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लोगों को कानून और व्यवस्था के मुद्दों को भड़काने ना दें' : सुप्रीम कोर्ट ने निजामुद्दीन तब्लीगी जमात की बैठक के सांप्रदायिकरण को लेकर याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा

LiveLaw News Network
27 May 2020 11:15 AM GMT
लोगों को कानून और व्यवस्था के मुद्दों को भड़काने ना दें : सुप्रीम कोर्ट ने निजामुद्दीन तब्लीगी जमात की बैठक के सांप्रदायिकरण को लेकर याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा
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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को दिल्ली के निजामुद्दीन में तब्लीगी जमात की बैठक के सांप्रदायिकरण के लिए मीडिया के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग करने वाली याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा है।

मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे, जस्टिस ए एस बोपन्ना और जस्टिस हृषिकेश रॉय की पीठ ने याचिकाकर्ताओं को न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) के साथ-साथ अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज को जवाब देने के लिए निर्देश दिया कि इस बारे में स्पष्टीकरण देने दें कि केबल टीवी नेटवर्क नेटवर्क (विनियमन) अधिनियम, 1995 की धारा 19 और 20 के तहत सरकार ने कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई।

सीजेआई एस ए बोबडे ने कहा कि लोगोें को कानून और व्यवस्था के मुद्दों को भड़काने ना दें, ये चीजें बाद में कानून और व्यवस्था के मुद्दे बन जाते हैं।

दरअसल शीर्ष अदालत ने एक साथ सामान्य प्रार्थना वाली तीन याचिकाओं पर सुनवाई की। जमीयत-उलेमा-ए-हिंद के लिए वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे पेश हुए, जबकि वकील अदील अहमद डीजे माली फेडरेशन ऑफ मस्जिद मदारिस एंड वक्फ इंस्टीट्यूट की ओर से पेश हुए।

इस दौरान वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने तर्क दिया कि" नकली समाचार राष्ट्र के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को नुकसान पहुंचाते हैं" और सुप्रीम कोर्ट से तत्काल कार्रवाई करने का आग्रह किया।

दवे ने मीडिया द्वारा कथित सांप्रदायिक रिपोर्टिंग के प्रति न्यायालय का ध्यान आकर्षित करने का भी प्रयास किया। उन्होंने जोर दिया कि इस तरह की रिपोर्टिंग कानून के गंभीर उल्लंघन में है और इसलिए तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता है क्योंकि पहले से ही पर्याप्त समय व्यतीत हो गया था।

दवे: "ये प्रसारण आदि कानून के तहत अपराध बनाते हैं। सरकार चुप क्यों है?"

सीजेआई: "हम सभी मामलों को गंभीरता से लेते हैं। बार-बार यह न कहें कि इन मामलों को गंभीरता से लें"

दरअसल इस्लामिक विद्वानों के संगठन, जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने दिल्ली के निज़ामुद्दीन में तब्लीगी जमात की बैठक के सांप्रदायिकरण करने के लिए मीडिया के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है।

दलीलों में कहा गया है कि मीडिया के कुछ वर्ग "सांप्रदायिक सुर्खियों" और " कट्टर बयानों" का इस्तेमाल कर रहे हैं ताकि पूरे देश में जानबूझकर कोरोना वायरस फैलाने के लिए पूरे मुस्लिम समुदाय को दोषी ठहराया जा सके, जिससे मुसलमानों के जीवन को खतरा है।

याचिका में कहा गया है कि

"वर्तमान याचिका प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया के कुछ वर्गों द्वारा COVID-19 महामारी के प्रकोप को सांप्रदायिक रंग दिए जाने के कारण आवश्यक है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मुसलमानों के मौलिक अधिकारों को प्रभावित करने वाले और उनके जीवन और स्वतंत्रता के लिए खतरा है।

ये सम्मान के साथ जीने के अधिकार का उल्लंघन है जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत भी शामिल है। "

यह बताया गया है कि इस तरह की रिपोर्टिंग ने "सांप्रदायिक दुश्मनी" को जन्म दिया है और ऐसे समय में घृणा फैल गई है जब COVID ​​-19 के खिलाफ लड़ने के लिए एकजुट प्रयासों की आवश्यकता है।

वकील एजाज मकबूल के माध्यम से दायर याचिका में जोर दिया गया है कि मीडिया को मुस्लिम समुदाय के लिए पूर्वाग्रही तथ्य तोड़ मरोड़कर पेश करने की अनुमति देकर सरकार, विशेष रूप से सूचना और प्रसारण मंत्रालय, संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत भारत में सभी व्यक्तियों को कानून की समान सुरक्षा देने के अपने कर्तव्य में विफल रही है।

यह तर्क दिया गया है कि मीडिया ने मुसलमानों को निशाना बनाने के ऐसी रणनीति का सहारा लेकर पत्रकारिता के आचरण के सभी मानदंडों का उल्लंघन किया है।

इसके अलावा, इस तरह की रिपोर्टिंग केबल टेलीविजन नेटवर्क नियम, 1994 के नियम 6 के स्पष्ट उल्लंघन में है, जो किसी भी कार्यक्रम को प्रतिबंधित करता है जिसमें धर्म या समुदायों पर हमला या धार्मिक समूहों के प्रति अवमानना ​​या शब्द हैं या जो सांप्रदायिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देते हैं।

याचिका में कहा गया है कि

"मीडिया के कुछ वर्गों के कार्य न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन द्वारा जारी किए गए आचार संहिता और प्रसारण मानकों की पत्र और भावना के खिलाफ भी हैं, जो समाचार चैनल के लिए नियामक संस्था है। संहिता के तहत, रिपोर्टिंग में तटस्थता और निष्पक्षता सुनिश्चित करना मीडिया विनियमन के सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांतों में से एक है।"

इस प्रकार यह आग्रह किया गया है कि मीडिया को सावधानी के साथ चलने के लिए निर्देशित किया जाए, निजामुद्दीन मरकज की घटना को किसी भी सांप्रदायिक कोण देने के खिलाफ चेतावनी दी जाए और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।

याचिका में आरोप लगाया गया कि सोशल मीडिया भी गलत सूचना और फर्जी खबरों से भरा हुआ है, जिसका उद्देश्य पूरी कोरोना वायरस की घटना को सांप्रदायिक आवाज देना और तब्लीगी जमात के बारे में "साजिश के सिद्धांतों" को देश भर में जानबूझकर फैलाना है।

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