महाकाल मंदिर में VIP दर्शन पर रोक लगाने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

Amir Ahmad

27 Jan 2026 1:50 PM IST

  • महाकाल मंदिर में VIP दर्शन पर रोक लगाने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

    सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उज्जैन स्थित श्री महाकालेश्वर मंदिर में 'वीआईपी दर्शन' की व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया।

    कोर्ट ने कहा कि यह ऐसा विषय नहीं है जिस पर न्यायालय को निर्णय लेना चाहिए। कोर्ट के इस रुख के बाद याचिकाकर्ता ने याचिका वापस ले ली और संबंधित प्राधिकरणों के समक्ष अभ्यावेदन देने की छूट मांगी, जिसे स्वीकार कर लिया गया।

    चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ दर्पण अवस्थी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

    याचिका में मध्य प्रदेश हाइकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें महाकालेश्वर मंदिर के गर्भगृह में आम श्रद्धालुओं को प्रवेश न देने और VIP को विशेष अनुमति देने की व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी गई।

    याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट विष्णु शंकर जैन ने दलील दी कि गर्भगृह में प्रवेश को लेकर एक समान और स्पष्ट नीति होनी चाहिए।

    उन्होंने कहा कि VIP दर्जे के आधार पर भेदभाव संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। उनका कहना था कि यदि किसी व्यक्ति को गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति दी जा रही है तो वही अधिकार सामान्य श्रद्धालुओं को भी मिलना चाहिए, क्योंकि वे भी उतनी ही श्रद्धा के साथ महाकाल के दर्शन के लिए आते हैं।

    इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह तय करना कि गर्भगृह में किसे प्रवेश दिया जाए और किसे नहीं, न्यायालय का काम नहीं है।

    उन्होंने कहा कि यह प्रश्न न्यायिक हस्तक्षेप के दायरे में नहीं आता और ऐसे मामलों में निर्णय प्रशासनिक स्तर पर ही लिया जाना चाहिए।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि न्यायालय ऐसे विषयों को नियंत्रित करने लगे तो यह उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर चला जाएगा।

    चीफ जस्टिस ने यह भी कहा कि यदि यह मान लिया जाए कि गर्भगृह के भीतर संविधान का अनुच्छेद 14 पूरी तरह लागू होता है तो आगे चलकर लोग अन्य मौलिक अधिकारों, जैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी दावा करने लगेंगे।

    उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कोई यह कह सकता है कि उसे मंत्रोच्चार करने का अधिकार है, क्योंकि यह उसकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है।

    हालांकि एडवोकेट विष्णु शंकर जैन ने यह स्पष्ट किया कि उनका मुद्दा प्रवेश की अनुमति या मनाही नहीं बल्कि चयनात्मक और विशेषाधिकार आधारित अनुमति से जुड़ा है।

    उन्होंने कहा कि या तो सभी के लिए पूर्ण प्रतिबंध हो या फिर सभी को समान रूप से प्रवेश दिया जाए, लेकिन चुनिंदा लोगों को विशेष दर्जा देना उचित नहीं है।

    कोर्ट इस दलील से सहमत नहीं हुआ जिसके बाद याचिकाकर्ता ने याचिका वापस लेने का निर्णय लिया। आदेश में कोर्ट ने दर्ज किया कि याचिकाकर्ता को सक्षम प्राधिकरण के समक्ष अपने सुझाव या अनुशंसा देने की स्वतंत्रता रहेगी।

    इससे पहले मध्य प्रदेश हाइकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि महाकालेश्वर मंदिर की प्रबंधन समिति की कार्यवाही से स्पष्ट है कि गर्भगृह में प्रवेश पर कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं है। हाइकोर्ट ने कहा था कि कलेक्टर और प्रबंधन समिति के प्रशासक की अनुमति से वीआईपी को गर्भगृह में प्रवेश दिया जा सकता है।

    हाइकोर्ट ने यह भी कहा था कि किसी विशेष दिन किसी व्यक्ति को VIP मानना या न मानना कलेक्टर और प्रशासक का विवेकाधिकार है, जिसे रिट याचिका के माध्यम से तय नहीं किया जा सकता।

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि VIP की कोई स्थायी सूची या निर्धारित प्रोटोकॉल नहीं है और यह व्यवस्था देश के अधिकांश धार्मिक स्थलों में लागू है।

    हाइकोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि याचिकाकर्ता व्यक्तिगत रूप से आहत प्रतीत होता है। इस आधार पर दायर याचिका विचार योग्य नहीं है।

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