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क्या खून के नमूने लेने के लिए अभियुक्त की सहमति आवश्यक है? जानिए जवाब

LiveLaw News Network
7 Aug 2019 8:17 AM GMT
क्या खून के नमूने लेने के लिए अभियुक्त की सहमति आवश्यक है? जानिए जवाब
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क्या भारत के संविधान का अनुच्छेद 20 (3), जो एक अपराध के आरोपी व्यक्ति को खुद के खिलाफ गवाह होने के लिए मजबूर करने से बचाता है, ऐसे आरोपी को अपराध के अन्वेषण के दौरान अनिवार्य रूप से खून या अन्य नमूना देने के लिए मजबूर करने से बचाता है?

यह सवाल तिरुवनंतपुरम में शनिवार की सुबह के दौरान हुई एक सड़क दुर्घटना के संदर्भ में उत्पन्न हुआ है, जो दुर्घटना कथित रूप से केरल सरकार की सेवा में कार्यरत एक IAS अधिकारी श्रीराम वेंकटरमण के कारण हुई थी। दरअसल इस दुर्घटना में एक पत्रकार, के. मुहम्मद बशीर की मृत्यु उस वक़्त हो गई थी, जब उनकी बाइक एक कार से टकरा गई थी, जिसे कथित तौर पर आईएएस अधिकारी चला रहे थे।

ऐसी खबरें हैं कि पुलिस ने वेंकटरमण के रक्त के नमूने (blood sample) नहीं लेने का फैसला किया, हालांकि इस बात के चश्मदीद गवाह मौजूद थे कि वह गाडी चलाते वक़्त नशे में थे। पुलिस ने कथित तौर पर मीडिया को यह बताया है कि श्रीराम वेंकटराम की सहमति के बिना रक्त के नमूने, कानून के अनुसार नहीं लिए जा सकते हैं।

यह गौरतलब है कि कानूनी की यह स्थायी स्थिति नहीं है, अर्थात पुलिस द्वारा दिया गया यह तर्क, कानून की मौजूदा स्थिति के बारे में सही नहीं है। दरअसल पुलिस के पास कानून के तहत एक अभियुक्त को अन्वेषण के प्रयोजनों के लिए उसकी इच्छा के खिलाफ रक्त के नमूने देने के लिए मजबूर करने की शक्ति है।

यह दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 53 से स्पष्ट है, जो स्पष्ट रूप से यह कहती है कि "उचित बल" का उपयोग किसी भी पुलिस अधिकारी द्वारा अभियुक्त की चिकित्सा जांच के लिए किया जा सकता है। उस प्रावधान के स्पष्टीकरण में यह कहा गया है कि "परीक्षा में खून, खून के धब्बों, सीमेन, लैंगिक अपराधों की दशा में सुआब, सपूटम और पसीना, बाल के नमूने और उंगली के नाखून की कतरन आदि शामिल होगी।"

शराब पीकर ड्राइव करने के मामले में, रक्त का नमूना (blood sample) नशे के स्तर को निर्धारित करने के लिए एक महत्वपूर्ण सबूत है। मोटर वाहन अधिनियम 1988 की धारा 204 में पुलिस की शक्ति के बारे में बात की गयी है, जिसके अंतर्गत पुलिस द्वारा किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसको लेकर यह आशंका है कि वह नशे में ड्राइविंग के अपराध में शामिल है, रक्त के नमूने प्रदान करने के लिए कहा जा सकता है।

इसलिए, इस मामले में कानून बहुत स्पष्ट है कि पुलिस, आरोपियों को रक्त के नमूने प्रदान करने के लिए मजबूर कर सकती है। क्या यह आत्म-दोषारोपण के खिलाफ अधिकार (right against self-incrimination) का उल्लंघन करेगा?

