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नवलखा और तेलतुंबडे ने कहा, COVID-19 के दौरान जेल जाना, मौत की सज़ा के जैसा, सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी से संरक्षण बढ़ाने की याचिका पर आदेश सुरक्षित रखा

LiveLaw News Network
8 April 2020 9:01 AM GMT
नवलखा और तेलतुंबडे ने कहा, COVID-19 के दौरान जेल जाना, मौत की सज़ा के जैसा, सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी से संरक्षण बढ़ाने की याचिका पर आदेश सुरक्षित रखा
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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (UAPA) के तहत दर्ज मामले में गिरफ्तारी से अंतरिम संरक्षण के विस्तार के लिए एक्टिविस्ट गौतम नवलखा और आनंद तेलतुंबडे द्वारा दायर आवेदनों पर आदेश सुरक्षित रख लिया। 1 जनवरी, 2018 को पुणे जिले के कोरेगांव भीमा गांव में हिंसा के बाद गौतम नवलखा और आनंद समेत अन्य कार्यकर्ताओं को पुणे पुलिस ने उनकी कथित माओवादी लिंक और कई अन्य आरोपों के लिए आरोपी बनाया है।

जस्टिस अरुण मिश्रा और इंदिरा बनर्जी की एक बेंच ने याचिका पर सुनवाई की।

गौतम नवलखा और आनंद तेलतुम्बडे की ओर से पेश वकील ने कहा कि दोनों कार्यकर्ता 65 वर्ष से अधिक उम्र के हैं और उन्हें दिल की बीमारी है। उन्होंने कहा कि इस समय कोरोनो वायरस के संक्रमण के फैलने के दौरान जेल जाना मौत की सजा की तरह है।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने कहा कि "यह केवल समय लेने के लिए एक तरकीब है और दोनों कार्यकर्ता गंभीर आरोपों का सामना कर रहे हैं।"

सुप्रीम कोर्ट ने 16 मार्च को भीमा कोरेगांव मामले में एक्टिविस्ट गौतम नवलखा और आनंद तेलतुंबडे को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया। जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस एमआर शाह की खंडपीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के 15 फरवरी के फैसले को चुनौती देने वाली उनकी विशेष अनुमति याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिसमें इस आधार पर उन्हें अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया गया था कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री के आधार पर उनके खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनाया गया था।

बॉम्बे उच्च न्यायालय ने गौतम नवलखा और तेलतुंबडे को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया था। हालांकि गिरफ्तारी से अंतरिम संरक्षण को चार सप्ताह की अवधि के लिए बढ़ा दिया ताकि वे अपील में सर्वोच्च न्यायालय का रुख कर सकें। उनकी याचिकाओं पर नोटिस जारी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 16 मार्च तक ऐसी अंतरिम सुरक्षा बढ़ा दी थी।

16 मार्च को पीठ ने कहा कि जांच एजेंसी द्वारा एकत्र की गई सामग्री को देखते हुए याचिकाएं सुनवाई योग्य नहीं हैं। हालांकि याचिकाकर्ताओं के वकील ने अंतरिम संरक्षण के कम से कम एक सप्ताह के विस्तार की मांग की थी, लेकिन पीठ ने इनकार कर दिया।

दरअसल 1 जनवरी, 2018 को पुणे जिले के कोरेगांव भीमा गांव में हिंसा के बाद गौतम नवलखा और आनंद समेत अन्य कार्यकर्ताओं को पुणे पुलिस ने उनके कथित माओवादी लिंक और कई अन्य आरोपों के लिए आरोपी बनाया है।

बॉम्बे उच्च न्यायालय ने नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं गौतम नवलखा और तेलतुंबडे को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया था। हालांकि गिरफ्तारी से अंतरिम संरक्षण को चार सप्ताह की अवधि के लिए बढ़ा दिया ताकि वे अपील में सर्वोच्च न्यायालय का रुख कर सकें।

पुलिस ने आरोप लगाया है कि वो सम्मेलन माओवादियों द्वारा समर्थित था। तेलतुंबडे और नवलखा ने उच्च न्यायालय में पिछले साल नवंबर में गिरफ्तारी से पहले जमानत की मांग की थी, जब पुणे की सत्र अदालत ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। हालांकि पुणे पुलिस मामले की जांच कर रही थी, लेकिन केंद्र ने पिछले महीने जांच को राष्ट्रीय जांच एजेंसी को स्थानांतरित कर दिया था। दरअसल उच्च न्यायालय ने नवलखा के खिलाफ 1 जनवरी 2018 को पुणे पुलिस द्वारा दर्ज FIR को रद्द करने से इनकार कर दिया था।

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