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अगर वाहन मालिक ड्राइविंग कौशल से संतुष्ट है तो उससे ड्राइवर के लाइसेंस की असलियत सत्यापित करने की उम्मीद नहीं की जा सकती : सुप्रीम कोर्ट

LiveLaw News Network
31 July 2022 9:45 AM GMT
सुप्रीम कोर्ट, दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी वाहन के मालिक से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह अपने ड्राइवर के ड्राइविंग लाइसेंस की असलियत को सत्यापित करेगा जबकि वह अपने ड्राइविंग कौशल से संतुष्ट है।

जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ ने कहा कि वाहन के मालिक से ड्राइविंग कौशल को सत्यापित करने की उम्मीद होती है ना कि ड्राइवर को नियुक्त करने से पहले ड्राइविंग लाइसेंस की असलियत को सत्यापित करने के लिए लाइसेंसिंग प्राधिकरण के पास जाने की की। इस मामले में एक ट्रक का एक्सीडेंट हो गया।

मोटर दुर्घटना दावा मामले में, ट्रक के मालिक ने बयान दिया कि ड्राइवर को नियुक्त करने से पहले, उसने उसका ड्राइविंग टेस्ट लिया था और वह वाहन को संतोषजनक ढंग से चला रहा था। उन्होंने यह भी कहा कि दुर्घटना की तारीख से 3 साल पहले ड्राइवर उनके साथ कार्यरत था।

उन्होंने आगे कहा कि ड्राइवर के पास नागालैंड का ड्राइविंग लाइसेंस था लेकिन वह पेश नहीं किया गया था। यह पता लगाने के बाद कि ड्राइवर का लाइसेंस नकली था, मोटर दुर्घटना दावा ट्रिब्युनल ने बीमा कंपनी को अद्यतन ब्याज के साथ मालिक से प्रदान की गई राशि की वसूली के लिए स्वतंत्रता प्रदान करते हुए एक अवार्ड पारित किया। दिल्ली हाईकोर्टने मालिक द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष, मालिक ने तर्क दिया कि मालिक के पास उसके सामने पेश किए गए ड्राइविंग लाइसेंस की असलियत को सत्यापित करने का कोई साधन नहीं है। कि, उसने काम पर रखने से पहले ड्राइवर का परीक्षण किया था, उसने रोजगार से पहले पर्याप्त सावधानी बरती है।

इस तर्क को ध्यान में रखते हुए, पीठ ने इस प्रकार कहा:

यदि मालिक ने कहा है कि ड्राइवर ने नागालैंड से ड्राइविंग लाइसेंस प्रस्तुत किया था, लेकिन ऐसा कोई लाइसेंस रिकॉर्ड में प्रस्तुत नहीं किया गया था, तो यह स्पष्ट रूप से मालिक की एक गलती है। हालांकि, इस तरह के पहलू का उपयोग बीमा कंपनी को मालिक से राशि वसूल करने के लिए स्वतंत्रता प्रदान करने के लिए नहीं किया जा सकता है, जब दावेदार द्वारा वास्तव में खुद ऊना, हिमाचल प्रदेश से जारी ड्राइविंग लाइसेंस पेश किया गया था। यह कहा जा सकता है कि एक चीज में झूठ, सभी चीजों में झूठ, भारत में लागू सिद्धांत नहीं है। इसलिए, भले ही बयान का एक हिस्सा कि चालक ने नागालैंड से लाइसेंस प्रस्तुत किया है, सही नहीं है, यह पूरी तरह से अप्रासंगिक है।

पहले के फैसलों का हवाला देते हुए पीठ ने अपील की अनुमति दी और कहा:

"वाहन के मालिक से यह अपेक्षा की जाती है कि वह ड्राइवर को नियुक्त करने से पहले उसके ड्राइविंग कौशल को सत्यापित करे ना कि ड्राइविंग लाइसेंस की असलियत को सत्यापित करने के लिए लाइसेंसिंग प्राधिकरण के पास जाए। इसलिए, एक बार जब मालिक संतुष्ट हो जाता है कि ड्राइवर वाहन चलाने के लिए सक्षम है, इसके बाद मालिक से यह उम्मीद नहीं की जाती है कि वह ड्राइवर को जारी किए गए ड्राइविंग लाइसेंस की असलियत को सत्यापित करेगा।"

