कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी की निजी संपत्ति पर जबरन कब्जा करना मानवाधिकार और संवैधानिक अधिकार दोनों का उल्लंघन : सुप्रीम कोर्ट

  • सुप्रीम कोर्ट, दिल्ली

    सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति पर जबरन कब्जा करना उसके मानवाधिकार और संवैधानिक अधिकार दोनों का उल्लंघन है।

    सुख दत्त रात्रा और भगत राम ने उस जमीन के मालिक होने का दावा किया जिसका इस्तेमाल 1972-73 में 'नारग फगला रोड' के निर्माण के लिए किया गया था। उन्होंने 2011 में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के समक्ष एक रिट याचिका दायर की, जिसमें विषय भूमि के मुआवजे या अधिनियम के तहत अधिग्रहण की कार्यवाही शुरू करने की मांग की गई थी।

    उन्होंने आरोप लगाया कि न तो भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही शुरू की गई और न ही उन्हें या आसपास की जमीन के मालिकों को मुआवजा दिया गया। हाईकोर्ट ने कानून के अनुसार दीवानी वाद दायर करने की स्वतंत्रता के साथ इस रिट याचिका का निपटारा कर दिया।

    सुप्रीम कोर्ट के समक्ष, उन्होंने (अपीलकर्ताओं) ने तर्क दिया कि राज्य ने कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना, उनकी भूमि पर अवैध रूप से कब्जा कर लिया था। उनकी याचिका का विरोध करते हुए, राज्य ने प्रस्तुत किया कि अपीलकर्ताओं ने 1972-73 में राज्य द्वारा की गई कार्रवाई के खिलाफ 2011 में 38 साल की अत्यधिक देरी के बाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था; और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने में लगभग 6 साल का और अधिक विलंब किया गया।

    जस्टिस एस रवींद्र भट और जस्टिस पी एस नरसिम्हा की पीठ ने कहा कि, वर्तमान मामले में, राज्य ने, एक गुप्त और मनमाने तरीके से, सक्रिय रूप से कानून द्वारा आवश्यक मुआवजे के वितरण को केवल उन लोगों के लिए सीमित करने की कोशिश की है, जिनके लिए विशेष रूप से अदालतों द्वारा चेताया गया, न कि उन सभी के लिए जो हकदार हैं। अदालत ने यह भी कहा कि राज्य कोई भी सबूत पेश करने में असमर्थ था जो यह दर्शाता हो कि अपीलकर्ताओं की भूमि को कानून के अनुसार लिया गया था या अधिग्रहित किया गया था, या कि उन्होंने कभी कोई मुआवजा दिया था।

    पीठ ने कहा,

    "राज्य ऐसी स्थिति में देरी और लापरवाही के आधार पर खुद को ढाल नहीं सकता है; न्याय करने के लिए 'सीमा' नहीं हो सकती है ... स्वेच्छा से अपनी जमीन छोड़ने के लिए लिखित सहमति के अभाव में, अपीलकर्ता कानून के संदर्भ में मुआवजे के हकदार थे।"

    इसलिए अदालत ने निम्नलिखित टिप्पणियां और निर्देश देकर अपीलों का निपटारा किया:

    यह निष्कर्ष देते हुए कि कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना सहमति के किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति पर जबरन कब्जा करना, उसके मानवाधिकार और अनुच्छेद 300-ए के तहत संवैधानिक अधिकार दोनों का उल्लंघन है, इस अदालत ने अपील की अनुमति दी। हम पाते हैं कि विद्या देवी (सुप्रा) में इस अदालत द्वारा लिया गया दृष्टिकोण वर्तमान मामले में हमारे सामने लगभग समान तथ्यों पर लागू होता है।

    उपरोक्त चर्चा को ध्यान में रखते हुए, संविधान के अनुच्छेद 136 और 142 के तहत इस अदालत के असाधारण अधिकार क्षेत्र को देखते हुए, राज्य को एतद्द्वारा निर्देश दिया जाता है कि वह विषय भूमि को एक अधिग्रहण के रूप में मानें और अपीलकर्ताओं को उचित रूप से मुआवजे का भुगतान उसी शर्तों के अनुसार करें जैसे कि भूमि संदर्भ में 2004 की याचिका संख्या 10-एलएसी/4 (और समेकित मामले) में न्यायालय दिनांक 04.10.2005 का आदेश है।

    प्रतिवादी-राज्य को फलस्वरूप यह सुनिश्चित करने के लिए निर्देशित किया जाता है कि उपयुक्त भूमि अधिग्रहण कलेक्टर मुआवजे की गणना करे और इसे अपीलकर्ताओं को आज से चार महीने के भीतर वितरित करे। अपीलकर्ता 16.10.2001 (अर्थात अधिनियम की धारा 4 के तहत अधिसूचना जारी करने की तिथि) से प्रभावी निर्णय की तिथि तक, अर्थात 12.09. 2013 तक कानून के तहत देय सभी राशियों पर छूट के परिणामी लाभों और ब्याज के भी हकदार होंगे।

    मामले का विवरण

    सुख दत्त रात्रा बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य | 2022 लाइव लॉ (SC) 347 | 6 अप्रैल 2022

    पीठ: जस्टिस एस रवींद्र भट और जस्टिस पीएस नरसिम्हा

    वकील: अपीलकर्ता के लिए अधिवक्ता महेश ठाकुर, प्रतिवादी -राज्य के लिए अधिवक्ता अभिनव मुखर्जी

    हेडनोट्सः भारत का संविधान, 1950; अनुच्छेद 300ए - कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी की निजी संपत्ति पर जबरन कब्जा करना, उसके मानवाधिकार और अनुच्छेद 300-ए के तहत संवैधानिक अधिकार दोनों का उल्लंघन था - किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से बेदखल करने के लिए वैधता की उच्च सीमा को पूरा किया जाना चाहिए और इससे भी अधिक जब ये राज्य द्वारा किया जाता है। (पैरा 25,15)

    कानून का शासन - उचित प्रक्रिया या कानून के प्राधिकरण के बिना किसी को भी स्वतंत्रता या संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता है - उदारता की व्यापक बैंडविड्थ का आनंद लेने के बजाय, राज्य की अक्सर यह प्रदर्शित करने की उच्च जिम्मेदारी होती है कि उसने वैधता की सीमाओं के भीतर काम किया है, और इसलिए, कानून के शासन के मूल सिद्धांत को कलंकित नहीं किया। (पैरा 14)

    भूमि अधिग्रहण - भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही के मामलों में लिखित सहमति की आवश्यकता - 'मौखिक' सहमति के निराधार होने का तर्क [विद्या देवी बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य (2020) 2 SCC 569] (पैरा 22-23)

    सारांश - हिमाचल प्रदेश एचसी के फैसले के खिलाफ अपील जिसमें बेदखली को चुनौती देने वाली एक रिट याचिका का निपटारा किया और मुआवजे की मांग की - अनुमति दी गई- स्वेच्छा से अपनी जमीन छोड़ने के लिए लिखित सहमति के अभाव में, अपीलकर्ता कानून के अनुसार मुआवजे के हकदार थे - राज्य को विषय भूमि को एक मान्य अधिग्रहण के रूप में मानने का निर्देश दिया और अपीलकर्ताओं को उचित रूप से मुआवजे का वितरण करने को कहा।

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