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पति का घर छोड़ने के बाद पत्नी जहां रहती है, उस स्थान की अदालत आईपीसी की धारा 498ए के तहत दायर शिकायत पर विचार कर सकती है : सुप्रीम कोर्ट

LiveLaw News Network
11 Jan 2020 11:30 AM GMT
पति का घर छोड़ने के बाद पत्नी जहां रहती है, उस स्थान की अदालत आईपीसी की धारा 498ए के तहत दायर शिकायत पर विचार कर सकती है : सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर दोहराया है कि पत्नी अपने पति का घर छोड़ने के बाद जिस जगह पर रहती है, उस स्थान के अधिकार क्षेत्र के न्यायालय को भारतीय दंड संहिता की धारा 498 ए के तहत दायर महिला की शिकायत पर विचार करने का अधिकार होगा।

न्यायमूर्ति एल. नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता की पीठ ने कहा कि रूपाली देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2019 (5) एससीसी 384), मामले में एक निर्णय जो पिछले साल दिया गया था, उसमें यह माना गया था कि यह आवश्यक नहीं है कि एक शिकायत केवल वैवाहिक घर के स्थान पर ही दायर की जानी चाहिए।

इस फैसले में कहा गया था कि पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा की गई क्रूरता के कृत्यों के कारण वैवाहिक घर से चले जाने के बाद या घर से निकाल दिए जाने के बाद पत्नी जिस स्थान पर शरण लेती है या रहती है, उस स्थान की अदालत को, तथ्यात्मक स्थिति पर निर्भर करता है, भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के तहत किए गए अपराध के लिए दायर शिकायत पर विचार करने का अधिकार क्षेत्र होगा।

यह था मामला

इस मामले में, पत्नी द्वारा दिल्ली में स्थित पुलिस स्टेशन में आईपीसी की धारा 498ए, 406 व 34 और दहेज निषेध अधिनियम, 1961 (Prohibition Act, 1961 ) की धारा 4 के तहत प्राथमिकी दर्ज करवाई गई थी। पति द्वारा दायर एक याचिका में, हाईकोर्ट ने कहा था कि एफआईआर के अनुसार घटना मेरठ की थी और पत्नी दिल्ली में पति के साथ नहीं रहती थी, इसलिए, हाईकोर्ट ने एफआईआर को यूपी स्थित मेरठ के पुलिस स्टेशन में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया था। तत्पश्चात, मेरठ पुलिस ने उस स्थान के न्यायालय में आरोप-पत्र दाखिल किया था।

शीर्ष अदालत के समक्ष , अपीलार्थी पत्नी ने रूपाली देवी के फैसले पर भरोसा जताया या हवाला दिया। रूपाली देवी में की गई टिप्पणियों को दोहराते हुए, पीठ ने कहा,

''इस मामले में उठाए गए तथ्य या बात कोई अधिक अलग नहीं है क्योंकि यह रूपाली देवी (सुप्रा) में इस न्यायालय के फैसले से आच्छादित है या उसके तहत आते हैं।''

यह भी आदेश दिया कि जो चार्जशीट मेरठ में दायर की गई है, उसे कड़कड़डूमा कोर्ट, दिल्ली की एक सक्षम अदालत को प्रेषित किया जाए।

रूपाली देवी मामले में अदालत ने यह भी कहा था कि

''भले ही वैवाहिक घर में की गई शारीरिक क्रूरता के कार्य बंद हो गए हों और माता-पिता के घर पर ऐसी हरकतें न हुई हो। इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता है कि जो मानसिक आघात और मनोवैज्ञानिक परेशानी पति के कृत्यों के कारण हुई है, जिसमें मौखिक आदान-प्रदान भी शामिल है, यदि कोई हो और जिसने पत्नी को वैवाहिक घर छोड़ने और अपने माता-पिता के साथ आश्रय लेने के लिए मजबूर किया हो, वो माता-पिता के घर पर भी बना रहेगा।

शारीरिक क्रूरता या गाली देने और अपमानजनक मौखिक आदान-प्रदान से पैदा हुई मानसिक क्रूरता माता-पिता के घर में जारी रहेगी, भले ही ऐसी जगह पर शारीरिक क्रूरता का कोई भी कार्य ने किया गया हो।''

केस का नाम- रुही बनाम अनीस अहमद

केस नंबर-सीआरआई.अपील यानि आपराधिक अपील 7/2020

कोरम- जस्टिस एल. नागेश्वर राव और जस्टिस हेमंत गुप्ता

अपीलकर्ता के लिए वकील - एडवोकेट एल्डिंस रीन

प्रतिवादी के लिए वकील- वरिष्ठ अधिवक्ता सोनिया माथुर


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