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ECI ने कहा, हेट स्पीच और धर्म- जाति के आधार पर वोट मांगने वाले दलों के खिलाफ कार्रवाई की शक्ति नहीं : SC परीक्षण को तैयार

Live Law Hindi
15 April 2019 11:29 AM GMT
ECI ने कहा, हेट स्पीच और धर्म- जाति के आधार पर वोट मांगने वाले दलों के खिलाफ कार्रवाई की शक्ति नहीं : SC परीक्षण को तैयार
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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को चुनाव अभियान में हेट स्पीच और धर्म-जाति को लाने वाले राजनीतिक दलों के खिलाफ कार्रवाई करने की चुनाव आयोग की शक्ति का परीक्षण करने पर सहमति व्यक्त की है।

आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन से जुड़ा है मामला
बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा धर्म के आधार पर वोट की अपील के मुद्दे पर मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की पीठ ने आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन से निपटने के लिए अपनाई गई कार्रवाई के बारे में आयोग से सवाल- जवाब किया। इस दौरान मुख्य न्यायाधीश ने पूछा कि ऐसी बयानबाजी से निपटने के लिए चुनाव आयोग ने अबतक क्या कदम उठाए हैं।

चुनाव आयोग का जवाब
"इस संबंध में आयोग की शक्ति बहुत सीमित है ... हम नोटिस जारी कर सकते हैं और जवाब मांग सकते हैं लेकिन हम किसी पार्टी की मान्यता रद्द नहीं कर सकते या उम्मीदवार को अयोग्य घोषित नहीं सकते ... मायावती को 12 अप्रैल तक अपना स्पष्टीकरण दाखिल करना था लेकिन यह नहीं किया गया है... हम केवल एडवाइजरी जारी कर सकते हैं और बार- बार अपराध करने के मामले की शिकायत दर्ज कर सकते हैं, " चुनाव आयोग की ओर से पीठ को बताया गया।

जब मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े से पूछा कि वोटों के लिए सांप्रदायिक बयानों पर चुनाव आयोग वास्तव में क्या कर सकता है तो हेगड़े ने अदालत से कहा कि अनुच्छेद 324 के तहत आयोग की शक्तियां काफी व्यापक हैं।

आयोग के एक वरिष्ठ प्रतिनिधि को उपस्थित रहने का निर्देश
इसके बाद पीठ ने आयोग के एक वरिष्ठ प्रतिनिधि को मंगलवार को अदालत में उपस्थित रहने का निर्देश दिया ताकि आयोग की शक्तियों का परीक्षण करने में सहायता की जा सके।

क्या है यह पूरा मामला ?
दरअसल 8 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट उस याचिका का परीक्षण करने के लिए सहमत हो गया था जिसमें उन राजनीतिक दलों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की मांग की गई है जो राजनीतिक अभियानों में धर्म और जाति को घसीटते हैं। याचिका में राजनीतिक दलों के प्रवक्ताओं को भी जनप्रतिनिधि अधिनियम और चुनावी आचार संहिता के दायरे में लाने का अनुरोध किया गया है।

इस याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस संजीव खन्ना की पीठ ने इस याचिका पर चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर उनकी ओर जवाब मांगा था।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता NRI हरप्रीत मनसुखानी की ओर से पेश वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े ने पीठ के समक्ष कहा था कि यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना चाहिए। तब पीठ ने कहा कि चुनाव आयोग इस मामले में अपना रुख कोर्ट में बताए।

याचिका में क्या-क्या कहा गया है ?
याचिका के मुताबिक जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 123 में भ्रष्टाचार मुक्त चुनाव सुनिश्चित करने की पर्याप्त क्षमता नहीं है। राजनीतिक दलों के प्रवक्ता/मीडिया प्रतिनिधि/अन्य राजनेता जो चुनाव नहीं लड़ रहे हैं, वे टीवी चैनलों और सोशल मीडिया मंच पर जाति या धर्म के आधार पर घृणास्पद भाषणों का उपयोग करते हैं और वे इन सभी कार्यों से आसानी से बच निकलते हैं।

"चुनाव की शुद्धता के लिए भारतीय संविधान के तहत वादा किये गए धर्मनिर्रपेक्ष लोकतंत्र की अवधारणा एक लोकतंत्र को सफल बनाने के लिए अनिवार्य है। यह चुनाव और अन्य विधायी निकायों को अस्वस्थ भ्रष्ट प्रथाओं से मुक्त रखने के लिए आवश्यक है। धर्म, जाति, समुदाय या भाषा पर अपील का प्रभाव किसी देश और उसके संविधान पर विनाशकारी प्रभाव डाल सकता है। जाति और धर्म के बुरे प्रभावों के माध्यम से भारत में चुनाव 'फूट डालो और राज करो' नीति के बुरे प्रभाव में बदल रहे हैं। राजनीति सांप्रदायिकता का कारण बन गया है, जो देश के भीतर और बाहर के बलों से लोगों की सुरक्षा के लिए एक प्रमुख चिंता का विषय है। सांप्रदायिकता और जाति आधारित राजनीति ने सभी बाधाओं को पार कर लिया है, जिसके परिणामस्वरूप एक अज्ञात खतरनाक स्थिति पैदा हो सकती है", याचिका में कहा गया है।

याचिकाकर्ता ने मीडिया हाउसों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का भी आग्रह किया है जो अपनी बहस के शो के लिए जाति या धार्मिक लाइनों का उपयोग करते हैं। याचिका में कहा गया है कि सांप्रदायिक भाषण या जातिगत टिप्पणी को अगर चुनाव प्रचार में किसी भी तरह की छूट दी जाएगी तो लोकतांत्रिक जीवन के धर्मनिरपेक्ष माहौल को खतरा होगा।

इसके अलावा राजनीतिक पार्टियों के प्रवक्ताओं के बयान चुनाव और जनमत को सबसे ज़्यादा प्रभावित करते हैं, लेकिन वो न तो जनप्रतिनिधि अधिनियम के तहत जवाबदेह हैं और ना ही चुनाव आचार संहिता के तहत। इसका मतलब ये है कि वो पार्टियों के लिए कोई भी बयान दे सकते हैं।

याचिका में आगे मांग की गई है कि, ऐसी स्थिति में सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत जज की अध्यक्षता में समिति बननी चाहिए जो इस संबंध में विस्तृत गाइडलाइन तैयार करें और पीठ चुनाव आयोग को पार्टियों के प्रवक्ताओं को भी जनप्रतिनिधि अधिनियम और आचार संहिता के अंतर्गत लाने के निर्देश जारी करे।

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