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अपराधी मानसिक परेशानी में था' : सुप्रीम कोर्ट ने तीन बच्चों के अपहरण- हत्या के दोषी की मौत की सजा आजीवन कारावास में बदली 

LiveLaw News Network
7 March 2020 3:55 AM GMT
अपराधी मानसिक परेशानी में था : सुप्रीम कोर्ट ने तीन बच्चों के अपहरण- हत्या के दोषी की मौत की सजा आजीवन कारावास में बदली 
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सुप्रीम कोर्ट ने तीन बच्चों के अपहरण के बाद उनकी हत्या के आरोपी शख्स की मौत की सजा को आजीवन कारावास में तब्दील कर दिया है।

ट्रायल कोर्ट द्वारा मनोज सूर्यवंशी को IPC की धारा 302 और 364 के तहत दोषी ठहराया गया और मौत की सजा सुनाई गई। बाद में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने इसकी पुष्टि की।

शिवलाल के दो बेटे, 8 वर्ष का विजय, 6 वर्ष के अजय और चार साल की बेटी कुमारी साक्षी का आरोपियों ने अपहरण किया और फिर हत्या कर दी थी।

रिकॉर्ड पर सबूतों को ध्यान में रखते हुए न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित की पीठ ने उच्च न्यायालय और ट्रायल कोर्ट द्वारा दर्ज समवर्ती दोषसिद्धि की पुष्टि की। पीठ ने इस दलील को भी खारिज कर दिया कि चूंकि सजा उसी दिन सुनाई गई थी जिस दिन दोषसिद्धि सुनाई गई थी और इसलिए इससे सजा समाप्त हो गई है।

पीठ ने कहा:

" कानून का कोई पूर्ण प्रस्ताव नहीं है कि किसी भी मामले में उसी दिन दोषसिद्धि और सजा नहीं हो सकती है। किसी भी निर्णय में इस न्यायालय द्वारा निर्धारित कानून का कोई पूर्ण प्रस्ताव नहीं है कि यदि सजा उसी दिन प्रदान की गई है जिस दिन दोषसिद्धि तय गई थी, तो सजा समाप्त हो जाएगी।"

अबरार आलम बनाम बिहार राज्य (2012) 2 SCC 728 में दिए गए फैसले का उल्लेख करते हुए पीठ ने कहा कि अभियुक्तों की मानसिक स्थिति या स्थिति मन के उन कारकों में से एक है, जिन पर सजा के सवाल पर विचार के दौरान गौर किया जा सकता है।

यह उल्लेख किया गया है कि यह सबूत मौजूद हैं कि ये अपराध अत्यधिक मानसिक या भावनात्मक अशांति के प्रभाव के तहत किया गया था और मृतक के चाचा के साथ अपनी पत्नी के भाग जाने के कारण आरोपी भावनात्मक रूप से परेशान था और उसके बच्चे इस अनुपस्थिति में पीड़ित थे।

इन परिस्थितियों को सजा कम करने के कारक के रूप में देखते हुए, पीठ ने कहा:

" हमारा विचार है कि मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में, विशेष रूप से, अपराध के समय अभियुक्त की मानसिक स्थिति और यह कि वो अपनी पत्नी के चाचा के साथ जाकर रहने के कारण अत्यधिक मानसिक अशांति में था और उसके बच्चे अपनी मां के साथ से वंचित थे, हम आरोपी की मौत की सजा को उम्रकैद में बदलने के पक्ष में हैं।"

यह सच है कि अदालत को समाज की चीख पुकार का जवाब देना चाहिए और यह तय करना चाहिए कि घृणित अपराध के लिए निवारक सजा क्या होगी। यह भी उतना ही सच है कि बड़ी संख्या में अपराधी बेखौफ हो जाते हैं, जिससे समाज और कानून में अपराधियों की तादाद बढ़ती है और इसका प्रभाव कम होता जा रहा है।

यह भी सच है कि किसी दिए गए मामले की अजीबोगरीब परिस्थितियां अक्सर न्याय को विफल करती हैं और न्याय वितरण प्रणाली को संदेहास्पद बनाती हैं; अंतिम विश्लेषण में, समाज पीड़ित होता है और एक अपराधी को प्रोत्साहित किया जाता है। कभी-कभी यह कहा जाता है कि केवल अपराधियों के अधिकारों को ध्यान में रखा जाता है, पीड़ितों को भुला दिया जाता है।

हालांकि, एक ही समय में, दुर्लभतम सजा, यानी मौत की सजा के मामले को थोपते समय, न्यायालय को अपराध की विकट और विकट परिस्थितियों को संतुलित करना होगा और यह प्रत्येक मामले के विशेष और अजीब तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

मौत की सजा को आजीवन कारावास में परिवर्तित करते हुए पीठ ने निर्देश दिया कि जीवन का अर्थ है जीवन के अंत तक और निर्देश दिया कि आरोपी के 25 साल के कारावास को पूरा करने तक कोई छूट नहीं होगी। 

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