ट्रिब्यूनलीकरण से अव्यवस्था पैदा हुई, ट्रिब्यूनल बोझ बन गए: चीफ जस्टिस की कड़ी टिप्पणी
Amir Ahmad
26 Feb 2026 2:11 PM IST

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत ने देश में ट्रिब्यूनल की कार्यप्रणाली पर गंभीर असंतोष जताते हुए कहा कि ट्रिब्यूनलीकरण के नाम पर एक अव्यवस्था खड़ी कर दी गई और कई अधिकरण अब बोझ बन गए।
चीफ जस्टिस ने खुलासा किया कि उन्हें विश्वसनीय जानकारी मिली कि एक महत्वपूर्ण वित्तीय अधिकरण के तकनीकी सदस्य स्वयं निर्णय नहीं लिख रहे हैं बल्कि न्यायिक सदस्यों से अपने नाम से निर्णय लिखवाने का आग्रह कर रहे हैं। इतना ही नहीं कुछ मामलों में निर्णय लिखने का कार्य बाहर से कराया जा रहा है, जो न्यायिक व्यवस्था में अकल्पनीय है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ ट्रिब्यूनल सदस्यों के कार्यकाल विस्तार से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही थी। यह मुद्दा उस पृष्ठभूमि में उठा है, जब सुप्रीम कोर्ट ने पिछले वर्ष ट्रिब्यूनल सुधार अधिनियम 2021 को निरस्त कर दिया।
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने भारत के महान्यायवादी आर. वेंकटरमणी से कहा,
“ट्रिब्यूनल आपकी (केंद्र की) रचना हैं और अब वे आपके लिए सिरदर्द बन गए। वे आपके लिए सिरदर्द और हमारे लिए बोझ हैं। वे हमारे लिए इसलिए बोझ हैं, क्योंकि उनके आदेशों की प्रकृति, उनका कार्य करने का तरीका और उनके खिलाफ आने वाली चुनौतियां हमें झेलनी पड़ती हैं। विधायी व्यवस्था के कारण हमने एक ऐसा क्षेत्र बना दिया, जहां वे न तो न्यायपालिका के प्रति जवाबदेह हैं और न ही किसी और के प्रति।”
उन्होंने आगे कहा,
“एक महत्वपूर्ण ट्रिब्यूनल के तकनीकी सदस्य एक भी निर्णय नहीं लिख रहे हैं। वे न्यायिक सदस्यों से अपने नाम पर निर्णय लिखवाने पर जोर दे रहे हैं। एक तकनीकी सदस्य ने तो न्यायिक सदस्य से अपने नाम से फैसला लिखने को कहा। कुछ तकनीकी सदस्य निर्णय लिखने का काम बाहर से करवा रहे हैं। यह न्यायिक व्यवस्था में पूरी तरह अभूतपूर्व है। मैं अत्यंत चिंतित हूं। हमने ट्रिब्यूनल बनाने के नाम पर कैसी अव्यवस्था खड़ी कर दी है केवल इस चिंता में कि हाइकोर्ट अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग न करें।”
चीफ जस्टिस ने यह भी कहा कि ट्रिब्यूनलीकरण के कारण हाइकोर्ट के जजों को अब दिवाला कानून पर्यावरण कानून और वाणिज्यिक कानून जैसे महत्वपूर्ण विषयों में पर्याप्त अनुभव नहीं मिल पा रहा है।
पीठ ने यह संकेत दिया कि वह सभी मौजूदा सदस्यों को सामूहिक रूप से कार्यकाल विस्तार देने के पक्ष में नहीं थी किंतु रिक्त पदों को न भरे जाने की स्थिति में अंतरिम व्यवस्था के रूप में ऐसा करना पड़ रहा है।
गौरतलब है कि हाल ही में इलाहाबाद ऋण वसूली अपीलीय अधिकरण के अध्यक्ष का कार्यकाल बढ़ाते समय भी सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से ट्रिब्यूनल में नियुक्तियों की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने की ठोस योजना प्रस्तुत करने को कहा, विशेषकर मद्रास बार एसोसिएशन मामले में दिए गए निर्देशों के आलोक में।
सुनवाई में पीठ ने अंतरिम उपाय के रूप में विभिन्न अधिकरणों के वर्तमान अध्यक्षों और सदस्यों का कार्यकाल अगले आदेश तक बढ़ाने का निर्देश भी दिया।

