कानून की पढ़ाई 5 साल से घटाकर 4 साल करने की मांग , सुप्रीम कोर्ट ने कहा- हम अपने विचार नहीं थोप सकते
Amir Ahmad
16 March 2026 12:28 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने पांच वर्षीय एकीकृत एलएलबी कोर्स को चार वर्ष करने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि कानूनी शिक्षा से जुड़े मामलों में अदालत अपने विचार थोप नहीं सकती।
अदालत ने कहा कि ऐसे मुद्दों पर सभी संबंधित पक्षों के साथ व्यापक विचार-विमर्श जरूरी है।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
याचिका में कानूनी शिक्षा व्यवस्था की समीक्षा और सुधार के लिए प्रतिष्ठित विधि विशेषज्ञों की एक कानूनी शिक्षा आयोग गठित करने की मांग की गई, जो कानून पाठ्यक्रम की अवधि और पाठ्यक्रम को भी देखे।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने कहा कि देश में अधिकतर पेशेवर पाठ्यक्रम चार वर्ष के होते हैं जबकि कानून की पढ़ाई पांच वर्ष की है। उनके अनुसार इससे प्रतिभाशाली छात्र कानून की पढ़ाई की ओर आकर्षित नहीं हो पा रहे हैं।
इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि कानूनी शिक्षा से जुड़े निर्णय केवल अदालत द्वारा नहीं लिए जा सकते, क्योंकि इसमें कई पक्ष शामिल होते हैं।
उन्होंने कहा,
“न्यायपालिका केवल एक पक्ष है। शिक्षाविद, विधि विशेषज्ञ, बार और नीति से जुड़े शोधकर्ता भी हैं। ऐसे विषयों पर व्यापक चर्चा होनी चाहिए। हम अपने विचार थोप नहीं सकते।”
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने भारत में पांच वर्षीय कानून पाठ्यक्रम के शुरुआती इतिहास का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस पाठ्यक्रम की शुरुआत बेंगलुरु के राष्ट्रीय विधि विद्यालय से नहीं बल्कि रोहतक के महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय से हुई थी और पहला बैच लगभग 1982-83 के आसपास शुरू हुआ था।
जब याचिकाकर्ता ने कहा कि कई विश्वविद्यालयों के कुलपति भी पांच वर्षीय पाठ्यक्रम के पक्ष में नहीं हैं तो अदालत ने पूछा कि यदि विश्वविद्यालय स्वयं इसके खिलाफ हैं तो उन्हें अवधि कम करने से कौन रोक रहा है।
चीफ जस्टिस ने पूछा,
“फिर अदालत के आदेश की जरूरत क्यों है?”
इस पर याचिकाकर्ता ने कहा कि इस संबंध में बार काउंसिल को भी निर्णय लेना होगा।
याचिका में यह भी कहा गया कि पांच वर्ष का कानून पाठ्यक्रम छात्रों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ डालता है, विशेषकर मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों पर। साथ ही इससे छात्रों को कमाने की स्थिति में पहुंचने में दो वर्ष अतिरिक्त लग जाते हैं।
अदालत ने फिलहाल याचिका पर अंतिम निर्णय नहीं दिया और मामले को आगे की सुनवाई के लिए अप्रैल 2026 में सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।

