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कसूरवार के खिलाफ साक्ष्य में विसंगतियां अनुशासनात्मक जांच के निष्कर्षों में हस्तक्षेप का आधार नहीं : सुप्रीम कोर्ट

LiveLaw News Network
19 Feb 2020 10:15 AM GMT
कसूरवार के खिलाफ साक्ष्य में विसंगतियां अनुशासनात्मक जांच के निष्कर्षों में हस्तक्षेप का आधार नहीं : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अनुशासनात्मक जांच के निष्कर्षों में केवल इस आधार पर हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता कि कसूरवार के खिलाफ सबूतों में विसंगतियां हैं।

न्यायमूर्ति एस. अब्दुल नज़ीर और न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता की खंडपीठ ने कहा है कि एक बारगी विभागीय अधिकारी द्वारा साक्ष्य स्वीकार कर लेने के बाद न्यायिक समीक्षा के अपने अधिकार का इस्तेमाल करते वक्त ट्रिब्यूनल या हाईकोर्ट साक्ष्य के पुनर्मूल्यांकन के माध्यम से प्राप्त निष्कर्षों के साथ हस्तक्षेप नहीं कर सकता।

इस मामले में, एक पुलिस निरीक्षक को उसके खिलाफ कदाचार के आरोपों की विभागीय जांच के बाद सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। पहले न्यायाधिकरण और बाद में हाईकोर्ट ने इस आधार पर सजा के आदेश को निरस्त कर दिया था कि आपराधिक मुकदमे में उसके खिलाफ सबूत स्वीकार नहीं किए गए और गवाहों के साक्ष्य में विसंगतियां हैं, जो इसे अविश्वसनीय बनाता है।

पीठ ने सरकार की ओर से दायर अपील पर विचार करते हुए कहा कि संवैधानिक अदालत या ट्रिब्यूनल को दी गई न्यायिक समीक्षा की शक्ति एक अपीलीय प्राधिकारी की नहीं है। इसने कहा कि ट्रिब्यूनल/कोर्ट साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकते हैं और सबूतों को लेकर अपने स्वतंत्र निष्कर्ष नहीं दे सकते।

'भारत सरकार बनाम पी. गुणशेखरन' के मामले में दिये गये फैसले का उल्लेख करते हुए बेंच ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226/227 के तहत हाईकोर्ट - (i) साक्ष्य का पुनर्मूल्यांकन नहीं करेगा, (ii) जांच के निष्कर्ष में हस्तक्षेप नहीं करेगा, (iii) साक्ष्य की पर्याप्तता में नहीं जायेगा, (iv) साक्ष्य की विश्वसनीयता में नहीं जायेगा, (v) उन चीजों में हस्तक्षेप नहीं करेगा, यदि कोई कानूनी साक्ष्य हो, जिसपर निष्कर्ष आधारित हों, (vi) तथ्यों की गड़बड़ी को ठीक नहीं कर सकता, भले ही यह कितनी भी गम्भीर क्यों न हो? (vii) सजा की आनुपातिकता में नहीं जा सकता जब तक कि यह उसकी अंतररात्मा को झकझोरता नहीं।

प्रतिवादी ने 'इलाहाबाद बैंक बनाम कृष्ण नारायण तिवारी' मामले में दिये गये फैसले पर भरोसा जताया, जिसमें कहा गया था कि यदि अनुशासनात्मक अधिकारी एक निष्कर्ष देता है, जिसके समर्थन में कोई साक्ष्य न हो, या वैसा निष्कर्ष जो अतार्किक हो तो रिट कोर्ट अनुशासनात्मक कार्रवाई के परिणाम में हस्तक्षेप कर सकता है।

बेंच ने कहा,

" हमें यह नहीं लगता कि ट्रिब्यूनल या हाईकोर्ट जांच की कसौटी पर भी अनुशासनात्मक प्राधिकरण द्वारा दिये गये निष्कर्षों में हस्तक्षेप कर सकते हैँ। यह ऐसा मसला नहीं है जिसमें साक्ष्य नहीं है या निष्कर्ष प्रतिकूल है। प्रतिवादी के कदाचार के दोषी होने के निष्कर्ष में केवल इस आधार पर हस्तक्षेप किया गया कि विभाग के साक्ष्य में विसंगतियां हैं। साक्ष्य में विसंगतियां इसे साक्ष्य न होने का मामला नहीं बनायेंगी। जांच अधिकारी ने साक्ष्य का मूल्यांकन किया और यह निष्कर्ष दिया कि प्रतिवादी कदाचार का दोषी है।

अनुशासनात्मक प्राधिकारण ने जांच अधिकारी के निष्कर्षों से सहमति जतायी और सजा का आदेश पारित किया। राज्य सरकार के समक्ष दायर एक अपील भी खारिज कर दी गयी थी। एक बारगी विभागीय अधिकारी द्वारा साक्ष्य मंजूर कर लिये जाने के बाद ट्रिब्यूनल या हाईकोर्ट न्यायिक समीक्षा के अपने अधिकार के तहत साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन के बाद दर्ज तथ्यों के निष्कर्षों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता, जैसा कि कोर्ट अपीलीय प्राधिकरण हैं।"

केस का नाम : कर्नाटक सरकार बनाम एन गंगाराज

केस नं. सिविल अपील नं. 8071/2014

कोरम : न्यायमूर्ति एस. अब्दुल नज़ीर और न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता


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