इस तर्क को कुछ लोगों द्वारा उठाया जाता है कि शारीरिक वस्तुओं/लक्षणों का अनिवार्य रूप से लिया जाना, संविधान के अनुच्छेद 20 (3) के तहत दिए गए आत्म-दोषारोपण के खिलाफ मौलिक अधिकार का उल्लंघन करेगा।

यद्यपि यह एक आक्रामक प्रक्रिया प्रतीत होती है, परन्तु आपराधिक अन्वेषण के लिए शारीरिक पदार्थों/लक्षणों का अनिवार्य रूप से लिया जाना अनुच्छेद 20 (3) के उल्लंघन का मामला नहीं होगा।

वर्ष 1961 में 11 न्यायाधीशों की पीठ ने बॉम्बे राज्य बनाम काठी कालू औघड़ के फैसले में यह स्थिति साफ़ की थी कि, किसी आरोपी की अंगूठे की छाप (thumb impressions), फिंगर प्रिंट (finger print) या नमूना लिखावट (specimen handwriting) लेना, अनुच्छेद 20 (3) का उल्लंघन नहीं होगा। इस मामले में न्यायालय ने यह तर्क दिया था कि, अनुच्छेद 20 (3) का संरक्षण किसी व्यक्ति की व्यक्तिपरक चेतना (subjective consciousness) के भीतर मौजूद मामलों के लिए उपलब्ध है, न कि उसकी शारीरिक विशेषताओं के लिए। ऐसी भौतिक वस्तुएं/लक्षण, 'गवाही' (testimony) नहीं कही जा सकती हैं और ऐसे मामलों में किसी को 'खुद के खिलाफ गवाह होने के लिए' मजबूर किया जाना नहीं कहा जा सकता है।

"फिंगर इंप्रेशन या नमूना हस्ताक्षर या लिखावट (handwriting) का दिया जाना, 'साक्षी होना नहीं' है। 'गवाह बनना' का अर्थ है, एक ऐसे व्यक्ति द्वारा जिसे तथ्यों की व्यक्तिगत जानकारी है, उसके द्वारा मौखिक रूप से या लिखित रूप में बयानों द्वारा प्रासंगिक तथ्य के संबंध में अदालत में या किसी जाँच एजेंसी या जाँच करने वाले व्यक्ति को उस सम्बन्ध में ज्ञान प्रदान करना। एक व्यक्ति को तथ्यों की एक निश्चित स्थिति के लिए 'एक गवाह होने के लिए' उस स्थिति में कहा जाता है जब वह विवाद में मामलों के संबंध में, जो कुछ उसने देखा है या सुना है, उसके बारे में गवाही दे दे और यह rule excluding hearsay के नियम के खिलाफ न हो या वह एक्सपर्ट (विशेषज्ञ) के रूप में उसकी राय न हो, और इसे एक अदालत या एक ऐसे प्राधिकरण द्वारा, जिसे निर्णय लेने के लिए अधिकृत किया गया है, तय किया जाएगा," अदालत ने कहा था.

इसे बाद में सेल्वी बनाम राज्य में सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2010 के फैसले द्वारा समझाया गया था। कोर्ट ने यहां जांच तकनीक जैसे कि नार्को-एनालिसिस, ब्रेन मैपिंग, पॉली ग्राफ टेस्ट आदि और शारीरिक पदार्थों/लक्षणों को लेने की अनिवार्यता के बीच अंतर किया था।

"मानसिक मामलों" (matters of mind) और "शारीरिक मामलों" (matters of body) के बीच के अंतर के आधार पर आगे बढ़ते हुए, न्यायालय ने यह कहा कि किसी व्यक्ति को नार्को-विश्लेषण, ब्रेन मैपिंग और पॉली ग्राफ से गुजरने के लिए मजबूर करने के परिणामस्वरूप अनुच्छेद 20 (3) का उल्लंघन होगा। हालांकि, अनुच्छेद 20 (3) द्वारा शारीरिक पदार्थों/लक्षणों को अनिवार्य रूप से लिए जाने को प्रभावित नहीं किया जाएगा।

