप्रीम कोर्ट ने खुद को सुप्रीम कोर्ट वकील बताकर बिल्डरों से ठगी करने की आरोपी महिला को दी जमानत

    सुप्रीम कोर्ट ने खुद को सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाली वकील बताकर कई लोगों से करोड़ों रुपये की ठगी करने की आरोपी लगभग 60 वर्षीय महिला को जमानत दी। कोर्ट ने बॉम्बे हाइकोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें महिला की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी गई।

    जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने पूनम चरणदास खन्ना की विशेष अनुमति याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि लंबे समय से न्यायिक हिरासत में रहने और मुकदमे की धीमी गति को देखते हुए जमानत का मामला बनता है।

    आरोपी महिला के खिलाफ मुंबई के खेरवाड़ी पुलिस स्टेशन में वर्ष 2020 में FIR दर्ज की गई। आरोप है कि उसने खुद को सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाली वकील बताकर कई लोगों को झांसा दिया और उनसे बड़ी रकम वसूल की। इस मामले में उस पर IPC की धारा 420 और 406, धारा 34 के साथ के तहत आरोप लगाए गए।

    पूनम खन्ना 29 जनवरी 2024 से न्यायिक हिरासत में थीं। उनकी जमानत याचिका बॉम्बे हाइकोर्ट ने 8 दिसंबर, 2025 को खारिज की जिसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

    सुप्रीम कोर्ट के सामने दलील दी गई कि आरोपी एक बुजुर्ग महिला हैं और दो साल से अधिक समय से जेल में हैं, जबकि ट्रायल बेहद धीमी गति से चल रहा है। बताया गया कि कुल 12 गवाहों में से अब तक केवल 8 गवाहों की ही गवाही हो पाई। फिर यह स्पष्ट नहीं है कि मुकदमा कब समाप्त होगा। यह भी कहा गया कि आरोपित अपराधों में अधिकतम सजा सात साल की है।

    वहीं महाराष्ट्र सरकार और पीड़ित पक्ष ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि आरोपी ने जानबूझकर खुद को वकील बताकर लोगों का भरोसा जीता और ठगी की। यह भी तर्क दिया गया कि उसने कई पीड़ितों को धोखा दिया।

    दोनों पक्षकारों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा,

    “लंबे समय तक हिरासत में रहने और अपराध की प्रकृति को देखते हुए जमानत देने का मामला बनता है।”

    कोर्ट ने निर्देश दिया कि आरोपी को ट्रायल कोर्ट के समक्ष पेश किया जाए और वहां तय की जाने वाली शर्तों पर जमानत पर रिहा किया जाए। साथ ही यह भी कहा गया कि वह कार्यवाही में पूरा सहयोग करेगी और जमानत की स्वतंत्रता का दुरुपयोग नहीं करेगी। किसी भी शर्त के उल्लंघन पर जमानत रद्द की जा सकती है।

    प्रॉसिक्यूशन के अनुसार शिकायतकर्ता अशोक गोविंदराम मोहनानी एक बिल्डर हैं जो दो कानूनी मामलों में प्रतिनिधित्व के लिए वकील की तलाश में थे। एक परिचित के माध्यम से उनकी मुलाकात आरोपी से हुई, जिसने खुद को सुप्रीम कोर्ट की वकील बताया और कानूनी मदद का भरोसा दिया। आरोप है कि उसने 15 लाख रुपये फीस की मांग की जिसमें से 10 लाख रुपये अग्रिम रूप से लिए गए।

    आगे आरोप लगाया गया कि इलाके में बिजली ट्रांसफॉर्मर न लगने से बिल्डरों को नुकसान हो रहा था। इस समस्या के समाधान के लिए आरोपी ने कानूनी कार्रवाई का भरोसा दिलाते हुए 3 करोड़ रुपये की मांग की। समझौते के तहत बिल्डरों ने 2.11 करोड़ रुपये देने पर सहमति जताई और कई किस्तों में रकम दी गई। हालांकि, कोई कानूनी कार्यवाही शुरू नहीं की गई। बाद में पता चला कि आरोपी वकील ही नहीं है और उसने कई अन्य लोगों को भी इसी तरह ठगा है।

    इस आदेश के साथ सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को राहत देते हुए जमानत मंजूर की।

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