हिमाचल हाईकोर्ट ने कहा, वेतन से वं‌चित करना अनुचित, ऐसे मामलों को 'पर‌िसीमन-वर्जित' नहीं ‌किया जा सकता

हिमाचल हाईकोर्ट ने कहा, वेतन से वं‌चित करना अनुचित, ऐसे मामलों को

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने यह देखते हुए कि वेतन, भत्ते आदि के भुगतान से संबंधित मुद्दों को, उनके आवर्ती स्वभाव के कारण, परिसीमन नहीं किया जा सकता है, राज्य सरकार को निर्देश दिया कि 7 अगस्त 1997 से अनुबंध के आधार अपनी सेवाएं दे चुके जूनियर बेसिक शिक्षकों की सेवाओं की गणना करे, ताकि उन्हें सीसीएस (पेंशन) रूल्स, 1972 के तहत पेंशन, वार्षिक वेतन वृद्धि, वरिष्ठता, पदोन्नति और अन्य लाभ दिए जा सकें।

चीफ जस्टिस एल नारायण स्वामी और जस्टिस ज्योत्सना रेवाल दुआ की पीठ ने एक साथ कई याचिकाओं निपटारा करते हुए कहा, "जहां मुद्दा वेतन या किसी भत्ते के भुगतान या निर्धारण से संबंधित है तो चुनौती पर परिसीमन या अति विलंब (डॉक्ट्र‌िन ऑफ लैचिज़) के आधार पर रोक नहीं लगाई जा सकती है, क्योंकि हर महीने जब वेतन का भुगतान का किया जाता है, एक गलती के निरंतरता के आधार पर , अध्यापकों को लाभ से वंचित किया जाता है, जिससे एक नई कार्रवाई की वजह पैदा होती है।"

मामले में मध्य प्रदेश व अन्य बनाम योगेंद्र श्रीवास्तव, 2010 (12) एससीसी 538 पर भरोसा किया गया।

कोर्ट ने अपने आदेश में जून‌ियर बेस‌िक अध्यापकों के साथ विद्या उपासकों के बराबर व्यवहार करने को कहा, जिनकी सेवाओं को यद्यप‌ि 2007 में नियमित किया गया था, लेकिन जिन्हें जोगा सिंह व अन्य बनाम एचपी राज्य व अन्य, सीडब्ल्यूपी नंबर 8953/2013 के अनुसार, सीसीएस (पेंशन) रूल्स 1972, वार्षिक वेतन वृद्धि, वरिष्ठता, पदोन्नति आदि के लिए उनकी प्रारंभिक तारीखों से गिना गया था।

पृष्ठभूमि

हाईकोर्ट ने उपासकों को पूर्वोक्त लाभ वर्ष 2015 में दिया था। ‌हालांकि इसके बाद, उक्त आदेश के खिलाफ दायर एसएलपी और समीक्षा याचिका को खारिज कर दिया गया, इस प्रकार हाईकोर्ट के आदेश को अंतिम रूप दिया गया।

उपासकों के समान स्थिति होने का दावा करते हुए, याचिकाकर्ता जेबीटी अध्यापकों ने हाईकोर्ट का दरवजा खटखटाया और जोगा सिंह के फैसले में दिए गए लाभ को उन्हें भी देने की मांग की।

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि उनकी सेवाओं को 2006 में नियमित कर दिया गया था, जबकि उपासकों को बाद में नियमित किया गया, और इस तरह जोगा सिंह के फैसले का लाभ उन्हें न ‌दिए जाने से वास्तव में उन्हें उपासकों, जो कि वास्तव में उनसे जून‌ियर हैं, के समक्ष जूनियर बना दिया गया था।

राज्य की दलील

राज्य ने यह कहते हुए याचिका का विरोध किया कि यह प्रशासनिक न्यायाधिकरण अधिनियम की धारा 21 के तहत पर‌िसीमन-वर्जित है। मामले में, यह बताने कि लिए, यूनियन ऑफ इंडिया बनाम सी गिरिजा व अन्य (2019) 3 SCALE 527, पर भरोसा किया गया था, कि याचिकाकर्ताओं को मुद्दे से कोई संबंध नहीं है, इसलिए उन्हें जोगा सिंह के मामले में फैसले का लाभ लेने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

राज्य ने यह भी दलील दी थी कि जोगा सिंह का मामला कानूनन गलत है और राज्य को उसे खत्म कर देना चाहिए। भारत संघ बनाम डॉ ओपी निझावन के मामले पर भरोसा किया गया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि

जहां भी राज्य इस तथ्य के कारण किसी फैसले को चुनौती नहीं देता कि उसके वित्तीय नतीजे नगण्य हैं या जहां अपील समयबद्घ है या है गलत कानूनी सलाह का नतीजा है, वहां ऐसी ही मामले में, राज्य को बाद के फैसले को चुनौती देने से रोक नहीं जा सकता, जबकि फैसले का वित्तीय प्रभाव बहुत ज्यादा है।

पंजाब राज्य बनाम दविंदर पाल सिंह भुल्ला (2011) 14 SCC 770 के मामले पर, ये दावा करने के लिए भरोसा किया गया, कि शुरुआत में ही SLP को रद्द किए जाने का मतलब यह है कि मामले को सुप्रीम कोर्ट ने किन्हीं कारणों से सुनवाई योग्य नहीं माना, जो कि हो सकता है मामले की खूबियों से इतर हो। बिना विस्तृत कारण बताए शुरुआत में ही मामले को रद्द किया जाना संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत कानून की गई कोई घोषणा या बाध्यकारी मिसाल नहीं है।

जांच के नतीजे

जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, कोर्ट ने राज्य की दलीलों को खारिज कर दिया कि याचिका परिसीमन-वर्जित है।

कोर्ट ने कहा, "वस्तुतः एसएलपी को रद्द किए जाने बाद याच‌िकाकर्ताओं के पक्ष में कार्रवाई का कारण पैदा हुआ, क्योंकि उनके जूनियर (मूल रूप से विद्या उपासकों को) को CCS (पेंशन) रूल्स, 1972 के तहत पेंशन लाभ और सालान वेतन वृद्घि के ‌‌लिए उनकी पिछली सेवाओं की गिनती का लाभ दिया गया था।

आगे जोगा सिंह के मामले में दिए गए फैसले के उलट, उच्च न्यायालय ने इसे बरकरार रखा। राज्य के इस तर्क से सहमत होते हुए कि स्पेशल लीव टू अपील से इनकार करने वाला आदेश विलय के सिद्धांत को आकर्षित नहीं करता है और बाध्यकारी कानून नहीं है, अदालत उस मामले में निर्धारित कानून को स्वीकार करने के लिए इच्छुक थी।"

कोर्ट ने पाया कि विद्या उपासक नियमित रूप से नियुक्त शिक्षकों के बराबर ही काम कर रहे थे; उन्हें एक चयन प्रक्रिया के तहत नियुक्त किया गया था; उनकी सेवाओं को विद्या उपासक के रूप में उनकी नियमितीकरण की तारीख तक बिना किसी रुकावट के जारी रखा गया था।

इसलिए हाईकोर्ट की राय थी कि फैसले में राज्य को ठीक ही निर्देश दिया गया है कि पेंशन लाभ के लिए उपासकों की सेवाओं की गिनती नियुक्ति की प्रारंभिक तिथियों से ‌की जाए।

मामले में केसर चंद बनाम पंजाब राज्य, एआईआर 1988 पीएंडएच 265 के फैसले पर भरोसा किया गया, जिसे पंजाब स्टेट बिजली बोर्ड बनाम नराटा सिंह (2010) 4 एससीसी 317 के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा था। कोर्ट ने ने कहा था कि वर्क चार्ज बेसिस पर वर्कमैन द्वारा दी गई सेवाओं को सेवाओं को पेंशन के लिए अर्हकारी सेवा के रूप में गिना जाए।

हाई कोर्ट ने जोगा सिंह मामले में दिए लाभ को जेबीटी अध्यापकों को भी देने का आदेश दिया। कोर्ट ने राज्य की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि जोगा सिंह के मामले में फैसले के लाभ का दावा करने के लिए, याचिकाकर्ता को 10 जुलाई 2006 के अपने नियमितीकरण आदेश को चुनौती देने की आवश्यकता थी।

मामले का विवरण:

केस टाइटल: जगदीश चंद बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य व अन्य।

केस नं: CWP No. 2411/2019

कोरम: चीफ जस्टिस एल नारायण स्वामी और जस्टिस ज्योत्सना रेवल दुआ

वकील: एडवोकेट जेएल भारद्वाज (याचिकाकर्ता के लिए); एडवोकेट जनरल अशोक शर्मा के साथ एडिशनल एडवोकेट जनरल रंजन शर्मा, रीता गोस्वामी, आदर्श शर्मा, अश्वनी शर्मा और नंद लाल ठाकुर (उत्तरदाताओं के लिए)

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