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अगर एनसीएलटी सार्वजनिक क़ानून के बारे में कोई आदेश पास करता है तो हाईकोर्ट हस्तक्षेप कर सकता है : सुप्रीम कोर्ट

LiveLaw News Network
7 Dec 2019 5:00 AM GMT
अगर एनसीएलटी सार्वजनिक क़ानून के बारे में कोई आदेश पास करता है तो हाईकोर्ट हस्तक्षेप कर सकता है : सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर एनसीएलटी ने ऐसा कोई आदेश दिया है जो सार्वजनिक क़ानून से संबंधित है तो हाईकोर्ट अनुच्छेद 226 के तहत अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए हस्तक्षेप कर सकता है।

न्यायमूर्ति नरीमन, न्यायमूर्ति बोस और न्यायमूर्ति रामासुब्रमनियन की पीठ ने कहा कि निगमित ऋणधारक के अपने अधिकारों का प्रयोग करने के दौरान अगर यह आईबीसी, 2016 की परिधि के बाहर होता है और विशेषकर सार्वजनिक क़ानून के तहत आता है तो उस स्थिति में वह अपने अधिकारों पर अमल के लिए एनसीएलटी में नहीं जा सकता।

अदालत को निर्णय करना था -

a. अगर एनसीएलटी ने आईबीसी कोड, 2016 के तहत कोई आदेश पास किया है और इस क्रम में राष्ट्रीय कंपनी लॉ अपीली ट्रिब्यूनल की कहीं अनदेखी तो नहीं की है और अगर अगर एनसीएलटी ने आईबीसी कोड, 2016 के तहत कोई आदेश पास किया है तो क्या हाईकोर्ट को संविधान के अनुच्छेद 226/227 के तहत हस्तक्षेप करना चाहिए। तथा

b. क्या आईबीसी कोड 2016 की प्रक्रिया के तहत क्या धोखाधड़ी के मामले की जांच की जा सकती है?

पीठ हाईकोर्ट की खंडपीठ के तीन अंतरिम आदेशों के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

रिजोल्यूशन एप्लिकेंट के वकील केवी विश्वनाथन ने कहा कि हाईकोर्ट को इस मामले में अपने अधिकारों का प्रयोग नहीं करना चाहिए था विशेषकर एनसीएलटी के चेन्नई पीठ के खिलाफ।

विश्वनाथन ने कहा कि आईबीसी के अन्दर उपलब्ध उपचार विशिष्ट है, इसलिए सिर्फ आईबीसी के माध्यम से ही इंसोल्वेंसी पेशेवरों के निर्णयों के खिलाफ कदम उठाया जा सकता है।

वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि यद्यपि वह यह नहीं कहेंगे कि हाईकोर्ट के अधिकार की पूरी तरह अनदेखी की गई है पर इस तरह के मामलों में हाईकोर्ट को अपन हाथ खड़े कर देने चाहिए थे।

रिजोल्यूशन प्रोफेशनल के वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि अगर एनसीएलटी के आदेश को अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट के अधिकार के तहत माना जाता है तो आईबीसी का उद्देश्य ही पराजित हो जाएगा।

उन्होंने यह भी कहा कि आईबीसी कोड 2016 के प्रावधानों को धारा 238 के तहत अन्य सभी कानूनों पर वरीयता दी गई है।

कमिटी ऑफ़ क्रेडिटर्स के वकील अरविन्द दातार और ई ओम प्रकाश ने कहा कि आईबीसी अपने आप में ही एक पूर्ण कोड है और यह एनसीएलटी के आदेशों को चुनौती देने की इजाजत नहीं देता. ऐसा सिर्फ कोड के अनुसार ही किया जा सकता है।

दूसरी और, अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि अगर मामला ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र के बाहर का बनता है तो उस स्थिति में अगर ट्रिब्यूनल अपने अधिकारों का प्रयोग करता है तो उसे अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट के अधिकारक्षेत्र के तहत माना जाएगा।

वेणुगोपाल ने कहा कि एनसीएलटी सिर्फ उन्हीं मामलों पर गौर कर सकता है जो पक्षकारों के बीच करार से जुड़े हुए हैं. वह ऐसे अर्ध-न्यायिक/वैधानिक निकायों के आदेशों की समीक्षा नहीं कर सकता जो सार्वजनिक क़ानून के दायरे में आते हैं।

पहले मामले के सन्दर्भ में अदालत ने कहा कि क्षेत्राधिकार का नहीं होना और उपलब्ध क्षेत्राधिकार का गलत प्रयोग के मुद्दे पर हाईकोर्ट को उस स्थिति में निश्चित ही गौर करना चाहिए जब अनुच्छेद 226 का हवाला वैकल्पिक वैधानिक उपचार के लिए दिया जा रहा है।

अदालत ने अटॉर्नी जनरल की दलील से सहमति जताई और कहा कि एनसीएलटी को एक बड़ी अदाला का दर्जा नहीं दिया जा सकता जिसके पास प्रशासनिक कार्रवाई की न्यायिक समीक्षा का अधिकार हो।

अदालत ने कहा,

"एनसीएलटी तो सिविल कोर्ट भी नहीं है जिसके पास सीपीसी की धारा 9 के तहत यह अधिकार है कि वह दीवानी मामले की सुनवाई कर सकता है और जो मामले वह नहीं सुन सकता उसके बारे में स्पष्ट उल्लेख किया गया है. इसलिए एनसीएलटी सिर्फ नियम के अनुसार अपने क्षेत्राधिकार के तहत आनेवाले मामलों की ही सुनवाई कर सकता है और जो कानूनन उसे सौंपा गया है।"

जहां तक वर्तमान मामले में एनसीएलटी के क्षेत्राधिकार की बात है, सरकार या किसी वैधानिक निकाय का कोई निर्णय जो सार्वजनिक क़ानून से संबंधित है, को आईबीसी की धारा 60 (5)(c) के अधीन किसी भी तरीके से नहीं लाया जा सकता।

यह मुद्दा कि एनसीएलटी धोखाधड़ी के किसी मामले पर गौर कर सकता है कि नहीं, अदालत ने कहा कि धारा 69 किसी निगमित कर्जदार के अधिकारी और निगमित कर्जदार को किसी ऋणदाता को धोखा देने की नीयत से कोई कारोबार करने पर सजा दे सकता है, इसलिए एनसीएलटी को यह अधिकार है कि वह फर्जी कार्यवाही और धोखाधड़ी की जांच करे।



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