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'विश्वसनीयता का संकट' वर्तमान में भारतीय न्यायपालिका के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती: न्यायमूर्ति अभय ओका

LiveLaw News Network
12 Oct 2021 9:15 AM GMT
विश्वसनीयता का संकट वर्तमान में भारतीय न्यायपालिका के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती: न्यायमूर्ति अभय ओका
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न्यायमूर्ति अभय एस ओका ने कहा है कि 'विश्वसनीयता का संकट' वर्तमान में न्यायपालिका के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है और कानूनी पेशे के सदस्यों को COVID-19 महामारी के कारण मामलों के बैकलॉग को दूर करने पर ध्यान देना चाहिए।

आपको बता दें न्यायमूर्ति अभय एस ओका को हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप नियुक्त किया गया है।

न्यायमूर्ति अभय एस ओका देश की शीर्ष अदालत के न्यायाधीश के रूप में उनकी नियुक्ति पर उन्हें सम्मानित करने के लिए यहां महाराष्ट्र में ठाणे जिला न्यायालय बार एसोसिएशन द्वारा सोमवार शाम आयोजित एक समारोह में बोल रहे थे।

इस अवसर पर, न्यायमूर्ति ओका ने कहा कि "विश्वसनीयता का संकट" न्यायपालिका के सामने चुनौती है और भले ही COVID-19 की तीसरी लहर हो, न्यायिक अधिकारियों और वकीलों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कानूनी कार्य निर्बाध रूप से चले और लोगों को न्याय मिले।

उन्होंने कहा कि कानूनी पेशे के सदस्यों को न्यायपालिका में देश के नागरिकों का विश्वास बहाल करने की दिशा में काम करना चाहिए।

न्यायमूर्ति अभय एस ओका ने कर्नाटक उच्च न्यायालय का उदाहरण दिया, जहां न्यायाधीशों ने मामलों के बैकलॉग को दूर करने के लिए महामारी के दौरान 11 शनिवार को काम करने का फैसला किया और कहा कि इस तरह के तरीके अन्य अदालतों में भी पाए जाने चाहिए।

यह देखते हुए कि देश में न्यायाधीश और जनसंख्या अनुपात वर्तमान में प्रति मिलियन लोगों पर 17 या 18 न्यायाधीश हैं, उन्होंने कहा कि अदालतों में न्यायाधीशों की कमी के मुद्दे को संबोधित करने की जरूरत है और इस अनुपात में सुधार की जरूरत है।

अपने भाषण में, न्यायमूर्ति ओका ने 1983 में ठाणे की एक अदालत में एक अधिवक्ता से सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश बनने तक की अपनी यात्रा को भी याद किया।

न्यायमूर्ति ओका ने 1983 में एक वकील के रूप में नामांकन किया और 2003 में उन्हें बॉम्बे उच्च न्यायालय के अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किया गया।

वह 2019 में कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बने।

इस साल अगस्त में न्यायमूर्ति अभय एस ओका को सुप्रीम कोर्ट में बतौर न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किया गया।

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