पहले के फैसले

यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम लेहरू और अन्य (2003) 3 SCC 338 में, दो न्यायाधीशों की पीठ ने निम्नलिखित टिप्पणियां की थीं:

"जब कोई मालिक ड्राइवर को काम पर रखता है तो उसे यह जांचना होगा कि क्या ड्राइवर के पास ड्राइविंग लाइसेंस है। अगर ड्राइवर ड्राइविंग लाइसेंस देता है जो देखने में असली लगता है, तो मालिक से यह पता लगाने की उम्मीद नहीं है कि लाइसेंस वास्तव में एक सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी किया गया है या नहीं।

मालिक तब ड्राइवर का टेस्ट लेगा। अगर उसे पता चलता है कि ड्राइवर वाहन चलाने के लिए सक्षम है, तो वह ड्राइवर को काम पर रखेगा। हमें यह अजीब लगता है कि बीमा कंपनियां उम्मीद करती हैं कि मालिक आरटीओ के साथ जांच करें, कि क्या उन्हें दिखाया गया ड्राइविंग लाइसेंस वैध है या नहीं, जो पूरे देश में फैले हुए हैं।

इस प्रकार जहां मालिक ने खुद को संतुष्ट कर लिया है कि ड्राइवर के पास लाइसेंस है और वह सक्षम रूप से गाड़ी चला रहा है, वहां धारा 149(2)(a)(ii) का कोई उल्लंघन नहीं होगा। तब बीमा कंपनी दायित्व से मुक्त नहीं होगी। यदि यह अंततः पता चलता है कि लाइसेंस नकली था, तो बीमा कंपनी तब तक उत्तरदायी बनी रहेगी जब तक कि वे यह साबित नहीं कर देते कि मालिक/बीमाधारक को पता था या उसने देखा था कि लाइसेंस नकली था और फिर भी उस व्यक्ति को गाड़ी चलाने की अनुमति दी।

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसे मामले में भी बीमा कंपनी तीसरे निर्दोष पक्ष के प्रति उत्तरदायी रहेगी, लेकिन वह बीमाधारक से वसूलने में सक्षम हो सकती है।"

बाद में नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम स्वर्ण सिंह और अन्य (2004) 3 SCC 297 में तीन न्यायाधीशों की बेंच ने स्पष्ट किया कि लेहरू मामले में इन टिप्पणियों का मतलब यह नहीं पढ़ा जाना चाहिए कि वाहन के मालिक के पास किसी भी परिस्थिति में इस संबंध में कोई जांच करने के लिए कोई कर्तव्य नहीं हो सकता है।

यह कहा गया,

"हम यह बताना चाह सकते हैं कि इस आशय का बचाव कि वाहन चलाने वाले व्यक्ति द्वारा रखा गया लाइसेंस नकली था, बीमा कंपनियों के लिए उपलब्ध होगा, लेकिन क्या इसके बावजूद, मालिक की ओर से डिफ़ॉल्ट की दलील स्थापित की गई है या नहीं, यह एक सवाल होगा जिसे प्रत्येक मामले में निर्धारित करना होगा।"

यह मत पप्पू और अन्य बनाम विनोद कुमार लांबा और अन्य (2018) 3 SCC 208 में दोहराया गया था।

मामले का विवरण

ऋषि पाल सिंह बनाम न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड | 2022 लाइव लॉ (SC) 646 | सीए 4919/ 2022 | 26 जुलाई 2022 |

पीठ : जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस विक्रम नाथ

हेडनोट्स

मोटर दुर्घटना के दावे - वाहन के मालिक से यह अपेक्षा की जाती है कि वह ड्राइवर को नियुक्त करने से पहले उसके ड्राइविंग कौशल को सत्यापित करे ना कि ड्राइविंग लाइसेंस की असलियत को सत्यापित करने के लिए लाइसेंसिंग प्राधिकरण के पास जाए। इसलिए, एक बार जब मालिक संतुष्ट हो जाता है कि ड्राइवर वाहन चलाने के लिए सक्षम है, इसके बाद मालिक से यह उम्मीद नहीं की जाती है कि वह ड्राइवर को जारी किए गए ड्राइविंग लाइसेंस की वास्तविकता को सत्यापित करेगा।

कानूनी कहावत - एक चीज में झूठ, सभी चीजों में झूठ का सिद्धांत भारत में लागू नहीं है ( पैरा -6)

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