इस मुद्दे पर अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया आदि के कई फैसलों का उल्लेख करते हुए, न्यायालय ने यह देखा:

"एक चिकित्सीय परीक्षण के दौरान रक्त के नमूनों का अनिवार्य रूप से लिया जाना, 'विवेक को झकझोरने वाले आचरण' (conduct that shocks the conscience) नहीं कहा जा सकता है। इस बात का भी समर्थन मौजूद है कि कानून के तहत 'बल का यथोचित रूप से आवश्यक होना' (force as may be reasonably necessary) अनिवार्य है। और इसलिए यह 'कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया' (procedure established by law) की सीमा को पूरा करता है।"

संजीव नंदा बनाम दिल्ली एनसीटी (2007 CriLJ 3786) के मामले में, न्यायमूर्ति रवींद्र भट्ट (वर्तमान में मुख्य न्यायाधीश, राजस्थान उच्च न्यायालय) की एकल पीठ ने यह कहा कि एक न्यायिक मजिस्ट्रेट, अभियुक्त को जांच के दौरान या ट्रायल के समय 'खून के नमूने' देने का आदेश दे सकता है। इस मामले में अदालत ने कहा, "हालांकि कोड की धारा 53, एक पुलिस अधिकारी के अनुरोध पर एक चिकित्सा अधिकारी द्वारा अभियुक्त की जांच को संदर्भित करती है, पर ऐसा कोई कारण नहीं है कि अदालत के पास आपराधिक मामलों में न्याय करने के उद्देश्य से, पुलिस अधिकारी को आरोपी से रक्त का नमूना एकत्र करने के लिए एक निर्देश देने की एक व्यापक शक्ति नहीं होनी चाहिए।"

कोडी सतीश नायडू बनाम आंध्र प्रदेश राज्य में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय का वर्ष 2015 का निर्णय इस बिंदु पर है। उस मामले में प्रमुख बिंदु निम्नलिखित थे:

(i) क्या भारत के संविधान का अनुच्छेद 20 (3), जो एक अपराध के आरोपी व्यक्ति को खुद के खिलाफ गवाह होने के लिए मजबूर करने से बचाता है, ऐसे आरोपी को अपराध के अन्वेषण के दौरान अनिवार्य रूप से खून या अन्य नमूना देने के लिए मजबूर करने से बचाता है (जैसा कि CrPC की धारा 53 में उल्लिखित है)?

(ii) यह मानते हुए कि भारत के संविधान केअनुच्छेद 20 (3) का कोई उल्लंघन नहीं है, क्या मजिस्ट्रेट का आदेश, जिसमे डीएनए फिंगर प्रिंट परिक्षण/डीएनए प्रोफाइलिंग के उद्देश्य से रक्त के नमूने को देने हेतु आरोपी को सम्मन (summon) प्रदान करने का निर्देश दिया गया है, क्या वह आदेश हटाया जाना चाहिए?

काठी कालू औघड़ और सेल्वी मामले का उल्लेख करते हुए, अदालत ने इस मामले में यह कहा कि संविधान के अनुच्छेद 20 (3) के अंतर्गत एक अभियुक्त को धारा 53 सीआरपीसी के अनुसार रक्त के नमूने देने के लिए मजबूर होने से बचाव प्राप्त नहीं है। यह न्यायमूर्ति एम. सीथाराम मूर्ति द्वारा अभिनिर्णित किया गया था:

"न्यायालय यह पाता है कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 20 (3), जो एक अपराध के आरोपी व्यक्ति को खुद के खिलाफ गवाह होने के लिए मजबूर करने से बचाता है, ऐसे आरोपी को एक अपराध के अन्वेषण के दौरान CrPC की धारा 53 में उल्लिखित उद्देश्यों के तहत अपने खून वगेरह का नमूना देने के लिए मजबूर होने से बचाव प्रदान नहीं करता है। इसलिए, मुझे आदेश में कोई खराबी नहीं मिली है."

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