कानून किसी भूत को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकता: पहचान में संदेह के चलते दिल्ली हाइकोर्ट ने 23 साल बाद डकैती मामले में दोषी को बरी किया
Amir Ahmad
13 Feb 2026 12:00 PM IST

दिल्ली कोर्ट ने डकैती मामले में लगभग 23 वर्ष पहले ट्रायल कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए गए व्यक्ति को बरी किया है। हाइकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी की पहचान संदेह से परे स्थापित करने में विफल रहा और पहचान परेड (टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड) विश्वसनीय नहीं थी।
जस्टिस विमल कुमार यादव ने ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई दोषसिद्धि और सजा निरस्त करते हुए कहा कि आपराधिक कानून अनुमान या अनिश्चितता के आधार पर नहीं चल सकता। जब अपराधी की पहचान ही संदेह के घेरे में हो तब दायित्व तय नहीं किया जा सकता।
अदालत ने अपने निर्णय में कहा,
“आपराधिक कानून में जैसे समाज के अन्य क्षेत्रों में पहचान का अत्यंत महत्व है, क्योंकि दायित्व उसी आधार पर तय होता है। अपराध हुआ, देखा गया लेकिन उसके बाद क्या? जब तक अपराधी को कानून के दायरे में नहीं लाया जाएगा, कोई उद्देश्य पूरा नहीं होगा। यह कैसे संभव है, जब तक हमलावर की संलिप्तता के बारे में निश्चितता न हो। बिना पहचान के आपराधिक कानून का कोई उपयोग नहीं रह जाता। आप किसी भूत को अपराध के लिए जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते, और न ही किसी ऐसे व्यक्ति को जो जिम्मेदार नहीं है।”
मामला एक डकैती की घटना से संबंधित था जिसमें अपीलकर्ता पर अन्य आरोपियों के साथ शामिल होने का आरोप था। ट्रायल कोर्ट ने मुख्य रूप से शिकायतकर्ता और गवाहों द्वारा अदालत में की गई पहचान के आधार पर उसे दोषी ठहराया था।
बचाव पक्ष का लगातार यह तर्क था कि आरोपी गवाहों के लिए अपरिचित था और उसकी पहचान से जुड़ा साक्ष्य सुरक्षित और भरोसेमंद नहीं था।
हाइकोर्ट ने कहा कि जब आरोपी पहले से गवाहों के परिचित न हों तो विधिवत कराई गई पहचान परेड का विशेष महत्व होता है, क्योंकि इससे प्रारंभिक चरण में गवाहों की पहचान की सत्यता की जांच होती है।
हालांकि इस मामले में अदालत ने पाया कि पहचान परेड प्रभावित थी। अदालत ने कहा कि आरोपी को सही तरीके से मुंह ढककर नहीं रखा गया। इस बात पर गंभीर संदेह है कि परेड से पहले गवाहों को उसे देखने का अवसर मिला या नहीं।
अदालत ने टिप्पणी की,
“अपीलकर्ता को बिना मुंह ढके पेश किया गया। बाद में उसका चेहरा ढका गया लेकिन तब तक अभियोजन के मामले को नुकसान पहुंच चुका था।”
खंडपीठ ने अभियोजन द्वारा पेश बरामदगी साक्ष्य पर भी संदेह जताया और कहा कि पूरक बयानों को जिस तरीके से दर्ज किया गया, उससे यह आशंका उत्पन्न होती है कि जांच की कमियों को भरने के लिए उनका उपयोग किया गया।
इन परिस्थितियों में हाइकोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए अपीलकर्ता को बरी किया।

